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SC: FIR खारिज होने के बाद क्लोजर रिपोर्ट फाइल करने के चलन पर शीर्ष कोर्ट हैरान, कहा- यह कानून के लिए अज्ञात

Wed, 19 Apr 2023 09:39 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Wed, 19 Apr 2023 09:39 PM IST
सार

जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि हम वास्तव में यह जानकर चौंक गए है कि जब किसी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया जाता है, तो मामले की क्लोजर रिपोर्ट कैसे हो सकती है। जब एफआईआर रद्द कर दी जाती है  तो सीआरपीसी की धारा 173 के तहत क्लोजर रिपोर्ट तैयार करने का कोई सवाल ही नहीं है।  

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Supreme Court shocked at Uttarakhand Police practice to file closure report even after FIR quashed Update news
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों द्वारा एफआईआर रद्द किये जाने के बाद भी आपराधिक मामलों में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने की उत्तराखंड पुलिस की प्रथा को चौंकाने वाला बताया है। बुधवार को उत्तराखंड सरकार द्वारा हाई कोर्ट के 27 अक्टूबर, 2020 के आदेश को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह टिप्पणी की। मामले में आदेश देते हुए जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने इस 'प्रथा' को 'कानून के लिए अज्ञात' प्रक्रिया बताया। साथ ही राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस प्रमुख को प्रदेश के सभी पुलिस स्टेशनों को यह बताने के लिए कहा कि जिन मामलों में एफआईआर दर्ज की गई है, वहां कोई क्लोजर रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाएगी।  

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जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि हम वास्तव में यह जानकर चौंक गए है कि जब किसी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया जाता है, तो मामले की क्लोजर रिपोर्ट कैसे हो सकती है। जब एफआईआर रद्द कर दी जाती है  तो सीआरपीसी की धारा 173 के तहत क्लोजर रिपोर्ट तैयार करने का कोई सवाल ही नहीं है।  
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शीर्ष अदालत का यह आदेश उत्तराखंड सरकार द्वारा हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर आया है। दरअसल, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दो पत्रकारों उमेश शर्मा और शिव प्रसाद सेमवाल के खिलाफ जुलाई 2020 में देहरादून में दर्ज एक प्राथमिकी को रद्द कर दिया था। जो कि राजद्रोह, धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश से संबंधित आईपीसी के विभिन्न प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ पत्रकारों द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों की सीबीआई जांच का आदेश दिया था।
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पत्रकारों द्वारा लगाए गए आरोप 2016 में झारखंड के 'गो सेवा आयोग' के प्रमुख के रूप में एक व्यक्ति की नियुक्ति के बदले में रावत के रिश्तेदारों के खातों में कथित रूप से धन हस्तांतरण से संबंधित थे। इन आरोपों पर हाई कोर्ट के फैसले के दो दिन बाद शीर्ष अदालत ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ आदेश पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि हाईकोर्ट का यह आदेश उनकी बात सुने बिना पारित किया गया था। 

उमेश शर्मा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अरुणाभ चौधरी ने अदालत से कहा कि मामले में जांच अधिकारी ने 'क्लोजर रिपोर्ट' दायर की है, जबकि हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ इस अदालत के समक्ष कार्यवाही लंबित है।इस दौरान शीर्ष अदालत को बताया गया कि यह उत्तराखंड में एक आम प्रथा है कि अदालतों द्वारा प्राथमिकी रद्द करने की स्थिति में एक आईओ केस डायरी में एक 'क्लोजर रिपोर्ट' दर्ज करता है।

अपने आदेश में शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा कि मामले के जांच अधिकारी ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने के लिए बिना शर्त माफी मांगी थी। साथ ही जांच अधिकारी द्वारा दायर हलफनामे को देखने से पता चलता है कि मामले में क्लोजर रिपोर्ट उनके द्वारा तैयार की गई थी और मजिस्ट्रेट के सामने पेश ना करके पुलिस स्टेशन में रखी गई थी। 


पीठ ने कहा कि जांच अधिकारी के कृत्य की अनदेखी करते हुए शीर्ष अदालत 27 अक्टूबर, 2020 के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की अपील पर गुण-दोष के आधार पर फैसला करने के लिए आगे बढ़ेगी।

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