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Supreme Court: दिल्ली के डियर पार्क से दूसरे राज्यों में नहीं भेजे जाएंगे हिरण, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
Thu, 01 May 2025 12:13 PM IST
बशु जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: बशु जैन
Updated Thu, 01 May 2025 12:13 PM IST
सार
डियर पार्क दिल्ली से हिरणों के स्थानांतरण को लेकर गैर सरकारी संगठन न्यू दिल्ली नेचर सोसाइटी ने याचिका दायर की थी। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हिरणों को दूसरे राज्यों में भेजने पर रोक लगा दी। आइए पढ़ते हैं सुप्रीम कोर्ट की अहम खबरें।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दिल्ली के हौज खास स्थित डियर पार्क से हिरणों को अब दूसरे राज्यों के जंगलों में नहीं भेजा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने हिरणों के स्थानांतरण पर रोक लगाई है। साथ ही दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) और अन्य प्राधिकारियों को आदेश दिया है। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने हिरणों के स्थानांतरण का विरोध करने वाली याचिका पर डीडीए के बागवानी निदेशक और अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। पीठ ने कहा कि विशेष अनुमति याचिकाओं में शामिल मुद्दा हौज खास नई दिल्ली स्थित हिरण पार्क में हिरणों को स्थानांतरित करने से संबंधित है। इस पर नोटिस जारी किया जाता है, जिस पर 16 मई 2025 को जवाब देना होगा।
पीठ ने 30 अप्रैल को पारित आदेश में कहा कि फिलहाल हम डीडीए अधिकारियों को हिरण पार्क से मौजूदा हिरणों को स्थानांतरित करने से रोकते हैं। हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि हिरणों की उचित देखभाल की जाएगी। हिरणों के स्थानांतरण को लेकर गैर सरकारी संगठन न्यू दिल्ली नेचर सोसाइटी ने याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि हौज खास से लगभग 600 हिरणों को उचित आवास आकलन, पशु चिकित्सा जांच या गर्भवती हिरणों और उनके बच्चों जैसे कमजोर समूहों के लिए सुरक्षा उपायों के बिना स्थानांतरित किए जाने की संभावना है। याचिका में कहा गया कि वन्यजीव संरक्षण कानूनों का उल्लंघन करते हुए हिरणों के तीन समूहों को पहले ही जल्दबाजी में हिरण पार्क से राजस्थान के अभयारण्यों में स्थानांतरित कर दिया गया है।
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पीठ ने 30 अप्रैल को पारित आदेश में कहा कि फिलहाल हम डीडीए अधिकारियों को हिरण पार्क से मौजूदा हिरणों को स्थानांतरित करने से रोकते हैं। हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि हिरणों की उचित देखभाल की जाएगी। हिरणों के स्थानांतरण को लेकर गैर सरकारी संगठन न्यू दिल्ली नेचर सोसाइटी ने याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि हौज खास से लगभग 600 हिरणों को उचित आवास आकलन, पशु चिकित्सा जांच या गर्भवती हिरणों और उनके बच्चों जैसे कमजोर समूहों के लिए सुरक्षा उपायों के बिना स्थानांतरित किए जाने की संभावना है। याचिका में कहा गया कि वन्यजीव संरक्षण कानूनों का उल्लंघन करते हुए हिरणों के तीन समूहों को पहले ही जल्दबाजी में हिरण पार्क से राजस्थान के अभयारण्यों में स्थानांतरित कर दिया गया है।
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यूपी के पूर्व सपा सांसद बाल कुमार पटेल को राहत, 18 साल पुराने मामले में सुप्रीम फैसला
उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के पूर्व लोकसभा सांसद को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 2007 के शस्त्र मामले में जारी सुनवाई पर रोक लगा दी। मिर्जापुर के पूर्व सांसद बाल कुमार पटेल की ओर से पैरवी कर रहे वकील रोहित ए. स्थलेकर की दलीलों पर गौर करने के बाद कोर्ट ने नोटिस जारी करने का आदेश पारित किया। कोर्ट ने कहा, अगले आदेश तक निचली अदालत (रायबरेली में चतुर्थ अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष) में आपराधिक मामले की कार्यवाही पर रोक रहेगी। राजनीतिक प्रतिशोध के चलते 'उत्पीड़न' का आरोप लगाने के इस मुकदमे को पूर्व सांसद ने 'परेशान करने वाली और मनगढ़ंत' बताया था। वकील ने दलील दी कि पूर्व सपा सांसद के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का मकसद 'याचिकाकर्ता को परेशान करना और उनके राजनीतिक करियर को खराब करना' है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले पूर्व सांसद ने प्राथमिकी को रद्द करने का अनुरोध करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट की पीठ ने 2007 के शस्त्र अधिनियम, 1959 से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की अपील खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि राज्य सरकार मामला वापस लेने के लिए इच्छुक नहीं है। पूर्व सांसद होने के नाते पटेल के पास सरकार को बाध्य करने का अधिकार नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के पूर्व लोकसभा सांसद को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 2007 के शस्त्र मामले में जारी सुनवाई पर रोक लगा दी। मिर्जापुर के पूर्व सांसद बाल कुमार पटेल की ओर से पैरवी कर रहे वकील रोहित ए. स्थलेकर की दलीलों पर गौर करने के बाद कोर्ट ने नोटिस जारी करने का आदेश पारित किया। कोर्ट ने कहा, अगले आदेश तक निचली अदालत (रायबरेली में चतुर्थ अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष) में आपराधिक मामले की कार्यवाही पर रोक रहेगी। राजनीतिक प्रतिशोध के चलते 'उत्पीड़न' का आरोप लगाने के इस मुकदमे को पूर्व सांसद ने 'परेशान करने वाली और मनगढ़ंत' बताया था। वकील ने दलील दी कि पूर्व सपा सांसद के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का मकसद 'याचिकाकर्ता को परेशान करना और उनके राजनीतिक करियर को खराब करना' है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले पूर्व सांसद ने प्राथमिकी को रद्द करने का अनुरोध करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट की पीठ ने 2007 के शस्त्र अधिनियम, 1959 से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की अपील खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि राज्य सरकार मामला वापस लेने के लिए इच्छुक नहीं है। पूर्व सांसद होने के नाते पटेल के पास सरकार को बाध्य करने का अधिकार नहीं है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
उच्चतम न्यायालय की दो जजों की खंडपीठ ने एक अहम आदेश पारित किया है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा, अदालतों को अनधिकृत निर्माण के मामलों से निपटने में 'सख्त रुख' अपनाना चाहिए। ऐसे ढांचों के न्यायिक रूप से नियमित करने की प्रक्रिया में अदालत को शामिल नहीं होना चाहिए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय से अपील की है कि उनके मुवक्किल को अनधिकृत निर्माण को नियमित करने के लिए अनुरोध करने का मौका दिया जाए। कोर्ट ने कहा, कानून को इस तरह का उल्लंघन करने वालों के बचाव में नहीं आना चाहिए। ऐसा करने से 'दंड से मुक्ति की संस्कृति पनप सकती है।'
अनधिकृत निर्माण पर कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की सराहना की
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना बने हुए भवनों को न्यायिक रूप से नियमित बताने में अदालतों को तत्परता से शामिल नहीं होना चाहिए। अवैध निर्माण के मामलों से निपटने में अदालतों को सख्त रुख अपनाना चाहिए। इस आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाले इस मुकदमे में हाईकोर्ट ने अनधिकृत निर्माण से संबंधित बिंदुओं पर विचार किया था। 30 अप्रैल को पारित आदेश में शीर्ष कोर्ट ने 'साहस और दृढ़ विश्वास' की प्रशंसा भी की। सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि उच्च न्यायालय ने जनहित में अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए अनधिकृत निर्माण पर कार्रवाई की।
उच्चतम न्यायालय की दो जजों की खंडपीठ ने एक अहम आदेश पारित किया है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा, अदालतों को अनधिकृत निर्माण के मामलों से निपटने में 'सख्त रुख' अपनाना चाहिए। ऐसे ढांचों के न्यायिक रूप से नियमित करने की प्रक्रिया में अदालत को शामिल नहीं होना चाहिए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय से अपील की है कि उनके मुवक्किल को अनधिकृत निर्माण को नियमित करने के लिए अनुरोध करने का मौका दिया जाए। कोर्ट ने कहा, कानून को इस तरह का उल्लंघन करने वालों के बचाव में नहीं आना चाहिए। ऐसा करने से 'दंड से मुक्ति की संस्कृति पनप सकती है।'
अनधिकृत निर्माण पर कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की सराहना की
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना बने हुए भवनों को न्यायिक रूप से नियमित बताने में अदालतों को तत्परता से शामिल नहीं होना चाहिए। अवैध निर्माण के मामलों से निपटने में अदालतों को सख्त रुख अपनाना चाहिए। इस आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाले इस मुकदमे में हाईकोर्ट ने अनधिकृत निर्माण से संबंधित बिंदुओं पर विचार किया था। 30 अप्रैल को पारित आदेश में शीर्ष कोर्ट ने 'साहस और दृढ़ विश्वास' की प्रशंसा भी की। सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि उच्च न्यायालय ने जनहित में अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए अनधिकृत निर्माण पर कार्रवाई की।