SC Updates: बंगाली भाषी प्रवासी कामगारों की हिरासत पर जनहित याचिका; सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से जवाब
सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि बंगाली भाषी प्रवासी कामगारों को बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में हिरासत में लिया जा रहा है। हालांकि, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने हिरासत के संबंध में कोई अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया और कहा कि किसी भी आदेश के परिणाम होंगे, खासकर उन लोगों के संबंध में जो वास्तव में सीमा पार से आए हैं।
पीठ ने कहा, 'जिन राज्यों में ये प्रवासी कामगार काम कर रहे हैं, उन्हें उनके मूल राज्य से उनकी वास्तविक पहचान के बारे में पूछताछ करने का अधिकार है, लेकिन समस्या इस अंतराल में है। अगर हम कोई अंतरिम आदेश पारित करते हैं, तो इसके परिणाम होंगे, खासकर उन लोगों के लिए जो अवैध रूप से सीमा पार से आए हैं और जिन्हें कानून के तहत निर्वासित करने की आवश्यकता है।'
पीठ ने याचिकाकर्ता पश्चिम बंगाल प्रवासी कल्याण बोर्ड की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण से केंद्र और नौ राज्यों ओडिशा, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और पश्चिम बंगाल के जवाबों का कुछ समय तक इंतजार करने को कहा।
विकास कार्य करते समय पर्यावरण की रक्षा करना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विकास कार्य करते समय पर्यावरण की रक्षा भी जरूरी है। शीर्ष कोर्ट ने तेलंगाना सरकार को कांचा गाचीबोवली वन स्थल के समग्र पुनरुद्धार के लिए बेहतर प्रस्ताव पेश करने को 6 हफ्ते का समय दिया। सीजेआई जस्टिस बीआर गवई व जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि राज्य को काटे गए पेड़ों की जगह नए पेड़ लगाने होेेंगे। शीर्ष कोर्ट ने 15 मई को कहा था कि हैदराबाद विश्वविद्यालय के पास पेड़ों की कटाई प्रथम दृष्टया पूर्व नियोजित प्रतीत होती है। सीजेआई ने कहा था कि यह सरकार पर है कि वह जंगल बहाल करे या अफसरों को जेल भेजे। बता दें कि कांचा गाचीबोवली वनक्षेत्र में पेड़ों की कटाई पर स्वतः संज्ञान लेते हुए शीर्ष कोर्ट ने 3 अप्रैल को अगले आदेश तक यथास्थिति बनाए रखने को कहा था।
आईडीबीआई बैंक के त्रिची शाखा की सील खोलने का सुप्रीम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के त्रिची जिले की थुरैयूर नगरपालिका को आईडीबीआई बैंक की एक शाखा की सील हटाने और उसे चालू रखने का निर्देश दिया। नगरपालिका ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ के 6 अगस्त के आदेश के बाद परिसर को सील कर दिया था। हाईकोर्ट ने 48 घंटों के भीतर इसे सील करने का निर्देश दिया था। यह शाखा त्रिची जिले में एक किराए के परिसर में चल रही थी और एक शिकायत के आधार पर, नगर निकाय ने अनधिकृत निर्माण को हटाने के लिए एक प्रवर्तन कार्रवाई शुरू की थी।
यह मामला बुधवार को जब जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया तो बैंक की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि शाखा 2014 से वहां चल रही थी और परिसर को स्थानीय नगरपालिका ने सील कर दिया है। भाटी ने कहा कि शाखा के लगभग 20 हजार ग्राहक हैं और इसमें स्ट्रांग रूम और लॉकर की सुविधा है। उन्होंने अदालत से बैंक शाखा को स्थानांतरित करने के लिए कुछ उचित समय देने और अंतरिम रूप से हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने का आग्रह किया।
उनकी दलीलों पर विचार करते हुए, पीठ ने बैंक को परिसर का कब्जा सौंपने के लिए 31 दिसंबर तक का समय दिया। पीठ ने बैंक की याचिका का निपटारा करते हुए कहा, इस बीच, परिसर को सील करने के हाईकोर्ट के निर्देश को स्थगित रखा जाएगा और नगरपालिका, जिसने 9 अगस्त को ही अपनी सील लगा दी है, सील हटाकर ताले खोलेगी और बैंक को सामान्य रूप से काम करने देगी।
