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Supreme Court: अनिल अंबानी समूह से जुड़े बैंकिंग घोटाले पर सुनवाई टली, सुप्रीम कोर्ट ने 8 मई की तारीख तय की
Thu, 30 Apr 2026 02:35 PM IST
Shivam Garg
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Shivam Garg
Updated Thu, 30 Apr 2026 02:35 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (ADAG) से जुड़े कथित बड़े बैंकिंग घोटाले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई को 8 मई तक के लिए टाल दिया है। यह मामला हजारों करोड़ रुपये के कथित लोन फ्रॉड से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसे पूर्व नौकरशाह ई. ए. एस. सरमा ने दायर किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अनिल अंबानी समूह की कंपनियों ने 40,000 करोड़ रुपये से अधिक के बैंक लोन में धोखाधड़ी की है और इस मामले की अदालत की निगरानी में जांच होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सीबीआई और ईडी ने अदालत के पिछले आदेश के अनुसार नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की है। दोनों एजेंसियां इस मामले की जांच कर रही हैं और कई वित्तीय पहलुओं पर काम जारी है।याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि जांच में देरी हो रही है और कथित मुख्य आरोपी के खिलाफ अब तक गिरफ्तारी नहीं हुई है।
अनिल अंबानी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत से आग्रह किया कि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। उन्होंने कहा कि कई महत्वपूर्ण तथ्य अभी तक अदालत के सामने पूरी तरह प्रस्तुत नहीं किए गए हैं।
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हवाई किराए और अतिरिक्त शुल्क पर नियंत्रण की मांग
सुप्रीम कोर्ट एक अन्य महत्वपूर्ण याचिका पर भी विचार करेगा, जिसमें निजी एयरलाइंस द्वारा लगाए जा रहे अनियमित और अस्थिर हवाई किराए तथा अतिरिक्त शुल्कों (Ancillary Charges) पर नियंत्रण के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि अचानक बढ़ते किराए आम यात्रियों पर आर्थिक बोझ डालते हैं।
ट्रॉमा केयर व्यवस्था को मजबूत करने की याचिका
अदालत में एक जनहित याचिका पर भी सुनवाई होगी, जिसमें देश में ट्रॉमा केयर यानी आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को बेहतर बनाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि सड़क दुर्घटनाओं और अन्य आपात स्थितियों में समय पर इलाज न मिलने से कई लोगों की जान चली जाती है।
न्यायिक सेवा नियमों की समीक्षा पर सुनवाई
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट उन याचिकाओं पर भी सुनवाई करेगा, जिनमें न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए अनिवार्य तीन साल की वकालत की शर्त को लेकर दिए गए पहले के फैसले की समीक्षा की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह नियम कई योग्य उम्मीदवारों के लिए अवसर सीमित कर सकता है।
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सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सीबीआई और ईडी ने अदालत के पिछले आदेश के अनुसार नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की है। दोनों एजेंसियां इस मामले की जांच कर रही हैं और कई वित्तीय पहलुओं पर काम जारी है।याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि जांच में देरी हो रही है और कथित मुख्य आरोपी के खिलाफ अब तक गिरफ्तारी नहीं हुई है।
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अनिल अंबानी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत से आग्रह किया कि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। उन्होंने कहा कि कई महत्वपूर्ण तथ्य अभी तक अदालत के सामने पूरी तरह प्रस्तुत नहीं किए गए हैं।
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हवाई किराए और अतिरिक्त शुल्क पर नियंत्रण की मांग
सुप्रीम कोर्ट एक अन्य महत्वपूर्ण याचिका पर भी विचार करेगा, जिसमें निजी एयरलाइंस द्वारा लगाए जा रहे अनियमित और अस्थिर हवाई किराए तथा अतिरिक्त शुल्कों (Ancillary Charges) पर नियंत्रण के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि अचानक बढ़ते किराए आम यात्रियों पर आर्थिक बोझ डालते हैं।
ट्रॉमा केयर व्यवस्था को मजबूत करने की याचिका
अदालत में एक जनहित याचिका पर भी सुनवाई होगी, जिसमें देश में ट्रॉमा केयर यानी आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को बेहतर बनाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि सड़क दुर्घटनाओं और अन्य आपात स्थितियों में समय पर इलाज न मिलने से कई लोगों की जान चली जाती है।
न्यायिक सेवा नियमों की समीक्षा पर सुनवाई
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट उन याचिकाओं पर भी सुनवाई करेगा, जिनमें न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए अनिवार्य तीन साल की वकालत की शर्त को लेकर दिए गए पहले के फैसले की समीक्षा की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह नियम कई योग्य उम्मीदवारों के लिए अवसर सीमित कर सकता है।
एनसीएलटी में समाधान योजना को मंजूरी में देरी पर स्वत:संज्ञान
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) की विभिन्न पीठों में समाधान योजना की मंजूरी में हो रही देरी पर स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने एनसीएलटी में स्टाफ और बुनियादी ढांचे की कमी पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि इस समस्या को युद्धस्तर पर हल करने की आवश्यकता है। सुनवाई के दौरान पीठ ने एनसीएलटी की प्रधान पीठ की रिपोर्ट पर गौर किया। रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में 383 आवेदन ऐसे हैं जिनमें समाधान योजना की मंजूरी लंबित है। इन मामलों में देरी एक महीने से लेकर 700 दिनों से अधिक तक की है, जो प्रक्रिया की धीमी गति को दर्शाती है।
