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Supreme Court: 'योग्य महिला करियर बनाना चाहे तो यह क्रूरता या परित्याग नहीं', अदालत की 'सुप्रीम' टिप्पणी
Tue, 12 May 2026 08:42 PM IST
Devesh Tripathi
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Tue, 12 May 2026 08:42 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक सुशिक्षित और पेशेवर रूप से योग्य महिला से केवल वैवाहिक दायित्वों की कठोर सीमाओं में बंधे रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती। विवाह उसकी व्यक्तिगत पहचान को धूमिल नहीं करता, न ही यह उसके पति के अधीन उसकी पहचान को दबाता है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि एक योग्य महिला का अपने करियर को आगे बढ़ाने, अपने बच्चे के लिए एक स्थिर और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने का फैसला क्रूरता या परित्याग के रूप में नहीं देखा जा सकता। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि एक महिला दंत चिकित्सक के अपने पेशेवर करियर को आगे बढ़ाने के प्रयास को क्रूरता और परित्याग करार देना फैमली कोर्ट का सामंती दृष्टिकोण है, जो पिछड़ा और अति रूढ़िवादी है।
यह मामला एक अलग रह रहे पति-पत्नी द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने निचली अदालतों के पिछड़े निष्कर्षों को रद्द करते हुए कहा कि पत्नी की पेशेवर पहचान निहित वैवाहिक वीटो के अधीन नहीं है।
ये भी पढ़ें: Sabarimala Verdict: धार्मिक स्वतंत्रता सर्वोपरि या सामाजिक सुधार? सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
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पीठ ने महिला की इस दलील पर भी ध्यान दिया कि वह अब सुलह की कोई उम्मीद नहीं रखती है। इसलिए, अदालत ने निचली अदालतों द्वारा दी गई तलाक की डिक्री को विवाह के टूटने के आधार पर बरकरार रखा, न कि महिला द्वारा क्रूरता या परित्याग के आधार पर।
फैमली कोर्ट की सामंती सोच की आलोचना
सुप्रीम कोर्ट ने फैमली कोर्ट की उस सोच की कड़ी आलोचना की, जिसे गुजरात हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। पीठ ने कहा कि 21वीं सदी में भी एक योग्य महिला द्वारा अपने पेशेवर करियर को आगे बढ़ाने और अपने बच्चे के लिए एक सुरक्षित व स्थिर माहौल सुनिश्चित करने के प्रयास को निचली अदालतों द्वारा क्रूरता और परित्याग का कार्य माना गया है।
फैसले में महिला की स्वायत्तता और अधिकार पर जोर
न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि फैमली कोर्ट की टिप्पणियां न केवल कानूनी रूप से अस्थिर हैं बल्कि परेशान करने वाली भी हैं। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि महिला का अहमदाबाद में अपना डेंटल क्लिनिक स्थापित करने का प्रयास, अपनी अर्जित पेशेवर योग्यता को निष्क्रिय छोड़ने के बजाय, इसलिए अस्वीकार्य नहीं हो सकता क्योंकि यह पति और ससुराल वालों की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं था कि उसे सेना अधिकारी के रूप में पति की तैनाती के कारण दूरस्थ स्थान पर रहना होगा।
ये भी पढ़ें: Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का बड़ा फैसला, कलकत्ता हाईकोर्ट में 9 नए जजों की नियुक्ति की सिफारिश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों की यह सोच पुरानी सामाजिक मान्यताओं पर आधारित प्रतीत होती है कि एक पत्नी की पेशेवर पहचान विवाह में निहित वीटो के अधीन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी की स्वायत्तता को पति की भौगोलिक और व्यावसायिक मांगों के आगे झुकना नहीं चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए अलग रहने का उसका निर्णय वैवाहिक दायित्वों का उल्लंघन नहीं है।
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यह मामला एक अलग रह रहे पति-पत्नी द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने निचली अदालतों के पिछड़े निष्कर्षों को रद्द करते हुए कहा कि पत्नी की पेशेवर पहचान निहित वैवाहिक वीटो के अधीन नहीं है।
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पीठ ने महिला की इस दलील पर भी ध्यान दिया कि वह अब सुलह की कोई उम्मीद नहीं रखती है। इसलिए, अदालत ने निचली अदालतों द्वारा दी गई तलाक की डिक्री को विवाह के टूटने के आधार पर बरकरार रखा, न कि महिला द्वारा क्रूरता या परित्याग के आधार पर।
फैमली कोर्ट की सामंती सोच की आलोचना
सुप्रीम कोर्ट ने फैमली कोर्ट की उस सोच की कड़ी आलोचना की, जिसे गुजरात हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। पीठ ने कहा कि 21वीं सदी में भी एक योग्य महिला द्वारा अपने पेशेवर करियर को आगे बढ़ाने और अपने बच्चे के लिए एक सुरक्षित व स्थिर माहौल सुनिश्चित करने के प्रयास को निचली अदालतों द्वारा क्रूरता और परित्याग का कार्य माना गया है।
फैसले में महिला की स्वायत्तता और अधिकार पर जोर
न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि फैमली कोर्ट की टिप्पणियां न केवल कानूनी रूप से अस्थिर हैं बल्कि परेशान करने वाली भी हैं। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि महिला का अहमदाबाद में अपना डेंटल क्लिनिक स्थापित करने का प्रयास, अपनी अर्जित पेशेवर योग्यता को निष्क्रिय छोड़ने के बजाय, इसलिए अस्वीकार्य नहीं हो सकता क्योंकि यह पति और ससुराल वालों की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं था कि उसे सेना अधिकारी के रूप में पति की तैनाती के कारण दूरस्थ स्थान पर रहना होगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों की यह सोच पुरानी सामाजिक मान्यताओं पर आधारित प्रतीत होती है कि एक पत्नी की पेशेवर पहचान विवाह में निहित वीटो के अधीन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी की स्वायत्तता को पति की भौगोलिक और व्यावसायिक मांगों के आगे झुकना नहीं चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए अलग रहने का उसका निर्णय वैवाहिक दायित्वों का उल्लंघन नहीं है।
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