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Supreme Court: नागरिकता कानून की धारा 6ए को चुनौती देने वाली अर्जी पर फैसला सुरक्षित; संविधान पीठ ने की सुनवाई

Tue, 12 Dec 2023 05:11 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Tue, 12 Dec 2023 05:11 PM IST
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sc reserve order on petitions challenging constitutional validity of Section 6A of Citizenship Act news update
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने नागरिकता अधिनियम की धारा 6 ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस धारा को असम समझौते को आगे बढ़ाने के लिए 1985 में एक संशोधन के माध्यम से संविधान मे शामिल किया गया था। 

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न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस मुद्दे पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने फैसला सुरक्षित रखने से पहले चार दिनों तक अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान, कपिल सिब्बल और अन्य की दलीलें सुनीं। बता दें कि धारा 6ए की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए 17 याचिकाएं दाखिल की गई थी। धारा 6ए को असम समझौते के तहत संविधान के नागरिकता अधिनियम में शामिल लोगों की नागरिकता से निपटने के लिए एक विशेष प्रावधान के रूप में शामिल किया गया था। 
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धारा-6ए विशेष प्रावधान के तहत शामिल की गई थी
नागरिकता अधिनियम की धारा-6ए विशेष प्रावधान के तहत शामिल की गई थी ताकि असम समझौते के तहत आने वाले लोगों की नागरिकता से संबंधित मामलों से निपटा जा सके। कानून के इस प्रावधान में कहा गया है कि जो लोग एक जनवरी 1966 को या इसके बाद और 25 मार्च 1971 से पहले बांग्लादेश सहित उल्लेखित इलाकों से असम आए हैं और यहां निवास कर रहे हैं उन्हें वर्ष 1985 में संशोधित नागरिकता कानून के तहत नागरिकता के लिए धारा-18 के तहत अपना पंजीकरण कराना होगा। इसका नतीजा यह है कि बांग्लादेश से असम आने वालों के लिए कानून का यह प्रावधान 25 मार्च 1971 की ‘कट ऑफ तारीख’ तय करता है।
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चंद्रबाबू व पुलिस को सार्वजनिक बयानबाजी न करने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने फाइबरनेट मामले में तेलुगु देशम पार्टी के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू और आंध्र प्रदेश की पुलिस को सार्वजनिक बयानबाजी नहीं करने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने नायडू के वकील सिद्धार्थ लूथरा से कहा कि वह पूर्व मुख्यमंत्री को इस मामले में सार्वजनिक रूप से कोई भी बयान देने से रोकें।

सुनवाई के शुरू में आंध्र प्रदेश सरकार की ओर से पेश वकील रंजीत कुमार ने पीठ को बताया की कोर्ट की हिदायत के बावजूद नायडू ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया। वहीं, लूथरा ने पीठ को बताया कि नायडू से जुड़े आपराधिक मामलों की जांच जारी है, लेकिन राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दिल्ली और हैदराबाद में प्रेस कांफ्रेंस करके बयान दिया है। इस पर पीठ ने कुमार और लूथरा से कहा कि वह अपने-अपने मुवक्किलों को लंबित मामलों से जुड़े सार्वजनिक बयानबाजी न करने की सलाह दें। पीठ इस मामले में नायडू की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही है। इस पर अगली सुनवाई अब 17 जनवरी को होगी।

आठ लोगों की हत्या में चार दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के रोहतास जिले में एक वैवाहिक समारोह में आठ लोगों की हत्या के 37 साल पुराने मामले में दोषसिद्धि के खिलाफ चार लोगों की अपील खारिज कर दी। जस्टिस एमएम सुंदरेश व जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने हालांकि इन चारों की ओर से पेश वकील अखिलेश कुमार पांडेय के उस अनुरोध पर संज्ञान लिया कि समयपूर्व रिहाई के उनके आवेदन पर राज्य प्रशासन की तरफ से निश्चित समय सीमा के अंदर विचार किया जाए।

पीठ ने अपने हालिया आदेश में कहा, अपीलकर्ताओं की ओर से पेश सुविज्ञ वकील ने बताया कि वे 14 वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं। ऐसे में समयपूर्व रिहाई के लिए संबंधित नीति के तहत उनके मामले पर विचार करना होगा। हमें इस दलील में दम नजर आता है। ऐसी स्थिति में हम प्रतिवादी संख्या एक (बिहार सरकार) को इस आदेश की प्रति मिलने के आठ सप्ताह के अंदर समयपूर्व रिहाई के लिए अपीलकर्ताओं के मामले पर विचार करने का निर्देश देते हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा, अभियुक्तों से आशा की जाती है कि इस संबंध में वे दो सप्ताह के अंदर उपयुक्त आवेदन देकर सहयोग करें। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के संबंधित सदस्य सचिव को इस प्रक्रिया को पूरा करने में अपीलकर्ताओं के साथ सहयोग करने का निर्देश दिया जाता है।

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