सुप्रीम कोर्ट ने MP हाईकोर्ट पर जताई नाराजगी, पैरामेडिकल कोर्स पर आदेश रोका
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट पर सख्त नाराजगी जताई। वजह यह रही कि हाईकोर्ट ने पैरामेडिकल कोर्स के एडमिशन मामले में नए आदेश जारी कर दिए, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही उसके पुराने आदेश पर रोक लगा चुका था। 1 अगस्त को चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाईकोर्ट के रोक आदेश को हटाकर एडमिशन प्रक्रिया फिर से शुरू करने की मंजूरी दी थी। लेकिन इसके बाद भी हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई कर नए निर्देश दे दिए। सुप्रीम कोर्ट में पैरामेडिकल काउंसिल के रजिस्ट्रार की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा, 'हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश नोट करने के बावजूद आगे आदेश जारी किए, यह चौंकाने वाला है।' CJI ने कहा, 'हमें हैरानी है कि हाईकोर्ट ने ऐसा किया। जब इस अदालत ने हाईकोर्ट के 16 जुलाई के आदेश पर रोक लगा दी थी, तब आगे निर्देश देना संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।' सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के ताजा आदेश और वहां चल रही कार्यवाही -दोनों पर रोक लगा दी।
मामला क्या है?
16 जुलाई को जबलपुर बेंच ने 2023–24 और 2024–25 के पैरामेडिकल कोर्स की एडमिशन प्रक्रिया रोक दी थी। यह याचिका कुछ लॉ स्टूडेंट्स ने लगाई थी, जिनका इस मामले से कोई सीधा संबंध नहीं था। हाईकोर्ट ने पाया कि 166 पैरामेडिकल संस्थानों को 2025 में मान्यता देकर 2023–24 का कोर्स शुरू करने की इजाजत दी गई, जो तर्कहीन है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब संस्थान 2023 में अस्तित्व में ही नहीं थे, तो वे 2023–24 का कोर्स 2025 में कैसे चला सकते हैं। पैरामेडिकल काउंसिल का कहना है कि कोविड महामारी के कारण कई कोर्स समय पर शुरू नहीं हो सके और मान्यता व एडमिशन की प्रक्रिया में देरी हुई
सुप्रीम कोर्ट ने एक दंपति का विवाह खत्म करते हुए पति को पत्नी और बेटे के लिए 1.25 करोड़ रुपये का एकमुश्त गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा, 'पक्षकार 2010 से अलग रह रहे हैं, अब इस रिश्ते को कानूनी रूप से जारी रखने का कोई अर्थ नहीं है।' पति-पत्नी का विवाह फरवरी 2009 में हुआ था और वे अमेरिका में रह रहे थे। पति ने 2012 में तलाक की याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि सुलह की कोई संभावना नहीं है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह को समाप्त कर दिया गया। रकम पांच किस्तों में दी जाएगी, और किस्त चूकने पर आदेश रद्द हो जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर केंद्र और 9 राज्यों से जवाब मांगा, जिसमें आरोप है कि बंगाली बोलने वाले प्रवासी मजदूरों को बांग्लादेशी नागरिक होने के शक में हिरासत में लिया जा रहा है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि जांच जरूरी है, लेकिन इस दौरान असली नागरिकों को परेशान न किया जाए। अदालत ने कहा कि एक नोडल एजेंसी बनाई जा सकती है, जो मजदूरों के गृह राज्य और कार्य राज्य के बीच पहचान सत्यापन का काम करे। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि गृह मंत्रालय के 2 मई 2025 के आदेश का गलत इस्तेमाल हो रहा है और सिर्फ भाषा के आधार पर लोग हिरासत में लिए जा रहे हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के खिलाफ है।