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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट का आईओसीएल को झटका, भूमि सुधार कानून से कॉरपोरेट को संरक्षण समाजवाद की पराकाष्ठा
Thu, 22 Jan 2026 04:58 AM IST
पवन पांडेय
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Thu, 22 Jan 2026 04:58 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने केरल भूमि सुधार कानून के तहत इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड को दिए गए संरक्षण को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि भूमि सुधार कानूनों का उद्देश्य बड़े कॉरपोरेट को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि जोतने वाले को जमीन देना है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इसे समाजवाद की चरम स्थिति बताया।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : ANI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने यह समाजवाद की चरम स्थिति है, यह कहते हुए बुधवार को केरल भूमि सुधार कानून के तहत इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लि. (आईओसीएल) को दिए गए संरक्षण पर कड़ी आपत्ति जताई। शीर्ष अदालत ने कहा है कि भूमि सुधार कानूनों का उद्देश्य बड़े कॉरपोरेट संस्थानों को लाभ पहुंचाना नहीं है। अदालत ने आईओसीएल को निर्देश दिया कि वह एर्नाकुलम स्थित पट्टे की जमीन का खाली कब्जा छह महीने के भीतर मूल भूमि मालिक के उत्तराधिकारियों को सौंपे।
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जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा, आईओसीएल को केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1963 की धारा 106 के तहत बेदखली से संरक्षण का अधिकार नहीं है। यह धारा केवल उन्हीं पट्टेदारों को संरक्षण देती है, जिन्होंने 20 मई 1967 से पहले वाणिज्यिक या औद्योगिक उद्देश्य के लिए ली गई भूमि पर निर्माण किया हो। जस्टिस नागरत्ना ने पूछा, यह कैसा भूमि सुधार है? कृषि भूमि के मामले में तो यह समझ में आता है, लेकिन वाणिज्यिक और औद्योगिक संपत्तियों को भी किरायेदार को सौंप देना, वह भी किसी बड़े कॉरपोरेट को, समाजवाद की चरम स्थिति है। भूमि सुधार का सिद्धांत जोतने वाले को जमीन है।
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क्या है पूरा मामला?
मामला वर्ष 1994 में दायर उस वाद से जुड़ा है जिसमें एर्नाकुलम के एक गांव में स्थित लगभग 20 सेंट भूमि के मालिक ने पट्टा समाप्त होने के बाद जमीन का कब्जा वापस पाने की मांग की थी। उक्त भूमि आईओसीएल को पट्टे पर दी गई थी और वहां डीलर के माध्यम से पेट्रोल पंप चलाया जा जा रहा था। ट्रायल कोर्ट ने भूमि न्यायाधिकरण के निष्कर्षों के आधार पर आईओसीएल को धारा 106 के तहत संरक्षण देते हुए भूमि मालिक का दावा खारिज कर दिया था।
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केरल हाईकोर्ट ने पलट दिया था ट्रायल कोर्ट का फैसला
केरल हाईकोर्ट ने अपील पर यह कहते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया कि आईओसीएल यह साबित करने में असफल रहा कि 20 मई 1967 से पहले भूमि पर कोई निर्माण किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि भूमि मालिक 1994 से अब तक अपनी संपत्ति के कब्जे से वंचित रहा है, जो न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने आईओसीएल को छह महीने में जमीन खाली करने का आदेश दिया है।
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जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा, आईओसीएल को केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1963 की धारा 106 के तहत बेदखली से संरक्षण का अधिकार नहीं है। यह धारा केवल उन्हीं पट्टेदारों को संरक्षण देती है, जिन्होंने 20 मई 1967 से पहले वाणिज्यिक या औद्योगिक उद्देश्य के लिए ली गई भूमि पर निर्माण किया हो। जस्टिस नागरत्ना ने पूछा, यह कैसा भूमि सुधार है? कृषि भूमि के मामले में तो यह समझ में आता है, लेकिन वाणिज्यिक और औद्योगिक संपत्तियों को भी किरायेदार को सौंप देना, वह भी किसी बड़े कॉरपोरेट को, समाजवाद की चरम स्थिति है। भूमि सुधार का सिद्धांत जोतने वाले को जमीन है।
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क्या है पूरा मामला?
मामला वर्ष 1994 में दायर उस वाद से जुड़ा है जिसमें एर्नाकुलम के एक गांव में स्थित लगभग 20 सेंट भूमि के मालिक ने पट्टा समाप्त होने के बाद जमीन का कब्जा वापस पाने की मांग की थी। उक्त भूमि आईओसीएल को पट्टे पर दी गई थी और वहां डीलर के माध्यम से पेट्रोल पंप चलाया जा जा रहा था। ट्रायल कोर्ट ने भूमि न्यायाधिकरण के निष्कर्षों के आधार पर आईओसीएल को धारा 106 के तहत संरक्षण देते हुए भूमि मालिक का दावा खारिज कर दिया था।
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केरल हाईकोर्ट ने पलट दिया था ट्रायल कोर्ट का फैसला
केरल हाईकोर्ट ने अपील पर यह कहते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया कि आईओसीएल यह साबित करने में असफल रहा कि 20 मई 1967 से पहले भूमि पर कोई निर्माण किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि भूमि मालिक 1994 से अब तक अपनी संपत्ति के कब्जे से वंचित रहा है, जो न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने आईओसीएल को छह महीने में जमीन खाली करने का आदेश दिया है।
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