फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Tata Sons vs RBI What Is the Dispute Over Shareholding Divestment? Lawyer Questions RBI Power

टाटा संस और आरबीआई के बीच क्या है विवाद?: हिस्सेदारी बेचने की शर्त पर वकील ने उठाया सवाल, जानें पूरा मामला

Fri, 18 Sep 2026 10:48 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Fri, 18 Sep 2026 10:48 PM IST
सार

टाटा संस की नियामकीय स्थिति और संभावित लिस्टिंग को लेकर एमएंडए वकील नितिन पोतदार ने आरबीआई की शक्ति पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि आरबीआई किसी शेयरधारक को हिस्सेदारी बेचने के लिए मजबूर नहीं कर सकता और पारदर्शिता के लिए अतिरिक्त खुलासे कराए जा सकते हैं। वहीं, हरीश साल्वे ने अप्रत्यक्ष कर्ज और आरबीआई के रुख का अलग पक्ष बताया है। आखिर टाटा संस का मामला कहां अटका है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

विज्ञापन
Tata Sons vs RBI What Is the Dispute Over Shareholding Divestment? Lawyer Questions RBI Power
टाटा के शेयरों पर क्या विवाद? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

टाटा संस की नियामकीय स्थिति, मालिकाना ढांचे और संभावित शेयर बाजार में लिस्टिंग को लेकर विवाद बढ़ता दिख रहा है। मर्जर और अधिग्रहण यानी एमएंडए मामलों के वकील नितिन पोतदार ने भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई के उस अधिकार पर सवाल उठाया है, जिसके तहत टाटा संस को अपनी हिस्सेदारी बेचने या मालिकाना ढांचे में बदलाव करने की जरूरत बताई जा रही है। पोतदार का कहना है कि अगर आरबीआई की चिंता कंपनी में पारदर्शिता को लेकर है तो इसके लिए सख्त डिस्क्लोजर यानी जानकारी सार्वजनिक करने की शर्तें लगाई जा सकती हैं।

विज्ञापन

टाटा संस ने आरबीआई से क्या मांग की थी और मामला कहां अटका?

नितिन पोतदार के मुताबिक, टाटा संस ने आरबीआई से कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी यानी सीआईसी के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन खत्म करने के लिए आवेदन किया था। इससे पहले कंपनी ने अपने कर्जदाताओं को 20,000 करोड़ रुपये चुकाए थे। पोतदार के अनुसार, इस आवेदन पर करीब 28 महीने तक प्रक्रिया चली और इस दौरान आरबीआई के नियम तीन बार बदल गए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब टाटा संस ने अपना कर्ज चुका दिया था, तब भी आरबीआई की ओर से लगातार नियामकीय शर्तों पर जोर क्यों दिया जा रहा है।

विज्ञापन

आरबीआई के पास हिस्सेदारी बेचने के लिए मजबूर करने की शक्ति है या नहीं?

पोतदार ने कहा कि कंपनी कानून और मौजूदा नियामकीय व्यवस्था के तहत किसी कंपनी के शेयरधारक या प्रमोटर को अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए मजबूर करने की शक्ति का प्रावधान दिखाई नहीं देता। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी के पास भी ऐसी शक्ति नहीं है। पोतदार ने सवाल किया कि आरबीआई को यह अधिकार कहां से मिलता है। उनके अनुसार, अगर आरबीआई का मकसद टाटा संस में ज्यादा पारदर्शिता सुनिश्चित करना है तो टाटा ट्रस्ट्स को नियंत्रित करने वाले कानूनों के तहत अतिरिक्त जानकारी सार्वजनिक करने की शर्तें लागू की जा सकती हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

हरीश साल्वे ने नियामकीय विवाद को किस तरह समझाया?

वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने इस मामले की अलग तस्वीर पेश की। उनके अनुसार, टाटा संस को 2019 से कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के तौर पर देखा गया है और आरबीआई ने कंपनी के कर्ज चुकाने के बावजूद उसे अनरजिस्टर्ड सीआईसी मानने का अनुरोध स्वीकार नहीं किया। साल्वे के मुताबिक, आरबीआई का कहना है कि भले ही टाटा संस ने अपना कर्ज चुका दिया हो, लेकिन जिन कंपनियों में उसकी बहुमत हिस्सेदारी है, उन कंपनियों पर कर्ज है और इसे अप्रत्यक्ष वित्तीय जोखिम माना जा सकता है। साल्वे के अनुसार, नियामकीय समाधान के तहत टाटा संस को पब्लिक कंपनी बनना होगा।

टाटा संस की लिस्टिंग और टाटा ट्रस्ट्स का विवाद क्या है?

यह नियामकीय विवाद टाटा संस के शासन और संभावित लिस्टिंग को लेकर टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेद से भी जुड़ गया है। साल्वे के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स के कुछ ट्रस्टियों ने टाटा संस को पब्लिक कंपनी बनाने के प्रस्ताव का विरोध किया है। उन्होंने बताया कि हाल की एक बोर्ड बैठक में दो ट्रस्टी शामिल हुए थे। इनमें से एक ने प्रस्ताव के पक्ष में और दूसरे ने विरोध में वोट दिया, जबकि कुछ ट्रस्टी आपसी विवादों से जुड़े अदालत के आदेश के कारण बैठक में शामिल नहीं हो सके। साल्वे ने कहा कि इससे टाटा संस के पब्लिक कंपनी बनने की जरूरत का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में ट्रस्ट्स के बोर्ड प्रतिनिधित्व से जुड़ी पाबंदियों का भी उल्लेख किया।

एन चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर भी क्यों उठा सवाल?

नितिन पोतदार ने टाटा संस के बोर्ड के हालिया फैसलों पर भी सवाल उठाए हैं। इनमें एन चंद्रशेखरन को चेयरमैन के तौर पर दोबारा नियुक्त करने का फैसला शामिल है। पोतदार के अनुसार, टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में कुछ ऐसे फैसलों के लिए बोर्ड में बहुमत के साथ दोनों टाटा ट्रस्ट्स के प्रतिनिधियों की सहमति जरूरी है। उनका कहना है कि इस आधार पर एन चंद्रशेखरन की नियुक्ति की वैधता को कानूनी चुनौती दी जा सकती है। इस पूरे विवाद के बीच टाटा संस के मालिकाना ढांचे, आरबीआई के तहत उसकी नियामकीय स्थिति और कंपनी के सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध होने की संभावना पर सवाल बने हुए हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed