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रोहिंग्या मामले में कानूनी पहलुओं पर बहस हो भावनाओं पर नहीं- सुप्रीम कोर्ट

Wed, 04 Oct 2017 06:04 AM IST
एजेंसी, नई दिल्ली
एजेंसी, नई दिल्ली Updated Wed, 04 Oct 2017 06:04 AM IST
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Supreme Court said that in Rohingya case debate only legal aspects
supreme court

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह 13 अक्तूबर को रोहिंग्या मुसलमानों की याचिका पर सुनवाई करने के लिए राजी है, लेकिन दोनों पक्षों से आग्रह है कि वे भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि कानूनी पहलुओं पर बहस की तैयारी के साथ आएं।

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रोहिंग्या शरणार्थियों ने उन्हें वापस म्यांमार भेजे जाने के केंद्र सरकार के रुख का विरोध करते हुए सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर की है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविल्कर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने कहा कि रोहिंग्या शरणार्थियों का मसला मानवीयता से जुड़ा है।
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इसलिए दोनों पक्ष एक दूसरे का सम्मान करते हुए अपनी दलीलें पेश करनी चाहिए। इसमें भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। पूरी बहस कानून के दायरे में होनी चाहिए। लिहाजा, अगली सुनवाई पर सभी दस्तावेज और अंतरराष्ट्रीय संधियों से जुड़े साक्ष्य खंडपीठ के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।
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केंद्र सरकार पहले ही इस याचिका का विरोध कर चुकी है। उसका कहना है कि इस मसले का फैसला अदालत में नहीं हो सकता है क्योंकि यह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

रोहिंग्या शरणार्थियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन ने केंद्र के इस रुख का विरोध करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत कोर्ट को इस याचिका पर सुनवाई करने का अधिकार है क्योंकि यह अनुच्छेद व्यक्तिगत अधिकारों की गारंटी देता है।

हमारा संविधान गैर-नागरिकों के अधिकारों का भी संरक्षण करता है। इस पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर टुकड़े में सुनवाई नहीं चाहती है। इसलिए, इस पर विस्तृत सुनवाई के लिए दिन भर का वक्त दिया जाए।


इससे पहले दाखिल हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि रोहिंग्या शरणार्थियों अवैध अप्रवासी हैं और उनमें से कई पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और आईएस जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े हैं और उनकी यहां रहना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। इसलिए उन्हें वापस म्यांमार भेज देना चाहिए।

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