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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: जजों को सम्राटों की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए

Sat, 10 Jul 2021 01:07 AM IST
सुरेंद्र जोशी अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Sat, 10 Jul 2021 01:07 AM IST
सार

  • कहा- न्यायपालिका और कार्यपालिका में शक्तियों को लेकर खिंची गई लक्ष्मणरेखा, न करें उल्लंघन
  • शीर्ष अदालत ने कहा अनावश्यक रूप से सरकारी अधिकारियों को अदालत में नहीं बुलाया जाना चाहिए
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर यूपी सरकार की अपील पर की अहम टिप्पणी

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Supreme Court: Respect for the court, should come on its own, know why the apex court condemned summoning the officers
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि न्यायाधीशों को अपनी सीमाएं पता होनी चाहिए। उनमें शील और विनम्रता होनी चाहिए। जजों को सम्राटों की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सरकारी अधिकारियों को अनावश्यक रूप से अदालत में नहीं बुलाया जाए। किसी अधिकारी को अदालत में बुलाने से अदालत की गरिमा और महिमा नहीं बढ़ती है।

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जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा, कुछ हाईकोर्ट में अधिकारियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बनाने की प्रथा विकसित हुई है। वास्तव में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों को लेकर लक्ष्मण रेखा खिंची गई है। अधिकारियों को अदालत में बुलाकर इस सीमारेखा का उल्लंघन किया जा रहा है और उन पर दबाव बनाकर अपनी इच्छा के अनुसार आदेश पारित किया जाता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि अधिकारियों को बार-बार अदालत में बुलाना बिल्कुल भी सराहनीय नहीं है। इसकी कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणियां उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एक चिकित्सा अधिकारी के वेतन के संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर की है। हाईकोर्ट ने इस मामले में चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग के सचिव को समन जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के फैसलों को दरकिनार कर दिया।
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अफसरों को समन देने की प्रथा से बचें जज
शीर्ष अदालत ने अधिकारियों को समन करने की इस प्रथा की आलोचना करते हुए कहा कि अधिकारी को समन करना जनहित के खिलाफ है, क्योंकि इससे उन्हें सौंपे गए कई महत्वपूर्ण कार्यों में देरी हो जाती है। इससे अधिकारी पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है या उसकी राय का इंतजार कर रहे निर्णयों में देरी होती है। जजों को अफसरों को समन देने की प्रथा से बचना चाहिए।

अफसर भी लोकतंत्र के अंग के रूप में कर रहे काम
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि कार्यपालिका के अधिकारी भी लोकतंत्र के तीसरे अंग के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं। अधिकारियों द्वारा किए गए कार्य या निर्णय उन्हें लाभान्वित करने के लिए नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक धन के संरक्षक के तौर पर और प्रशासन के हित में वे कुछ निर्णय लेने के लिए बाध्य हैं।


यह है मामला
यह मामला एक डॉक्टर मनोज कुमार शर्मा से जुड़ा है, जिसका छह मार्च, 2002 को उत्तराखंड से यूपी के बदायूं हस्तांतरण कर दिया गया था। हालांकि, शर्मा ने 13 साल तक बदायूं में अपना कार्यभार नहीं संभाला था। इसी मामले में हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को डॉक्टर शर्मा के बकाये वेतन का आकलन करने और उसका 50 फीसदी भुगतान करने का आदेश दिया था। 

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