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सबरीमाला मंदिर: सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को रोकने के लिए रखी 41 दिन ब्रह्मचर्य पालन की शर्त
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Updated Fri, 20 Jul 2018 08:04 AM IST
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Supreme Court
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केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को सुप्रीम कोर्ट ने अतार्किक करार दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि मंदिर में प्रवेश के लिए 41 दिन ब्रह्मचर्य पालन की शर्त महिलाओं को रोकने के लिए ही रखी गई है। मामले में अमाइक क्यूरी राजू रामचंद्रन ने कहा कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी एक मायने में छुआछूत है और संविधान के अनुच्छेद-17 के तहत इस पर प्रतिबंध है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि मंदिर में प्रवेश के लिए 41 दिन वाली शर्त का मतलब है कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को मंदिर में कभी प्रवेश ही न दिया जाए। संविधान पीठ ने बृहस्पतिवार को यह टिप्पणी उस वक्त की जब ट्रावनकोर देवासम बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सबरीमाला स्थित अयप्पा मंदिर में धर्म या जाति के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है। देश में मौजूद सैकड़ों अयप्पा मंदिर में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। सबरीमाला में ब्रह्मचारी देव हैं इसलिए महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। मासिक धर्म के कारण महिलाएं ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर पाती हैं।
सिंघवी ने कहा कि यह विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां रजोधर्म आयुवर्ग (10 से 50 वर्ष) की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। रजोधर्म आयु वर्ग की महिलाओं को दूर रखना सामान्य परिपाटी है। इस पर जस्टिस नरीमन के पूछा, इसके पीछे आधार क्या है? यदि कोई लड़की का नौ साल की उम्र में ही मासिक धर्म शुरू हो जाए तब आपका तर्क क्या होगा? अगर मान लिया जाए कि महिलाएं 46 वर्ष की आयु रजोनिवृति को प्राप्त कर लेती हैं तो क्या उन्हें मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी कहा कि हर महिलाएं भगवान की देन हैं, ऐसे में रोजगार या पूजा अर्चना में उनके साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता। अगली सुनवाई 24 जुलाई को होगी।
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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि मंदिर में प्रवेश के लिए 41 दिन वाली शर्त का मतलब है कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को मंदिर में कभी प्रवेश ही न दिया जाए। संविधान पीठ ने बृहस्पतिवार को यह टिप्पणी उस वक्त की जब ट्रावनकोर देवासम बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सबरीमाला स्थित अयप्पा मंदिर में धर्म या जाति के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है। देश में मौजूद सैकड़ों अयप्पा मंदिर में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। सबरीमाला में ब्रह्मचारी देव हैं इसलिए महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। मासिक धर्म के कारण महिलाएं ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर पाती हैं।
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सिंघवी ने कहा कि यह विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां रजोधर्म आयुवर्ग (10 से 50 वर्ष) की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। रजोधर्म आयु वर्ग की महिलाओं को दूर रखना सामान्य परिपाटी है। इस पर जस्टिस नरीमन के पूछा, इसके पीछे आधार क्या है? यदि कोई लड़की का नौ साल की उम्र में ही मासिक धर्म शुरू हो जाए तब आपका तर्क क्या होगा? अगर मान लिया जाए कि महिलाएं 46 वर्ष की आयु रजोनिवृति को प्राप्त कर लेती हैं तो क्या उन्हें मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी कहा कि हर महिलाएं भगवान की देन हैं, ऐसे में रोजगार या पूजा अर्चना में उनके साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता। अगली सुनवाई 24 जुलाई को होगी।
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