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सुप्रीम कोर्ट: मौलिक कर्तव्यों के प्रति लोगों को जागरूक करने की मांग पर केंद्र और राज्यों को नोटिस, कोर्ट ने जनहित याचिका की स्वीकार 

Mon, 21 Feb 2022 07:49 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Mon, 21 Feb 2022 07:49 PM IST
सार

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ के समक्ष कुमार ने कहा कि इस मामले में केंद्र सरकार का रुख जानने की जरूरत है। संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो कहता है कि संविधान का भाग-चार (ए) लागू करने योग्य नहीं है।

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Supreme Court seeks reply from Modi Government states on plea seeking law for adherence to fundamental duties
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक कर्तव्यों के प्रति लोगों को जागरूक करने के कदम उठाने की मांग वाली जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए सोमवार को केंद्र व राज्यों को नोटिस जारी कर दिया। याचिकाकर्ता वकील दुर्गा दत्त के वकील रंजीत कुमार ने तर्क दिया कि हर व्यक्ति अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है लेकिन उसे कर्तव्यों की परवाह नहीं है। इसके बाद शीर्ष अदालत ने याचिका पर सुनवाई का निर्णय लिया। 

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जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ के समक्ष कुमार ने कहा कि इस मामले में केंद्र सरकार का रुख जानने की जरूरत है। संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो कहता है कि संविधान का भाग-चार (ए) लागू करने योग्य नहीं है। इस भाग को 1977 में संविधान में जोड़ा गया था, क्योंकि कर्तव्यों को मौलिक अधिकारों से प्रवाहित किया गया था। याचिका में कहा गया कि पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा ने 1998 में सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र लिखा था। जिसे बाद में  याचिका में तब्दील कर दिया गया था। 
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सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में केंद्र को संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों पर विचार करने व लागू करने के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश दिया था। रिपोर्ट में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के संचालन और उनके शीघ्र कार्यान्वयन पर जस्टिस जेएस वर्मा समिति के सुझाव को स्वीकार कर लिया गया था। 
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समिति ने केंद्र व राज्य सरकारों को लोगों को संवेदनशील बनाने व मौलिक कर्तव्यों के बारे में नागरिकों के बीच सामान्य जागरूकता पैदा करने के साथ कई सिफारिशें की थीं। हालांकि इस अदालत की उक्त सिफारिशों और निर्देशों के बावजूद आवश्यक उचित संवेदीकरण, पूर्ण संचालन और मौलिक कर्तव्यों का प्रवर्तन को लेकर कुछ नहीं हुआ और एक मायावी लक्ष्य बना हुआ है।

पीएम मोदी, नायडू और पूर्व सीजेआई के बयानों का हवाला
याचिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई व एसए बोबडे के हालिया बयानों का भी हवाला दिया गया है। इन बयानों में नागरिकों के लिए मौलिक कर्तव्यों के महत्व को रेखांकित किया गया था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि विरोध करने की अवैध प्रवृत्ति के नए चलन को देखते हुए मौलिक कर्तव्य को लागू करने की आवश्यकता है। बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में सड़कों व रेल मार्गों को अवरुद्ध करने और सार्वजनिक संपत्तियों का नुकसान कर सरकार को मांगों को मानने के लिए मजबूर किया जा रहा है।


अधिकारों की चाह रखने वालों को कर्तव्यों का भी भान रहे
याचिका में कहा गया कि मौलिक अधिकारों की चाह रखने वालों को उनके कर्तव्यों का भी भान होना जरूरी है। मौलिक कर्तव्यों का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को एक निरंतर स्मरण कराना है कि संविधान से उन्हें जो मौलिक अधिकार मिले हैं उसके लिए कुछ लोकतांत्रिक आचरण और लोकतांत्रिक व्यवहार के कुछ बुनियादी मानदंडों का पालन करना भी जरूरी है। मौलिक अधिकार और कर्तव्य एक दूसरे से जुड़े हैं। 

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