Supreme Court: उच्च न्यायिक सेवाओं में LDCE आरक्षण 25% होगा; 2007 बैच की नौसेना अधिकारी को स्थायी कमीशन मिलेगा
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उच्च न्यायिक सेवाओं के लिए एलडीसीई आरक्षण 25% किया
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायिक सेवा या जिला न्यायाधीश के कैडर में पदोन्नति के लिए सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा (एलडीसीई) के लिए आरक्षित कोटा भी 10% से बढ़ाकर 25% कर दिया। सीजेआई जस्टिस बीआर गवई व जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा, इससे न्याय प्रशासन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। उच्च न्यायपालिका में 25% पद बाहर से सीधी भर्ती से भरे जाते हैं, जबकि 50% योग्यता-सह-वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति से भरे जाते हैं। एलडीसीई में न्यायिक अधिकारी अनुभव या वरिष्ठता की परवाह किए बिना इसे पास करके एडीजे बन सकते हैं।
बहुत हुआ, 2007 बैच की अधिकारी को स्थायी कमीशन दे नौसेना: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश के बावजूद 2007 के एक शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी को स्थायी कमीशन न देने पर नौसेना को फटकार लगाई और कहा, बहुत हुआ। नौसेना के अधिकारी अपना अहंकार छोड़ंे और इस अधिकारी को स्थायी कमीशन दें। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 2007 बैच की जज एडवोकट जनरल्स (विधिक) विभाग की अधिकारी सीमा चौधरी को एक सप्ताह में स्थायी कमीशन देने पर विचार करने के लिए कहा। पीठ ने नौसेना अधिकारियों और केंद्र की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बालासुब्रमण्यम से कहा, बहुत हो गया। कृपया अपना व्यवहार सुधारें। हम आपको उसे स्थायी कमीशन देने के लिए एक सप्ताह का समय देंगे। क्या संबंधित अधिकारी सोचते हैं कि वे न्यायालय के आदेशों को नजरअंदाज कर सकते हैं? आप किस तरह के अनुशासित बल हैं? चयन बोर्ड की कार्यवाही और अधिकारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट का अवलोकन करने वाली पीठ ने पूछा कि जब अधिकारियों ने दावा किया था कि उन्होंने सभी मानक हासिल कर लिए हैं, तो उन्हें स्थायी कमीशन में क्यों नहीं लिया गया। पीठ ने कहा, संबंधित अधिकारियों को अपना अहंकार त्यागना होगा। आप कैसे कह सकते हैं कि वह सभी पहलुओं में फिट हैं, लेकिन फिर भी हम उन्हें स्थायी कमीशन में नहीं ले सकते? इस अदालत का स्पष्ट निष्कर्ष है कि उनके मामले पर अलग से विचार किया जाना चाहिए। फिर अब तक उन पर विचार क्यों नहीं किया गया?
फ्लिपकार्ट को एकाधिकार बनाने में महारत, हमें छोटी कंपनियों की चिंता; शीर्ष अदालत करेगी एकाधिकार बनाने के मुद्दे की जांच
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ई-कॉमर्स क्षेत्र की प्रमुख कंपनी फ्लिपकार्ट एकाधिकार बनाने के लिए जानी जाती है। उसे इसमें महारत हासिल है। शीर्ष अदालत ने कहा कि उसे बाजार में छोटी कंपनियों के भविष्य को लेकर चिंता है। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के आदेश से शुरू हुए विवाद के निपटारे में मदद के लिए वकील उदयादित्य बनर्जी को न्यायमित्र नियुक्त किया। एनसीएलएटी ने निष्पक्ष व्यापार नियामक भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) को फ्लिपकार्ट के खिलाफ उसके प्रभुत्वपूर्ण स्थिति के दुरुपयोग के लिए जांच शुरू करने को कहा था। जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस बात पर हैरानी जताई कि फ्लिपकार्ट पर अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाने वाले शिकायतकर्ता ऑल इंडिया ऑनलाइन वेंडर्स एसोसिएशन (एआईओवीए) का कहीं पता नहीं चला। उसके वकीलों को संस्था से कोई निर्देश नहीं मिला था। एआईओवीए की ओर से पेश अधिवक्ता उदयादित्य बनर्जी ने कहा कि यह संभव है कि संगठन को भंग कर दिया गया हो या अब उसका अस्तित्व ही न हो। पीठ ने फ्लिपकार्ट के वकील से कहा कि वह एकाधिकार बनाने के मुद्दे की जांच करना चाहेगी। फ्लिपकार्ट के वकील ने कहा कि इस प्लेटफॉर्म की वजह से कई छोटे विक्रेता अपने कारोबार को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने में सक्षम हुए हैं। इस पर जस्टिस कांत ने कहा, कभी-कभी फ्लिपकार्ट इतनी अधिक छूट देता है कि इससे छोटे कारोबारियों का कारोबार और बाजार का संतुलन बिगड़ जाता है। पीठ ने वकील उदयादित्य बनर्जी से इस मामले में न्यायालय की मदद करने को कहा, अन्यथा यह एक असमान लड़ाई होगी।
