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SC: दोषियों की पेशी के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंस का उपयोग क्यों नहीं हो रहा? अदालत का महाराष्ट्र गृह सचिव से सवाल
Sat, 26 Oct 2024 10:22 PM IST
श्वेता महतो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: श्वेता महतो
Updated Sat, 26 Oct 2024 10:22 PM IST
सार
सुनवाई के दौरान जब अदालत ने राज्य के वकील से पूछा कि आरोपी को पेश क्यों नहीं किया गया तो वे कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाए। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश एक आरोपी द्वारा याचिका दायर करने के बाद आया।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के गृह सचिव को यह बताने का निर्देश दिया है कि अदालत में आरोपियों को सबूत दर्ज करने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा है। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सचिव को इस संबंध में दो सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
पीठ ने कहा, "महाराष्ट्र के गृह सचिव को एक हलफनामा दाखिल करना चाहिए कि सबूतों की रिकॉर्डिंग और आरोपियों की पेशी के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा है? हलफनामे में यह भी बताना होगा कि महाराष्ट्र में ऐसी सुविधाएं मौजूद है भी या नहीं? हलफनामे में यह भी बताना पड़ेगा कि अदालतों और जेलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा उपलब्ध करने के लिए कितनी राशि जारी की गई थी?"
सुनवाई के दौरान जब अदालत ने राज्य के वकील से पूछा कि आरोपी को पेश क्यों नहीं किया गया तो वे कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाए। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश एक आरोपी द्वारा याचिका दायर करने के बाद आया। आरोपी ने बताया था कि उसके मामले में सुनवाई 30 बार स्थगित की गई थी, क्योंकि उसे पेश ही नहीं किया गया था।
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पीठ ने कहा, "महाराष्ट्र के गृह सचिव को एक हलफनामा दाखिल करना चाहिए कि सबूतों की रिकॉर्डिंग और आरोपियों की पेशी के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा है? हलफनामे में यह भी बताना होगा कि महाराष्ट्र में ऐसी सुविधाएं मौजूद है भी या नहीं? हलफनामे में यह भी बताना पड़ेगा कि अदालतों और जेलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा उपलब्ध करने के लिए कितनी राशि जारी की गई थी?"
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सुनवाई के दौरान जब अदालत ने राज्य के वकील से पूछा कि आरोपी को पेश क्यों नहीं किया गया तो वे कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाए। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश एक आरोपी द्वारा याचिका दायर करने के बाद आया। आरोपी ने बताया था कि उसके मामले में सुनवाई 30 बार स्थगित की गई थी, क्योंकि उसे पेश ही नहीं किया गया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश के स्कूलों की दयनीय स्थिति पर एनजीओ की याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने एक एनजीओ की ओर से मध्यप्रदेश के स्कूलों की दयनीय स्थिति को लेकर दायर की गई याचिका खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा की बेंच ने एनजीओ को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर करने के लिए कहा। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय का रुख करने के लिए स्वतंत्र है। एनजीओ ने अपनी याचिका में खजुराहो जिले के पांच स्कूलों की जर्जर इमारतों सहित खराब स्थितियों को उजागर किया था।
वकील पर कोर्ट का समय बर्बाद करने पर एक लाख का जुर्माना लगाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने वकील पर अदालत का कीमती समय बर्बाद करने के लिए एक लाख का जुर्माना लगाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां की पीठ ने नोटिस जारी करते हुए कहा कि क्या वकील महमूद प्राचा के खिलाफ उच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों को हटाने की जरूरत है? पीठ ने नोटिस को लेकर नौ दिसंबर 2024 तक जवाब मांगा है। तब तक हाईकोर्ट के आदेश पर रोक रहेगी। प्राचा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया, जिसने उन्हें एक याचिका दायर करने के लिए कीमती समय बर्बाद करने का दोषी माना था। उच्च न्यायालय ने कहा था कि प्राचा अपना कोट और बैंड पहनकर उपस्थित हुए थे और उन्होंने अदालत को यह बताए बिना बहस की थी कि मामला उनका व्यक्तिगत है। इसमें प्राचा पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
वकीलों को युवाओं को पर्याप्त वेतन देना चाहिए: सीजेआई चंद्रचूड़
देश के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि वकीलों अपने चैंबर में सीखने के लिए आने वाले युवाओं को पर्याप्त वेतन और मेहनताना देना चाहिए। एक साक्षात्कार के दौरान मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि कानूनी पेशा ऐसा है, जहां शुरुआती वर्षों में रखी गई नींव युवा वकीलों को उनके पूरे करियर में अच्छी स्थिति में रखती है। उन्होंने कहा कि हर पेशे में उतार-चढ़ाव आते हैं। शुरुआत में कानूनी पेशे में अपने पहले महीने के अंत में आप जो राशि कमाते हैं वह बहुत अधिक नहीं हो सकती है। इसलिए पहली बार आने वालों को इसमें लगे रहने, कड़ी मेहनत करने और जो करते हैं उसके प्रति ईमानदार रहने के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि समान रूप से हमारी संरचना में भी बदलाव होना चाहिए। वकीलों को सीखना चाहिए कि उनके चैंबर में प्रवेश करने वाले युवा वकीलों को उचित वेतन और मेहनताना कैसे दिया जाए।
जीएसटी सहकारी संघवाद का बेहतरीन उदाहरण : सीजेआई
सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि भारत में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) सहकारी संघवाद का बेहतरीन उदाहरण है। एक कार्यक्रम में ‘संघवाद और इसकी संभावनाओं को समझना’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दशकों में अदालतों ने संघवाद पर एक मजबूत ढांचा विकसित किया है, ताकि राज्यों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके। सीजेआई ने कहा कि भारतीयों के लिए संघवाद एकात्मक अवधारणा नहीं है, बल्कि इसके कई पहलू हैं। सहकारी संघवाद एक शासन प्रणाली है, जिसमें केंद्र और राज्य विकास के साझा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मतभेदों को दूर करने के लिए मिलकर काम करते हैं। सीजेआई ने कहा कि संघवाद और हमारे राष्ट्र की उन्नति के लिए दोनों प्रकार के संवाद समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और जीएसटी लागू करने से बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है।
ऐसी स्वास्थ्य नीतियां बनाएं ताकि वंचित तबका छूटने न पाए: बीआर गवई
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बीआर गवई ने कहा कि मेडिकल सर्जरी के भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती उभरती तकनीक तक समान पहुंच सुनिश्चित करना है। कोलकाता में शुक्रवार को वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ एंडोस्कोपिक सर्जन्स कार्यक्रम में जस्टिस गवई ने कहा कि इसमें तेजी से प्रगति हो रही है। चिकित्सा प्रौद्योगिकी अक्सर नैतिक दिशानिर्देशों के विकास से आगे निकल जाती है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य लागत एक महत्वपूर्ण बाधा बनी हुई है। ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो सस्ती स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच सुनिश्चित करें। कानून को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी तक पहुंच का सिद्धांत लागू हो। ताकि कोई व्यक्ति केवल अपनी आर्थिक स्थिति के कारण सर्जिकल पहलों से वंचित न हो। जब हम सर्जरी के एक नए युग के कगार पर हैं, तब चिकित्सा और कानूनी पेशे दोनों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों का पालन करें, ताकि कमजोर और हाशिये पर रहने वाले लोग पीछे न छूट जाएं।