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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय की नीति पर होगी अनुकंपा नियुक्ति, बाद की नीति पर नहीं
Thu, 18 Nov 2021 09:16 PM IST
गौरव पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Thu, 18 Nov 2021 09:16 PM IST
सार
मध्यप्रदेश सरकार की ओर से दाखिल की गई एक अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए मृतक सरकारी कर्मचारी की मौत के समय जो नीति होगी उसी पर विचार किया जाएगा न कि उसके बाद लागू होने वाली नीति पर। पढ़िए पूरा मामला...
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सर्वोच्च न्यायालय
- फोटो : पीटीआई
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय प्रचलित नीति का पालन आश्रित को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति देने या अस्वीकार करने के लिए किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की एक खंड पीठ के एक फैसले को रद्द करते हुए की। खंड पीठ ने अपने फैसले में राज्य सरकार से उस व्यक्ति को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने के लिए कहा था जिसके पिता की सेवा के दौरान मृत्यु हो गई थी।
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यह फैसला ऐसी नियुक्ति के लिए लागू होने वाली संशोधित नीति के तहत दिया गया था। नीति के अनुसार, जब कर्मचारी अपनी मृत्यु के समय काम कर रहा था, आश्रित अनुकंपा के आधार पर किसी भी नियुक्ति का हकदार नहीं था। नियुक्ति को रद्द करते हुए न्यायाधीश एमआर शाह और संजीव खन्ना की पीठ ने विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में मृत्यु के समय प्रचलित नीति पर विचार करने की आवश्यकता है, न कि बाद की नीति पर।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला मध्यप्रदेश सरकार की ओर से दाखिल की गई एक अपील पर सुनाया है। राज्य सरकार, हाईकोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं थी। इस मामले में जिसे अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया गया था उसके पिता टीकमगढ़ जिला कार्यालय में चौकीदार थे। आठ अक्टूबर 2015 को उनका निधन हो गया था। इसके बाद मृतक कर्मचारी के बेटे को उस समय की नीति के तहत दो लाख रुपये की अनुग्रह राशि दी गई थी।
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इसके बाद 31 अगस्त 2016 को एक सर्कुलर के जरिए अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की नीति में संशोधन किया गया था। संशोधन के बाद इसमें प्रावधान किया गया कि अगर कर्मचारी की मौत काम करते हुए होती है तो भी उसके एक आश्रित को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति दी जाएगी। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इसी नीति के आधार पर व्यक्ति को नियुक्ति देने का आदेश सुनाया था। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट ने इस नियुक्ति पर रोक लगा दी है।