वरिष्ठ वकील विकास सिंह को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) का अगला अध्यक्ष निर्वाचित किया गया है। एससीबीए ने मंगलवार को अपनी कार्यकारी समिति के चुनाव के परिणामों की घोषणा की। सिंह अपने निकटतम प्रतिद्वंदियों वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश सी अग्रवालवाला और प्रदीप कुमार राय को हराकर चौथी बार इस पद पर निर्वाचित हुए हैं। उन्होंने 2018, 2021 और 2022-23 में एससीबीए अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पिछले साल एससीबीए का अध्यक्ष पद जीता था। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 2024 में अंतिम रूप दी गई मतदाता सूची के आधार पर शीर्ष अदालत बार एसोसिएशन के चुनाव कराने की तारीख 20 मई तय की थी।
आप किसी को उसकी विचारधारा के लिए जेल में नहीं डाल सकते : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केरल के पलक्कड़ जिले में आरएसएस नेता श्रीनिवासन की 2022 में हुई हत्या के आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि आप किसी को उसकी विचारधारा के लिए जेल में नहीं डाल सकते। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने पीएफआई की केरल इकाई के तत्कालीन महासचिव अब्दुल साथर को जमानत देते हुए पीठ ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की ओर से पेश हुए वकील से कहा, जहां तक श्रीनिवासन की हत्या का सवाल है, इसमें उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है। आप किसी को उसकी विचारधारा के लिए जेल में नहीं डाल सकते। हम यही चलन देख रहे हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उन्होंने एक खास विचारधारा अपना ली है, इसलिए उन्हें जेल में डाल दिया जाता है।
बता दें कि केरल हाईकोर्ट ने 25 जून, 2024 को 17 आरोपी पीएफआई सदस्यों को जमानत दे दी थी। ये सभी राज्य और देश के अन्य हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के आरोप में मुकदमे का सामना कर रहे थे। 26 आरोपियों में से 17 को जमानत देते हुए हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी के साथ उनके सेलफोन नंबर और रिअल टाइम जीपीएस लोकेशन साझा करने की कड़ी शर्त लगाई थी। उल्लेखनीय है कि 19 दिसंबर, 2022 को, केंद्र ने श्रीनिवासन की मौत का जिक्र करते हुए कहा कि पीएफआई के नेताओं की ओर से बड़ी साजिश रची गई थी। इसके गंभीर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिणाम हैं। इसकी व्यापक साजिश का पता लगाने और अन्य आरोपियों की पहचान करने के लिए गहन जांच की आवश्यकता है। केंद्र ने एनआईए को हत्या के मामले की भी जांच करने का निर्देश दिया था। एजेंसी ने 2023 में अपनी समेकित चार्जशीट दाखिल की, जिसके बाद दो पूरक चार्जशीट दाखिल की गईं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सेवानिवृत्त हाईकोर्ट के जजों को चिकित्सा सुविधाओं और अन्य भत्तों से संबंधित अपने आदेशों का पालन न करने के लिए छह राज्यों के मुख्य सचिवों को अवमानना नोटिस जारी किया। जस्टिस अभय एस ओका व जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और दिल्ली ने 18 फरवरी को जारी निर्देशों का पालन नहीं किया है। पीठ ने कहा, जहां तक छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और दिल्ली राज्यों का सवाल है, उन्होंने इस अदालत से जारी सभी निर्देशों का पालन नहीं किया है। उपरोक्त राज्यों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी करें और उनसे कारण बताने को कहें कि इन राज्यों के खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। इस मामले की अगली सुनवाई 25 जुलाई को तय की गई है।
उपभोक्ता मुकदमेबाजी को जनहित याचिका का एक रूप मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि लोकतंत्र के फलने-फूलने के लिए उपभोक्ता मुकदमेबाजी को कई गुना बढ़ने देना जरूरी है।जस्टिस अभय एस ओका व जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने कहा कि उपभोक्तावाद को सशक्त बनाना सामाजिक असमानताओं को दूर करने का सबसे प्रभावी तरीका होगा। शीर्ष अदालत उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के कार्यान्वयन में खामियों का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा, उपभोक्ता मुकदमेबाजी से सक्रिय नागरिकता का निर्माण होता है और सहभागी लोकतंत्र आगे बढ़ता है। सहभागी लोकतंत्र संविधान की बुनियादी विशेषताओं में से एक है। देश के शासन में भागीदारी का सिद्धांत न सिर्फ सांविधानिक अधिकार है, बल्कि मानवाधिकार भी है। इसलिए जरूरी है कि लोकतंत्र को फलने-फूलने के लिए उपभोक्ता मुकदमेबाजी को कई गुना बढ़ने दिया जाए।