SC: अदालतों में शौचालयों की स्थिति पर 20 हाईकोर्ट्स ने दाखिल नहीं की रिपोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी अदालतों और न्यायाधिकरणों में शौचालय सुविधा मुहैया कराने के निर्देश दिए। साथ ही सभी उच्च न्यायालयों से रिपोर्ट मांगी थी। मगरा 20 हाईकोर्ट्स ने रिपोर्ट दाखिल नहीं की। इस पर शीर्ष अदालत ने नाराजगी जाहिर की। पढ़िए सुप्रीम कोर्ट की अहम खबरें...।
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15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उचित स्वच्छता तक पहुंच को मौलिक अधिकार माना गया है। कोर्ट ने उच्च न्यायालयों, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से सभी न्यायालय परिसरों और न्यायाधिकरणों में पुरुषों, महिलाओं, दिव्यांगजनों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग-अलग शौचालयों की सुविधा सुनिश्चित करने को कहा था। कोर्ट ने चार महीने के भीतर स्थिति रिपोर्ट भी मांगी थी।
बुधवार को पीठ ने कहा कि केवल झारखंड, मध्य प्रदेश, कलकत्ता, दिल्ली और पटना उच्च न्यायालयों ने ही फैसले के निर्देशों का पालन करने के लिए की गई कार्रवाई का विवरण देते हुए हलफनामे दायर किए हैं। कई उच्च न्यायालयों ने अभी तक अपनी रिपोर्ट दाखिल नहीं की हैं। हम उन्हें आठ हफ्तों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आखिरी मौका देते हैं। हम स्पष्ट करते हैं कि अगर वे स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने में विफल रहते हैं तो उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहेंगे।
प्रीम कोर्ट ने आतंकी गतिविधियों के आरोपी की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार एक व्यक्ति की याचिका पर बुधवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) से जवाब मांगा। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने एजेंसी को नोटिस जारी किया और अल्लाहरक्खा अबू बकर मनूरी की याचिका पर जवाब मांगा। अबू बकर ने सात साल की लंबी कैद के आधार पर जमानत मांगी है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 28 मार्च को मनूरी को जमानत देने से इनकार कर दिया था और कहा था कि उन पर लगाया गया अपराध गंभीर है।
अभियोजन पक्ष ने उच्च न्यायालय को बताया था कि मनूरी कथित तौर पर कुछ ऐसे लोगों को वाहन उपलब्ध कराने की योजना बना रहा था जिन्हें पाकिस्तान में बम विस्फोटों सहित आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए प्रशिक्षित किया गया था। उसने कथित तौर पर कुछ अन्य आरोपियों को हथियार भी उपलब्ध कराए थे। पीठ ने कहा कि यदि मनूरी दोषी पाया जाता है तो उसे अधिकतम आजीवन कारावास की सजा हो सकती है।
दोषी के खिलाफ कार्यवाही करने की शक्ति का प्रयोग सावधानी से किया जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अपराध के किसी मामले में दोषी प्रतीत होने वाले व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करने की शक्ति का प्रयोग बहुत ही सावधानी’के साथ किया जाना चाहिए, न कि उसे प्रताड़ित करने के माध्यम के रूप में।न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ पूर्ववर्ती सीआरपीसी की धारा 319 से संबंधित एक मामले की सुनवाई कर रही थी। धारा 319 किसी अपराध के दोषी प्रतीत होने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की शक्ति से संबंधित है। पीठ ने कहा कि यह प्रावधान न्यायालय को किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार देता है, भले ही उसे आरोपी के रूप में उद्धृत न किया गया हो।
पीठ ने कहा, इसमें यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि शक्ति का प्रयोग बहुत सावधानी के साथ किया जाना चाहिए, न कि लापरवाही के साथ - क्योंकि इसका उद्देश्य केवल न्याय को आगे बढ़ाना है, न कि किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करने या कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का माध्यम बनना है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पिछले वर्ष जुलाई में पारित एक आदेश के खिलाफ अपील पर आया है। हाईकोर्ट ने 2017 के हत्या के एक मामले में सीआरपीसी की धारा 319 के तहत एक व्यक्ति के खिलाफ कौशाम्बी की एक निचली अदालत द्वारा जारी समन को रद्द कर दिया। पीठ ने उन सिद्धांतों को भी गिनाया जिनका धारा 319 के तहत शक्ति का प्रयोग करते समय निचली अदालत को पालन करना चाहिए। इसने कहा यह प्रावधान कानून के उस क्षेत्र का एक पहलू है जो पीड़ितों और समाज को सुरक्षा प्रदान करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि अपराध करने वाले कानून की गिरफ्त से बच न सकें।