भूमि विवादों के लिए अलग न्यायिक सेवा की मांग पर केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने भूमि विवादों के निपटारे के लिए अलग राजस्व न्यायिक सेवा बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों से जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र, विधि आयोग सहित अन्य को नोटिस जारी किया। यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दायर की है। याचिका में कहा गया कि देश में करीब 66 प्रतिशत सिविल मामले भूमि विवादों से जुड़े हैं, लेकिन इनका निपटारा ऐसे राजस्व अधिकारी करते हैं, जिनके पास विधिक शिक्षा या न्यायिक प्रशिक्षण नहीं होता। इससे फैसलों में असंगति और त्रुटियां सामने आती हैं। याचिका के अनुसार, इस व्यवस्था से संपत्ति अधिकारों को लेकर अनिश्चितता बढ़ती है। मुकदमों की संख्या और लागत में वृद्धि होती है, जिससे नागरिकों को न्याय पाने में कठिनाई होती है। इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन के रूप में भी बताया गया है। याचिका में मांग की गई है कि भूमि से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले अधिकारियों के लिए न्यूनतम कानूनी योग्यता और प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए। साथ ही इन मामलों की निगरानी उच्च न्यायालयों की ओर से की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) की विभिन्न पीठों में समाधान योजना की मंजूरी में हो रही देरी पर स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने एनसीएलटी में स्टाफ और बुनियादी ढांचे की कमी पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि इस समस्या को युद्धस्तर पर हल करने की आवश्यकता है। सुनवाई के दौरान पीठ ने एनसीएलटी की प्रधान पीठ की रिपोर्ट पर गौर किया। रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में 383 आवेदन ऐसे हैं जिनमें समाधान योजना की मंजूरी लंबित है। इन मामलों में देरी एक महीने से लेकर 700 दिनों से अधिक तक की है, जो प्रक्रिया की धीमी गति को दर्शाती है।
भूमि विवादों के लिए अलग न्यायिक सेवा की मांग पर केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने भूमि विवादों के निपटारे के लिए अलग राजस्व न्यायिक सेवा बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों से जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र, विधि आयोग सहित अन्य को नोटिस जारी किया। यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दायर की है। याचिका में कहा गया कि देश में करीब 66 प्रतिशत सिविल मामले भूमि विवादों से जुड़े हैं, लेकिन इनका निपटारा ऐसे राजस्व अधिकारी करते हैं, जिनके पास विधिक शिक्षा या न्यायिक प्रशिक्षण नहीं होता। इससे फैसलों में असंगति और त्रुटियां सामने आती हैं। याचिका के अनुसार, इस व्यवस्था से संपत्ति अधिकारों को लेकर अनिश्चितता बढ़ती है। मुकदमों की संख्या और लागत में वृद्धि होती है, जिससे नागरिकों को न्याय पाने में कठिनाई होती है। इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन के रूप में भी बताया गया है। याचिका में मांग की गई है कि भूमि से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले अधिकारियों के लिए न्यूनतम कानूनी योग्यता और प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए। साथ ही इन मामलों की निगरानी उच्च न्यायालयों की ओर से की जाए।
सूरत कारोबारी का 1,900 करोड़ रुपये का विवाद सुलझाने के लिए पूर्व सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना मध्यस्थ नियुक्त
सुप्रीम कोर्ट ने सूरत के एक कारोबारी विवाद के समाधान के लिए पूर्व सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ अशोकभाई हरिभाई गजेरा और अन्य की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट के 11 मार्च के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने गजेरा व अन्य की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिनमें 1,900 करोड़ रुपये की हेराफेरी और दस्तावेजों में जालसाजी के आरोपों से जुड़े एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान गजेरा के वकील मुकुल रोहतगी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी, जबकि शिकायतकर्ता प्रवीण देवकीनंदन अग्रवाल की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इसका विरोध करते हुए कहा कि 1,900 करोड़ रुपये की हेराफेरी के लिए कई दस्तावेजों में जालसाजी की गई। हालांकि, अदालत के सुझाव पर दोनों पक्ष विवाद को मध्यस्थता के जरिये सुलझाने पर सहमत हो गए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सीजेआई खन्ना को मामले में मध्यस्थ नियुक्त किया। अदालत ने पक्षकारों को उनके समक्ष पेश होने का निर्देश दिया और कहा कि मध्यस्थता की प्रक्रिया और शुल्क का निर्धारण खन्ना करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने सूरत के एक कारोबारी विवाद के समाधान के लिए पूर्व सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ अशोकभाई हरिभाई गजेरा और अन्य की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट के 11 मार्च के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने गजेरा व अन्य की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिनमें 1,900 करोड़ रुपये की हेराफेरी और दस्तावेजों में जालसाजी के आरोपों से जुड़े एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान गजेरा के वकील मुकुल रोहतगी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी, जबकि शिकायतकर्ता प्रवीण देवकीनंदन अग्रवाल की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इसका विरोध करते हुए कहा कि 1,900 करोड़ रुपये की हेराफेरी के लिए कई दस्तावेजों में जालसाजी की गई। हालांकि, अदालत के सुझाव पर दोनों पक्ष विवाद को मध्यस्थता के जरिये सुलझाने पर सहमत हो गए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सीजेआई खन्ना को मामले में मध्यस्थ नियुक्त किया। अदालत ने पक्षकारों को उनके समक्ष पेश होने का निर्देश दिया और कहा कि मध्यस्थता की प्रक्रिया और शुल्क का निर्धारण खन्ना करेंगे।