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Supreme Court: 'एक जैसे सबूत और समान भूमिका के लिए अदालतें आरोपियों में भेदभाव नहीं कर सकतीं', जानिए मामला
Thu, 14 Sep 2023 08:28 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 14 Sep 2023 08:28 PM IST
सार
हाईकोर्ट ने मामले में सात आरोपियों की दोषसिद्धि की पुष्टि की थी लेकिन सजा को आजीवन कारावास से घटाकर 10 साल कर दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर दोषियों के खिलाफ एक जैसे सबूत हैं और दोनों की अपराध में भूमिका भी बराबर है तो अदालतें दोनों के बीच अंतर नहीं कर सकतीं। सुप्रीम कोर्ट ने डकैती और हत्या के चार आरोपियों को रिहा करते हुए यह टिप्पणी की। चारों को अदालत से 10-10 साल जेल की सजा मिली थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां सबूत समान हैं और भूमिका भी तो वहां आरोपियों के मामले 'समानता के सिद्धांत' से शासित होंगे।
क्या है मामला
जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने डकैती और हत्या के एक आरोपी को रिहा कर दिया। बता दें कि डकैती और हत्या के आरोपी संख्या छह जावेद शौकत अली कुरैशी ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में बताया गया कि इस मामले में कुल 13 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाया गया और सात आरोपियों को निचली अदालत ने दोषी ठहराया। उच्च न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि की पुष्टि की लेकिन सजा को आजीवन कारावास से घटाकर 10 साल कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अगस्त 2018 में मामले के तीन आरोपियों को रिहा कर दिया गया था, जबकि एक अन्य आरोपी की याचिका को खारिज कर दिया गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समान सबूत और समान भूमिका के बावजूद एक आरोपी को रिहा कर दूसरे को दोषी नहीं ठहरा सकती।
निष्कर्ष का लाभ समान रूप से दिया जाना चाहिए
कुरैशी के मामले में पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के दो गवाह, जिनके चश्मदीद गवाह होने का दावा किया गया था, वे पुलिस कांस्टेबल थे और उन्होंने दावा किया था कि नवंबर 2003 में घटना के समय अहमदाबाद में लगभग 1,000 से 1,500 लोगों की भीड़ घटनास्थल पर इकट्ठा हुई थी। पीठ ने कहा कि अन्य तीन आरोपियों की दोषसिद्धि इन दो कांस्टेबलों की गवाही पर आधारित थी और इन तीनों को बाद में शीर्ष अदालत ने बरी कर दिया था। उसने कहा कि शीर्ष अदालत की एक समन्वय पीठ ने उनकी गवाही को अविश्वसनीय होने के आधार पर पूरी तरह से खारिज कर दिया था, निष्कर्ष का लाभ अन्य आरोपियों को समान रूप से दिया जाना चाहिए।
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शीर्ष अदालत ने कहा, 'इसलिए, हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो लाभ आरोपी नंबर 1,5 और 13 (जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने बरी कर दिया था) को दिया गया है, वह आरोपी नंबर 3 और 4 को भी दिया जाना चाहिए, जिन्होंने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती नहीं दी थी।' पीठ ने कहा कि आरोपियों में से एक का मामला, जिसकी याचिका पहले खारिज कर दी गई थी, अन्य तीन के समान ही है, जिन्हें शीर्ष अदालत ने बरी कर दिया था।
अपील मंजूर करते हुए, पीठ ने निचली अदालत के मार्च 2006 के फैसले के साथ-साथ उच्च न्यायालय के फरवरी 2016 के फैसले को रद्द करके कुरेशी को बरी कर दिया। इसने मेहबूब खान अल्ला रखा और सैद खान को भी बरी कर दिया, जिन्होंने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं की थी। पीठ ने मामले में अमजद खान नासिर खान पठान को बरी कर दिया।
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क्या है मामला
जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने डकैती और हत्या के एक आरोपी को रिहा कर दिया। बता दें कि डकैती और हत्या के आरोपी संख्या छह जावेद शौकत अली कुरैशी ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में बताया गया कि इस मामले में कुल 13 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाया गया और सात आरोपियों को निचली अदालत ने दोषी ठहराया। उच्च न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि की पुष्टि की लेकिन सजा को आजीवन कारावास से घटाकर 10 साल कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अगस्त 2018 में मामले के तीन आरोपियों को रिहा कर दिया गया था, जबकि एक अन्य आरोपी की याचिका को खारिज कर दिया गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समान सबूत और समान भूमिका के बावजूद एक आरोपी को रिहा कर दूसरे को दोषी नहीं ठहरा सकती।
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निष्कर्ष का लाभ समान रूप से दिया जाना चाहिए
कुरैशी के मामले में पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के दो गवाह, जिनके चश्मदीद गवाह होने का दावा किया गया था, वे पुलिस कांस्टेबल थे और उन्होंने दावा किया था कि नवंबर 2003 में घटना के समय अहमदाबाद में लगभग 1,000 से 1,500 लोगों की भीड़ घटनास्थल पर इकट्ठा हुई थी। पीठ ने कहा कि अन्य तीन आरोपियों की दोषसिद्धि इन दो कांस्टेबलों की गवाही पर आधारित थी और इन तीनों को बाद में शीर्ष अदालत ने बरी कर दिया था। उसने कहा कि शीर्ष अदालत की एक समन्वय पीठ ने उनकी गवाही को अविश्वसनीय होने के आधार पर पूरी तरह से खारिज कर दिया था, निष्कर्ष का लाभ अन्य आरोपियों को समान रूप से दिया जाना चाहिए।
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शीर्ष अदालत ने कहा, 'इसलिए, हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो लाभ आरोपी नंबर 1,5 और 13 (जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने बरी कर दिया था) को दिया गया है, वह आरोपी नंबर 3 और 4 को भी दिया जाना चाहिए, जिन्होंने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती नहीं दी थी।' पीठ ने कहा कि आरोपियों में से एक का मामला, जिसकी याचिका पहले खारिज कर दी गई थी, अन्य तीन के समान ही है, जिन्हें शीर्ष अदालत ने बरी कर दिया था।
अपील मंजूर करते हुए, पीठ ने निचली अदालत के मार्च 2006 के फैसले के साथ-साथ उच्च न्यायालय के फरवरी 2016 के फैसले को रद्द करके कुरेशी को बरी कर दिया। इसने मेहबूब खान अल्ला रखा और सैद खान को भी बरी कर दिया, जिन्होंने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं की थी। पीठ ने मामले में अमजद खान नासिर खान पठान को बरी कर दिया।