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अदालती फैसला धार्मिक ग्रंथ नहीं, जिसे संशोधित या सुधारा न जाए: सुप्रीम कोर्ट

Fri, 25 Oct 2019 06:39 AM IST
संजीव कुमार झा राजीव सिन्हा, अमर उजाला
राजीव सिन्हा, अमर उजाला Published by: संजीव कुमार झा Updated Fri, 25 Oct 2019 06:39 AM IST
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Supreme court says the court verdict is not a religious text that should not be revised or corrected
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालती फैसला धार्मिक ग्रंथ की तरह नहीं है जिसे संशोधित या सही नहीं किया जाए। शीर्ष अदालत ने कहा है कि फैसला कोई विराम-स्थल नहीं है बल्कि सोपान है। जस्टिस अरूण मिश्रा ने ये टिप्पणी भूमि अधिग्रहण में मुआवजे से संबंधित मामले में पांच सदस्यीय पीठ से खुद को अलग करने से इनकार करते हुए की है। जस्टिस मिश्रा ने अपने वृहत आदेश में कहा है कि उनका इस मामले की सुनवाई हट जाना बड़ी गलती’ होगी क्योंकि पीठ के अन्य चार सदस्यों का भी मानना है कि जस्टिस मिश्रा को इस मामले की सुनवाई के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
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अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ इसलिए कि किसी जज को बड़ी पीठ ने शामिल नहीं होना चाहिए कि वह उस मसले पर पूर्व में एक फैसले के जरिए अपनी राय व्यक्त कर चुके हैं, यह सुनवाई से अलग होने का आधार नहीं हो सकता। अगर ऐसा होगा तो कोई भी जज पुनर्विचार, सुधारात्मक या बड़ी पीठ के पास भेजे गए रेफरेंस का हिस्सा नहीं हो पाएगा।
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साथ ही संविधान पीठ ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि शीर्ष अदालत में ऐसा कोई भी जज नहीं होगा जिसने पूर्व में भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा-24 को लेकर पूर्व में कोई राय नहीं दी होगी। अगर याचिकाकर्ताओं द्वारा किसी जज को सुनवाई से अलग करने की मांग को स्वीकार कर लिया गया तो किसी भी जज के पास न्यायिक स्तर पर इस मसले का सुनने का अधिकार नहीं होगा। पीठ ने कहा कि हम हर दिन समानप्रावधान या थोड़े अलग प्रावधान से गुजरते हैं। ऐसे में पूर्व में जज में पूर्व में लिया गया कोई विचार, सुनवाई से अलग होने का आधार नहीं हो सकता।
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कोई भी फैसला विराम-स्थल नहीं होता है

Supreme court says the court verdict is not a religious text that should not be revised or corrected
अयोध्या मामला - फोटो : Amar Ujala

कोई भी फैसला विराम-स्थल नहीं होता है

शीर्ष अदालत ने कहा, हमें फैसले को सही करना होता है, मामले केस्वरूप को देखते हुए स्वतंत्र रूप से कानून को परीक्षण करना होता है। कोई भी फैसला विराम-स्थल नहीं होता है। यह सोपान है। यह धर्म-ग्रंथ की तरह नहीं होता है जिसे संशोधित या सही न किया जाए।’

फैसले में यह भी कहा गया कि शीर्ष अदालत में ही नहीं बल्कि हाईकोर्ट में भी परंपरा रही है कि अगर किसी मसले को बड़ी पीठ केपास भेजा गया तो पूर्व में मसले पर परीक्षण करने वाले जज को बड़ी पीठ में शामिल किया जाता है। दिल्ली हाईकोर्ट के नियम में यह बात कही गई है।

साथ ही फैसले में पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यह भी कहा है कि कोई याचिकाकर्ता यह नहीं तय कर सकता कि पीठ में कौन सदस्य हों। अगर ऐसा हुआ तो यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के खिलाफ होगा। ऐसे में पक्षकार अपने मनमाफिक पीठ द्वारा सुनवाई की बात करेंगे। साथ ही ऐसा होने से फोरम-शॉपिंग की बाढ़ आ जाएगी। फैसले में यह भी कहा गया कि पूरी न्यायिक व्यवस्था, पुख्ता संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित होता है।

किस मामले को सुनवाई के लिए किस जज के पास भेजा जाए, यह अधिकार चीफ जस्टिस केपास होता है जिससे कि पक्षकार अपने हिसाब से जजों का चयन न कर सकें। अगर याचिकाकर्ता किसी जज से सुनवाई से अलग करने की गुहार करने लगे तो यह एक मायने में चीफ जस्टिस केमास्टर ऑफ रोस्टर केअधिकार पर चोट करना है।

सुप्रीम कोर्ट ने नोट दाखिल करने  की इजाजत दी

Supreme court says the court verdict is not a religious text that should not be revised or corrected
अयोध्या मंदिर विवाद

सुप्रीम कोर्ट ने नोट दाखिल करने  की इजाजत दी

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद केमामले के एक अन्य पक्षकार उमेश चंद्र पांडेय ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में मोल्डिंग ऑफ रिलीफ पर नोट दाखिल किया है। उमेश चंद्र पांडेय की ओर से पेश वरिष्ठ वकील वी शेखर ने  गुरुवार को चीफ जस्टिस रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ से गुहार लगाई कि वह मोल्डिंग ऑफ रिलीफ पर अपना नोट दाखिल करने की इजाजत मांगी। जिस पर चीफ जस्टिस ने हल्के अंदाज में कहा, क्या अयोध्या मामला अभी भी चल रहा है। हमें तो लगता है कि मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी है।’ हालांकि चीफ जस्टिस ने वी शेखर को नोट दाखिल करने की इजाजत दे दी।

पांडेय ने अपने नोट में कहा है कि अगर सुन्नी वक्फ बोर्ड या रामलला विराजमान का विवादित जमीन पर मालिकाना हक का दावा साबित न हुआ तो विवादित जमीन सरकार को सौंप दी जाए। इसके बाद सरकार यह तय करे कि इस जमीन का क्या करना है। मालूम हो कि गत 16 अक्टूबर को चीफ जस्टिस रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखते हुए पक्षकारों को तीन दिनों के भीतर मोल्डिंग ऑफ रिलीफ पर लिखित जवाब दाखिल करने केलिए कहा था। हालांकि तीन दिनों की समयसीमा खत्म होने केबाद भी पक्षकारों द्वारा नोट दाखिल करने का दौर जारी है।

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