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Supreme Court: 'हर कानून के साथ संवैधानिकता की धारणा जुड़ी', सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
Mon, 16 Dec 2024 02:43 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Mon, 16 Dec 2024 02:43 PM IST
सार
याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने पूछा, 'कैसे एक अंतरिम आदेश के जरिए कानूनी प्रावधानों को निलंबित किया जा सकता है?
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई (फाइल)
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि हर कानून के साथ संवैधानिकता की धारणा जुड़ी होती है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी। याचिका में गुजरात सरकार के अशांत क्षेत्रों में संपत्तियों पर 1991 के कानून के कुछ प्रावधानों को निलंबित करने की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की
याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने पूछा, 'कैसे एक अंतरिम आदेश के जरिए कानूनी प्रावधानों को निलंबित किया जा सकता है? हर कानून के साथ संवैधानिकता की धारणा जुड़ी होती है।' गौरतलब है कि गुजरात उच्च न्यायालय ने याचिका दायर कर गुजरात के संपत्ति कानून, 1991 के अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक और अशांत क्षेत्रों में किरायेदारों को बेदखल किए जाने से बचाने के प्रावधानों को निलंबित करने की मांग की गई थी, लेकिन 28 अक्टूबर को गुजरात उच्च न्यायालय ने उस याचिका को खारिज कर दिया था।
हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाली अपनी याचिका को लेकर उच्च न्यायालय जा सकते हैं। शीर्ष न्यायालय ने कहा, 'हम उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं और याचिका को खारिज किया जाता है।'
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सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की
याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने पूछा, 'कैसे एक अंतरिम आदेश के जरिए कानूनी प्रावधानों को निलंबित किया जा सकता है? हर कानून के साथ संवैधानिकता की धारणा जुड़ी होती है।' गौरतलब है कि गुजरात उच्च न्यायालय ने याचिका दायर कर गुजरात के संपत्ति कानून, 1991 के अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक और अशांत क्षेत्रों में किरायेदारों को बेदखल किए जाने से बचाने के प्रावधानों को निलंबित करने की मांग की गई थी, लेकिन 28 अक्टूबर को गुजरात उच्च न्यायालय ने उस याचिका को खारिज कर दिया था।
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हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाली अपनी याचिका को लेकर उच्च न्यायालय जा सकते हैं। शीर्ष न्यायालय ने कहा, 'हम उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं और याचिका को खारिज किया जाता है।'
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