Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज SCBA की सुधार समिति अध्यक्ष नियुक्त, 7 अप्रैल को अगली सुनवाई
Supreme Court: सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व जज एल. नागेश्वर राव को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) की चुनाव सुधार समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया है, जो चुनाव सुधारों और उम्मीदवारों के लिए पात्रता मानदंडों पर सुझाव देंगे। समिति में अनुभवी वकील होंगे, जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा। मामले की अगली सुनवाई 7 अप्रैल को होगी।
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सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व जज एल. नागेश्वर राव को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) की चुनाव सुधार समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि न्यायमूर्ति राव ने इस समिति की अध्यक्षता करने के लिए सहमति दी है। समिति एससीबीए की कार्यकारी समिति के चुनाव में उम्मीदवारों के लिए पात्रता मानदंडों का सुझाव भी देगी।
पीठ ने सोमवार को जारी आदेश में कहा, पूर्व में किए गए विचार-विमर्श और समय-समय पर जारी आदेशों के क्रम में इस अदालत के पूर्व जज न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव ने एससीबीए की कार्यकारी समिति के चुनाव के लिए नियमों/दिशानिर्देशों/मानदंडों में सुधार के लिए समिति की अध्यक्षता करने पर विनम्रतापूर्व सहमति दी है।
समिति में होंगे कभी चुनाव न लड़ने वाले अनुभवी वकील
पीठ ने आगे कहा, प्रस्तावित सुधारों में चुनावों में भाग लेने के लिए पात्रता शर्तें तय हो सकती हैं। इस समिति में कुछ वरिष्ठ वकील/अनुभवी वकील (लॉय-ऑन-रिकॉर्ड और नॉन-लॉयर-ऑन-रिकॉर्ड दोनों श्रेणी से) होंगे, जिन्होंने कभी एससीबीए के पदाधिकारियों के रूप में चुनाव नहीं लड़ा है। उच्चतम न्यायालय ने बार के सदस्यों को दो हफ्ते के भीतर समिति के लिए नाम का सुझाव देने को भी कहा है।
सात अप्रैल को मामले में अगली सुनवाई
पीठ ने यह भी कहा, हम न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव को राव को पूरी स्वतंत्रता देते हैं कि वह इस सूची से नामों का चयन करें। यह समिति बार के सदस्यों या अन्य धारकों से सुझाव प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र होगी। इस मामले में अगली सुनवाई सात अप्रैल को होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने पहले वरिष्ठ वकील विकास सिंह और कपिल सिब्बल से समिति के अध्यक्ष के बारे में सुझाव मांगे थे। शीर्ष कोर्ट ने मई 2024 में एससीबीए की कार्यकारी समिति में महिलाओं के लिए 33 फीसदी पदों को आरक्षित करने का भी आदेश दिया था।
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प्रधान पतियों पर लगाम लगाने की तैयारी, दंड लगाने की सिफारिश
देश की ग्राम पंचायतों में महिला प्रधान के पति और रिश्तेदारों की ओर से चलाया जा रहा शासन अब नहीं चलेगा। इसके लिए बनी समिति ने प्रधान पति, सरपंच पति और मुखिया पति के मामले में प्रॉक्सी संचालन साबित होने पर दंड लगाने की सिफारिश की है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व खान सचिव सुशील कुमार की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया था, जिसे इस प्रॉक्सी व्यवस्था पर लगाम लगाने के उपाय सुझाने थे। पंचायती राज मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में समिति ने सभी के लिए पंचायत चुनाव लड़ने की न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित करने, बैठकों की वीडियो रिकॉर्डिंग कराने, महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों में सुधार करने के लिए कानूनी उपाय समेत कई सिफारिश की है। मंत्रालय अब इसके आधार पर नीतिगत हस्तक्षेप, संरचनात्मक सुधारों को लागू करने की योजना पर काम कर रहा है। भारत में तीन स्तरों पर ग्राम पंचायत, गांव स्तर पर ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति, और जिला स्तर पर जिला परिषद में 2.63 लाख पंचायते हैं। जिसमें 32.29 लाख प्रतिनिधि हैं। इनमें 15.06 लाख यानी 46.6 फीसदी महिलाएं हैं। इसका मकसद महिलाओं को राजनीतिक रुप से सशक्त बनाना और समावेशी ग्रामीण विकास सुनिश्चित करना।
केंद्र से दुर्लभ बीमारी से पीड़ित मरीज के लिए दवा खरीदने के आदेश पर सुप्रीम रोक
सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें केंद्र को स्पाइनल मस्कुलर अट्रोफी से पीड़ित एक मरीज को 50 लाख रुपये की सीमा से परे 18 लाख रुपये की अतिरिक्त दवाइयां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने केंद्र की याचिका पर पक्षकारों को नोटिस जारी किया है। 17 अप्रैल से शुरू होने वाले सप्ताह में नोटिस का जवाब देने को कहा है, जब अगली सुनवाई होगी। तब तक हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। स्पाइनल मस्कुलर अट्रोफी (एसएमए) एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं और मरीज अपनी शारीरिक गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता है। इस बीमारी से पीड़ित जरूरतमंत मरीजों को केंद्र 50 लाख रुपये तक की मदद मुहैया कराता है। केरल हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 6 फरवरी को 24 वर्षीय सेबा पीए का इलाज जारी रखने के लिए एसएमए दवा रिसडिप्लम को एक बार के उपाय के रूप में प्रदान करने का निर्देश दिया था। सेबा की तरफ से हाईकोर्ट में दवा की अत्यधिक कीमत के बारे में बताया गया था, जिसके एक बोतल की कीमत 6.2 लाख रुपये है।
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