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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को शिक्षा का हक देने के लिए योजना बनाएं केंद्र और राज्य
Fri, 08 Oct 2021 09:17 PM IST
गौरव पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Fri, 08 Oct 2021 09:17 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि सरकारों को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और इस ओर ठोस कदम उठाने चाहिए।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : पेक्सेल्स
विस्तार
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के बच्चों की दशा पर चिंता जाहिर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा, अगर शिक्षा के अधिकार को धरातल पर लाना है केंद्र सरकार और राज्यों को इन बच्चों के लिए वास्तविक योजना तैयार करनी होगी। महामारी के दौरान चली ऑनलाइन कक्षाओं के चलते पढ़ाई से दूर रहे इन बच्चों की सुध लेने की जरूरत है और ऐसी ठोस योजना बनानी होगी जिसका लंबे समय तक इन्हें लाभ मिले। तभी शिक्षा का अधिकार सच साबित होगा।
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न्यायधीश डीवाई चंद्रचूड़ और बीवी नागरत्न की पीठ ने कहा, अनुच्छेद 21ए का हकीकत बनना बेहद जरूरी है और इसके लिए जरूरी है कि कमजोर वर्ग के बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा से जोड़ा जाए। इनके इससे दूर रहते शिक्षा का अधिकार कभी पूरा नहीं हो सकता। पीठ ने कहा, आजकल स्कूलों में ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है, बच्चों को होमवर्क ऑनलाइन मिलता है और वहीं उन्हें काम करके जमा करना होता है। अगर गरीब बच्चे सिर्फ इसलिए ऐसा नहीं कर पाते कि उनके पास स्मार्टफोन या इंटरनेट नहीं तो शिक्षा के अधिकार की सभी कवायद बेकार हैं।
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पीठ ने कहा, हम दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं। जजों ने इसमें अपने दिल की बात रखी है। पीठ ने अपने आदेश में कहा, इस मामले में दिल्ली सरकार को ऐसी योजना पेश करनी ही होगी जिससे इन बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई की सभी जरूरी सुविधाएं मुहैया हों। केंद्र को भी इसमें सहयोग करते हुए दीर्घकालिक योजना तैयार करनी चाहिए। पीठ गैर सहायता वाले मान्यता प्राप्त स्कूलों की कार्रवाई समिति की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के पिछले साल 18 सितंबर को आए आदेश को चुनौती दी गई थी।
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दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया था यह अहम फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने निजी और सरकारी स्कूलों को ऑनलाइन कक्षाओं के लिए गरीब बच्चों को स्मार्टफोन और इंटरनेट पैकेज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट के इस फैसले को दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार ने चुनौती दी थी। दिल्ली सरकार ने अपनी दलील में कहा था कि हमारे पास इतने संसाधन नहीं हैं। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी को इस पर रोक लगाते हुए गैर सहायता प्राप्त स्कूलों की याचिका को इस मामले से जुड़ी अन्य याचिकाओं से जोड़ दिया था।
बच्चों के बीच असमानता दिल दहलाने जैसी बात
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, बच्चों के बीच यह असमानता दिल दहलाने जैसी बात है। आखिर गरीब परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए लैपटॉप और टैबलेट कैसे लाएंगे। इनके अभाव में बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कैसे करेंगे। इनकी मां लोगों के घरों में काम करती हैं, पिता गाड़ी चलाते हैं या मजदूरी करते हैं। आखिर ये लैपटॉप, इंटरनेट कैसे मुहैया कराएंगे।
अभाव के कारण बच्चे पढ़ाई छोड़ने को मजबूर
जस्टिस नागरत्न ने कहा, इसी अभाव के कारण पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ये बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं। इसी के कारण बाल विवाह और बच्चों की तस्करी के मामले भी बढ़ रहे हैं। इन खतरों को दूर करने के लिए ऐसी योजना बनानी होगी जिससे इन बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जरूरी हर सुविधा मुहैया हो सके और इनके लिए शिक्षा का अधिकार हकीकत बने। ऐसे बच्चों की जिम्मेदारी सरकार की है।