SC Updates: उत्तर प्रदेश के कृषि विश्वविद्यालय में धर्मांतरण का मामला, शीर्ष अदालत में 14 मई को अंतिम सुनवाई
SC Updates: उत्तर प्रदेश के सैम हिगिनबॉटम कृषि विश्वविद्यालय में कथित धर्मांतरण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम सुनवाई तय कर ली है। सभी नौ याचिकाओं पर 14 मई को अंतिम सुनवाई होगी।
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सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण मामले में उत्तर प्रदेश के सैम हिगिनबॉटम कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र बिहारी लाल और अन्य के खिलाफ दर्ज पांच एफआईआर को रद्द करने या एक साथ जोड़ने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई तय कर दी है।
14 मई को होगी अंतिम सुनवाई
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने सिद्धार्थ दवे और मुक्ता गुप्ता सहित वरिष्ठ वकीलों की दलीलों पर गौर करते हुए कहा कि सभी नौ याचिकाओं पर 14 मई को अंतिम सुनवाई की जाएगी। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अदालत में पेश हुईं वरिष्ठ वरील गरिमा प्रसाद को निर्देश दिया है कि सिद्धार्थ दवे को अगली सुनवाई से पहले पहली एफआईआर में दायर आरोपपत्र की एक प्रति प्रदान करें। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार और आरोपियों के वकील से लिखित दलीलें दाखिल करने को भी कहा।
आयुष चिकित्सकों की सेवानिवृत्ति पर विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सरकारी अस्पतालों व क्लीनिक में काम करने वाले आयुर्वेद चिकित्सकों व अन्य लोगों तथा एलोपैथिक चिकित्सकों के लिए सेवानिवृत्ति की आयु अलग-अलग होने के मुद्दे पर विचार करने के लिए सहमति जता दी। एलोपैथिक चिकित्सकों की कमी को ध्यान में रखते हुए राजस्थान सरकार ने 31 मार्च, 2016 से उनकी सेवानिवृत्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी थी। इसके कारण सरकारी आयुष (आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) चिकित्सकों की तरफ से याचिकाएं दायर की जाने लगीं। राजस्थान हाईकोर्ट ने 28 फरवरी को आयुर्वेदिक चिकित्सकों की शिकायतों को स्वीकार करते हुए एक फैसला सुनाया था। अदालत ने कहा था कि यदि उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख 31 मार्च, 2016 के बाद आती है, तो उन्हें 62 वर्ष की आयु तक सेवा में माना जाएगा। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ से आग्रह किया कि आदेश पर रोक लगा दी जाए। चीफ जस्टिस ने पूछा, हमें इसमें हस्तक्षेप क्यों करना चाहिए। पीठ सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों पर ध्यान देने के बाद राज्य सरकार की अपील पर विचार करने के लिए सहमत हो गई।
झारखंड अवैध खनन मामले में सीबीआई को जांच जारी रखने की सुप्रीम अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के साहिबगंज में अवैध खनन से जुड़े एक मामले में सीबीआई जांच जारी रखने की अनुमति दे दी, लेकिन केंद्रीय एजेंसी को अगली सुनवाई तक आरोपपत्र दाखिल करने से रोक दिया।
जस्टिस संजीव खन्ना व जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शुक्रवार को झारखंड सरकार की तरफ से दाखिल एक याचिका पर सीबीआई से जवाब मांगा। अदालत ने जवाब दाखिल करने के लिए वक्त देते हुए मामले को आठ जुलाई से प्रारंभ हो रहे हफ्ते में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। झारखंड सरकार ने हाईकोर्ट के 23 फरवरी के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें अदालत ने उसकी सीबीआई जांच को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी।
अदालत ने झारखंड सरकार की तरफ से मौजूद वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल व अरुणाभ चौधरी की दलील पर गौर किया। अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि झारखंड हाईकोर्ट ने 18 अगस्त को सिर्फ सीबीआई की प्रारंभिक जांच का आदेश दिया था। लेकिन, पुलिस ने मामले की जांच कभी भी सीबीआई को सौंपी ही नहीं। पुलिस मामले में क्लोजर रिपोर्ट पेश कर चुकी है। अधिवक्ता जयंज गुप्ता की तरफ से दाखिल अपील में झारखंड सरकार ने दावा किया है कि उसकी याचिका हाईकोर्ट ने सिर्फ इस आधार पर खारिज कर दी थी कि उसने पिछले साल सीबीआई जांच का आदेश दिया था।
विवाह के मामले में शीर्ष अदालत की अहम टिप्पणी; छोटे-मोटे झगड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर बताना ठीक नहीं
प्रत्येक मामले में क्रूरता का निर्धारण ठीक तरीके से होना जरूरी
अदालत ने कहा कि कई बार, एक विवाहित महिला के माता-पिता और करीबी रिश्तेदार बात का बतंगड़ बना देते हैं। छोटी-छोटी बातों पर वैवाहिक बंधन पूरी तरह से नष्ट कर देते हैं। शीर्ष अदालत के मुताबिक महिला, उसके माता-पिता और रिश्तेदारों के दिमाग में सबसे पहली चीज- पुलिस आती है। ऐसी धारणा होती है कि पुलिस ही सभी बुराईयों का रामबाण इलाज है, लेकिन मामला पुलिस तक पहुंचते ही पति-पत्नी के बीच सुलह की बची-खुची संभावना भी खत्म हो जाती है। खंडपीठ ने कहा, अदालत को देखना चाहिए कि प्रत्येक मामले में क्रूरता का निर्धारण ठीक तरीके से हो। सभी झगड़ों को सही दृष्टिकोण से तौला जाना चाहिए। हमेशा दोनों की शारीरिक और मानसिक स्थिति, उनके चरित्र और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना चाहिए। बहुत मशीनी तरीके अपनाने और हाइपर -संवेदनशील दृष्टिकोण से निर्णय करना विवाह जैसे संबंध के लिए विनाशकारी साबित होंगे।
अच्छे विवाह पर शीर्ष अदालच की टिप्पणी
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, एक अच्छे विवाह की नींव सहिष्णुता, समायोजन और एक-दूसरे का सम्मान करना है। एक-दूसरे की गलतियों को एक निश्चित सहनीय सीमा तक सहन करना हर विवाह में अंतर्निहित होना चाहिए। छोटी-मोटी नोक-झोंक, छोटे-मोटे मतभेद सांसारिक मामले हैं। इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा, पूरे मामले को संवेदनशीलता से संभालने के बजाय, आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से एक-दूसरे के लिए नफरत के अलावा कुछ नहीं आएगा। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट में दायर याचिका ने पति ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की अपील की थी, लेकिन अदालत ने याचिका खारिक कर दी।
महिला के खिलाफ क्रूरता पर बोला सुप्रीम कोर्ट- भारतीय न्याय संहिता में बदलाव पर विचार करे केंद्र
कानून की धाराओं में क्या है?
बता दें कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 के मुताबिक किसी भी महिला का पति या पति का रिश्तेदार उसके साथ क्रूरता करेगा, उसे तीन साल तक की कैद की सजा दी जाएगी। हिंसा के उत्तरदायी होने पर भी जेल भेजा जाएगा। धारा 86 में 'क्रूरता' की परिभाषा का विस्तार किया गया है। अब क्रूरता के दायरे में महिला को मानसिक और शारीरिक दोनों तरह की हानि पहुंचाना शामिल है। गौरतलब है कि 1 जुलाई से ये कानूनी प्रावधान देशभर में लागू हो जाएंगे।