{"_id":"68d2a24098582a536500271a","slug":"supreme-court-rues-stagnation-in-district-judiciary-brilliant-judges-leaving-for-not-becoming-district-judges-2025-09-23","type":"story","status":"publish","title_hn":"Supreme Court: '15 साल सेवा के बाद भी जिला जज नहीं बन पा रहे...', जजों की नियुक्ति पर कोर्ट ने जताई चिंता","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Supreme Court: '15 साल सेवा के बाद भी जिला जज नहीं बन पा रहे...', जजों की नियुक्ति पर कोर्ट ने जताई चिंता
Tue, 23 Sep 2025 07:06 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Tue, 23 Sep 2025 07:06 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने जिला न्यायपालिका में लंबे समय तक पदोन्नति न मिलने की समस्या पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि कई प्रतिभाशाली उम्मीदवार 15–16 साल तक भी जिला जज नहीं बन पाते और निराश होकर नौकरी छोड़ देते हैं। मामला अनुच्छेद 233 की व्याख्या से जुड़ा है, जिसमें बार कोटे के तहत जिला जजों की नियुक्ति के नियम तय होते हैं।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जिला न्यायपालिका में ठहराव पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि कई प्रतिभाशाली उम्मीदवार सिर्फ इसलिए नौकरी छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें कई वर्षों बाद भी जिला जज पदोन्नति नहीं मिलती। अदालत ने कहा कि यह स्थिति न्याय व्यवस्था के लिए नुकसानदेह है और युवाओं के सपनों को तोड़ती है।
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कई उम्मीदवार 15-16 साल नौकरी करने के बाद भी जिला जज नहीं बन पाते। अदालत ने कहा कि कई ब्रिलियंट उम्मीदवार नौकरी में सिर्फ दो साल बाद ही इस्तीफा दे देते हैं, क्योंकि उन्हें आगे बढ़ने का कोई रास्ता नजर नहीं आता।
बार कोटे पर भर्ती को लेकर सवाल
सुनवाई उस संवैधानिक सवाल पर हो रही है कि क्या वे न्यायिक अधिकारी, जिन्होंने न्यायपालिका में शामिल होने से पहले सात साल तक वकालत की है, बार कोटे की रिक्तियों में जिला जज पद पर नियुक्त हो सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत भूषण ने तर्क दिया कि सिविल जजों को भी बार कोटे की परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी जानी चाहिए।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें- पीएम मोदी का फर्जी फोटो शेयर करने पर भड़के भाजपा कार्यकर्ता, 73 वर्षीय कांग्रेस नेता को पहनाई साड़ी
जजों के अनुभव और पीड़ा
जस्टिस एम एम सुंदरश ने उदाहरण दिया कि उनके एक लॉ क्लर्क, जिन्हें उन्होंने निचली न्यायपालिका की परीक्षा देने को प्रेरित किया था, बाद में निराश होकर नौकरी छोड़ना चाहते थे। उन्होंने कहा कि यह स्थिति प्रतिभाशाली युवाओं के सपनों को तोड़ रही है और न्यायपालिका में अच्छे उम्मीदवारों की कमी पैदा कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट यह तय कर रहा है कि अनुच्छेद 233 के तहत जिला जजों की नियुक्ति का अधिकार कैसे लागू होगा। अनुच्छेद के अनुसार, सात साल तक वकालत करने वाला कोई भी व्यक्ति, जिसे हाईकोर्ट अनुशंसा करे, जिला जज बनाया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या बार में किए गए वर्षों का अनुभव और न्यायिक सेवा का अनुभव जोड़ा जा सकता है या नहीं।
ये भी पढ़ें- अन्नामलाई ने दिनाकरन के NDA में लौटने की जताई उम्मीद, कहा- वे अपने फैसले पर पुनर्विचार करें
अगली सुनवाई और अहम बहसें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की सुनवाई 24 सितंबर से तीन दिन तक जारी रहेगी। अदालत को यह भी देखना होगा कि क्या संयुक्त अनुभव को मान्यता दी जा सकती है और इससे न्यायपालिका की भर्ती प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा। सीजेआई ने यह भी आगाह किया कि ऐसी व्याख्या न हो जिससे सिर्फ दो साल की वकालत करने वाला भी पात्र हो जाए।
विज्ञापन
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कई उम्मीदवार 15-16 साल नौकरी करने के बाद भी जिला जज नहीं बन पाते। अदालत ने कहा कि कई ब्रिलियंट उम्मीदवार नौकरी में सिर्फ दो साल बाद ही इस्तीफा दे देते हैं, क्योंकि उन्हें आगे बढ़ने का कोई रास्ता नजर नहीं आता।
विज्ञापन
बार कोटे पर भर्ती को लेकर सवाल
सुनवाई उस संवैधानिक सवाल पर हो रही है कि क्या वे न्यायिक अधिकारी, जिन्होंने न्यायपालिका में शामिल होने से पहले सात साल तक वकालत की है, बार कोटे की रिक्तियों में जिला जज पद पर नियुक्त हो सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत भूषण ने तर्क दिया कि सिविल जजों को भी बार कोटे की परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी जानी चाहिए।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें- पीएम मोदी का फर्जी फोटो शेयर करने पर भड़के भाजपा कार्यकर्ता, 73 वर्षीय कांग्रेस नेता को पहनाई साड़ी
जजों के अनुभव और पीड़ा
जस्टिस एम एम सुंदरश ने उदाहरण दिया कि उनके एक लॉ क्लर्क, जिन्हें उन्होंने निचली न्यायपालिका की परीक्षा देने को प्रेरित किया था, बाद में निराश होकर नौकरी छोड़ना चाहते थे। उन्होंने कहा कि यह स्थिति प्रतिभाशाली युवाओं के सपनों को तोड़ रही है और न्यायपालिका में अच्छे उम्मीदवारों की कमी पैदा कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट यह तय कर रहा है कि अनुच्छेद 233 के तहत जिला जजों की नियुक्ति का अधिकार कैसे लागू होगा। अनुच्छेद के अनुसार, सात साल तक वकालत करने वाला कोई भी व्यक्ति, जिसे हाईकोर्ट अनुशंसा करे, जिला जज बनाया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या बार में किए गए वर्षों का अनुभव और न्यायिक सेवा का अनुभव जोड़ा जा सकता है या नहीं।
ये भी पढ़ें- अन्नामलाई ने दिनाकरन के NDA में लौटने की जताई उम्मीद, कहा- वे अपने फैसले पर पुनर्विचार करें
अगली सुनवाई और अहम बहसें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की सुनवाई 24 सितंबर से तीन दिन तक जारी रहेगी। अदालत को यह भी देखना होगा कि क्या संयुक्त अनुभव को मान्यता दी जा सकती है और इससे न्यायपालिका की भर्ती प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा। सीजेआई ने यह भी आगाह किया कि ऐसी व्याख्या न हो जिससे सिर्फ दो साल की वकालत करने वाला भी पात्र हो जाए।
विज्ञापन
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन