सुप्रीम कोर्ट: 'बंधुआ मजदूरी पर रोक सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रह सकती', अदालत ने केंद्र को क्या निर्देश दिए?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बंधुआ मजदूरी पर संवैधानिक रोक सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रह सकती। अदालत ने केंद्र को छह महीने में देशभर में एक समान एसओपी लागू करने और मुक्त मजदूरों को रिहाई प्रमाणपत्र के सात दिनों के भीतर आर्थिक मदद देने का निर्देश दिया है। सुरेंद्र मांझी को सहायता मिलने में तीन साल लगे थे। आखिर मजदूरों के पुनर्वास के लिए क्या बदलेगा? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
विस्तार
बंधुआ मजदूरी से मुक्ति मिलने के बाद भी मजदूरों को अगर आर्थिक मदद और रोजगार का सहारा नहीं मिलता है तो वे दोबारा शोषण के जाल में फंस सकते हैं। इसी चिंता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बंधुआ मजदूरी खत्म करने से जुड़े कानून और पुनर्वास योजना को प्रभावी तरीके से लागू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि संविधान में बंधुआ मजदूरी पर रोक लगाने का प्रावधान सिर्फ कागजों पर लिखी बात बनकर नहीं रह सकता। मजदूरों को शोषण से मुक्त कराना ही सरकार की जिम्मेदारी पूरी होने के लिए काफी नहीं है, बल्कि उन्हें सम्मान से जीवन जीने के लिए जरूरी मदद भी देनी होगी। अदालत ने केंद्र को छह महीने के भीतर इस संबंध में एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू करने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने बंधुआ मजदूरी व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 और उससे जुड़ी पुनर्वास योजना को लागू करने के लिए कई निर्देश जारी किए। अदालत दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए लोगों को तुरंत आर्थिक सहायता देने में देरी और उनकी पहचान, रिहाई तथा पुनर्वास की व्यवस्था में कमियों का मुद्दा उठाया गया था। पीठ ने कहा कि बंधुआ मजदूरी से मुक्ति, पहचान और पुनर्वास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी मजदूर को आजाद कराने के बाद खत्म नहीं होती। संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 के तहत सम्मानजनक जीवन और शोषण के खिलाफ अधिकार सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
मजदूरों को रिहाई के बाद कितने दिनों में मिलेगी आर्थिक मदद?
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए व्यक्ति को रिहाई प्रमाणपत्र जारी होने के बाद आमतौर पर सात दिनों के भीतर तत्काल आर्थिक सहायता मिल जानी चाहिए। इसके लिए जरूरी सत्यापन किया जा सकता है, लेकिन केवल इस वजह से मदद नहीं रोकी जा सकती कि मामले की जांच या आपराधिक मुकदमा अभी चल रहा है। अगर संबंधित व्यक्ति योजना की शर्तें पूरी करता है तो उसे सहायता दी जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि बंधुआ मजदूरी से मुक्त होने वाले व्यक्ति के पास अक्सर कमाई का कोई दूसरा साधन नहीं होता। ऐसे में उसे तुरंत आर्थिक मदद और पुनर्वास की जरूरत होती है। अगर यह सहायता महीनों या वर्षों बाद मिले तो उसका उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। मजदूर को समय पर मदद नहीं मिलने से उसके दोबारा शोषण का खतरा बना रहता है।
सुरेंद्र मांझी के मामले में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
पीठ ने याचिकाकर्ता सुरेंद्र मांझी के मामले का उदाहरण भी दिया। उन्हें 2019 में बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराया गया था, लेकिन तत्काल आर्थिक सहायता 2022 में मिली। यानी रिहाई के करीब तीन साल बाद उन्हें मदद मिल सकी। अदालत ने यह भी बताया कि मांझी के साथ मुक्त कराए गए 17 अन्य मजदूरों को अब तक आर्थिक सहायता नहीं मिली थी। इस मामले से यह स्पष्ट हुआ कि मजदूरों को बचाने के बाद उनके पुनर्वास में कितनी देरी हो सकती है। अदालत ने कहा कि ऐसे लोगों को केवल आजाद कर देना पर्याप्त नहीं है। उनके पास जीवन चलाने के लिए आर्थिक साधन होने चाहिए, ताकि वे फिर से मजबूरी में बंधुआ मजदूरी या किसी दूसरे तरह के शोषण में न फंसें।
पुनर्वास योजना में बदलाव के लिए केंद्र को कितना समय मिला?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पुनर्वास योजना में प्रस्तावित बदलावों पर तीन महीने के भीतर उचित फैसला लेने का निर्देश दिया। इन बदलावों में तत्काल आर्थिक सहायता की रकम बढ़ाना, पुनर्वास की प्रक्रिया आसान करना, अलग-अलग राज्यों से जुड़े मामलों में अधिकारियों की जिम्मेदारी स्पष्ट करना और पुनर्वास लाभ मिलने में देरी होने पर अंतरिम जीवन-यापन सहायता देने का प्रस्ताव शामिल है। अदालत ने कहा कि जब तक योजना में बदलाव लागू नहीं होते, तब तक मौजूदा योजना के तहत ही सहायता दी जाती रहेगी। इसके अलावा केंद्र को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) से सलाह लेकर तीन महीने के भीतर जरूरी अतिरिक्त दिशानिर्देश जारी करने को कहा गया है।
देशभर में बंधुआ मजदूरों की पहचान और रिहाई के लिए क्या व्यवस्था होगी?
अदालत ने केंद्र सरकार को छह महीने के भीतर पूरे देश में एक समान एसओपी लागू करने का निर्देश दिया है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी आदेश के छह महीने के भीतर जरूरी कदम उठाने होंगे। एसओपी में बंधुआ मजदूरी की शिकायतों की तुरंत जांच और मजदूरों को बचाने की प्रक्रिया तय होगी। अदालत ने कहा कि ऐसी शिकायतों का सत्यापन आमतौर पर 24 घंटे के भीतर किया जाना चाहिए और जरूरत पड़ने पर जल्द बचाव अभियान चलाया जाना चाहिए। केंद्र को रिहाई प्रमाणपत्र का एक समान प्रारूप भी तय करना होगा, जिसे सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश मान्यता देंगे। इससे दूसरे राज्य में मजदूरों को भेजने और उनके पुनर्वास के दौरान अलग-अलग प्रशासनिक नियमों के कारण होने वाली परेशानी दूर होगी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई सात महीने बाद तय की है, ताकि उसके निर्देशों के पालन की स्थिति की समीक्षा की जा सके।