SC Updates: महिला वकीलों के प्रतिनिधित्व पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; सिख धार्मिक संपत्तियों पर PIL सुनने से इनकार
महिला वकीलों को सरकारी कानूनी पैनलों और लॉ ऑफिसर पदों में 30 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने लाडली फाउंडेशन ट्रस्ट की याचिका पर नोटिस जारी किए।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत को बताया कि महिला वकीलों की स्थिति पर SCBA के सर्वे के बाद यह याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया कि महिलाओं की कानून की पढ़ाई में भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन सरकारी पैनलों और उच्च पदों पर उनकी हिस्सेदारी बेहद कम है।
याचिका के अनुसार, स्वतंत्रता के 75 वर्षों में अब तक कोई महिला अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल नहीं बनी। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की संख्या लगभग 5.88 प्रतिशत और हाई कोर्ट में 13.76 प्रतिशत है। याचिका में केंद्र, राज्यों और पीएसयू को निर्देश देने की मांग की गई है कि सभी सरकारी कानूनी पैनलों में महिलाओं को कम से कम 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, सिख संपत्तियों पर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देशभर में सिख धार्मिक और विरासत संपत्तियों की सुरक्षा, ऑडिट और नियमन को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने याचिकाकर्ता चरणजीत सिंह को अपनी मांग संसद की याचिका समिति के सामने उठाने की सलाह दी।
याचिकाकर्ता चरणजीत सिंह, जो एक दिल्ली स्थित सिख संस्था से जुड़े बताए गए, ने खुद अदालत में पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान उन्होंने अदालत से नोटिस जारी करने की अपील करते हुए पीठ के सामने नतमस्तक भी हुए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत के दरवाजे हमेशा खुले हैं, लेकिन याचिका में उठाए गए मुद्दे कानून में संशोधन और नीतिगत फैसलों से जुड़े हैं, जो संसद के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
पीठ ने कहा कि यदि अदालत इस मामले में हस्तक्षेप करती है तो इसे धार्मिक मामलों में दखल के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि यदि संसदीय समिति से संतोषजनक समाधान नहीं मिलता है तो वह दोबारा सुप्रीम कोर्ट आ सकते हैं।
याचिका में राष्ट्रीय खालसाई सिख विरासत संरक्षण प्राधिकरण गठित करने, सिख धार्मिक संपत्तियों की सूची तैयार करने, सीएजी से विशेष ऑडिट कराने तथा कथित अवैध लेनदेन की जांच सीबीआई और ईडी से कराने की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कृष्णा-गोदावरी बेसिन गैस विवाद मामले में अंतिम सुनवाई फिलहाल रोकने की रिलायंस इंडस्ट्रीज की मांग ठुकरा दी। हालांकि, अदालत ने कहा कि यदि कंपनियां और केंद्र सरकार मध्यस्थता के जरिये समाधान तक पहुंचते हैं तो मामले का निपटारा किया जा सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ रिलायंस इंडस्ट्रीज, बीपी एक्सप्लोरेशन लि. और नीको लि. की अपीलों पर सुनवाई कर रही है। इन कंपनियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनके पक्ष में आए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण के फैसले को रद्द कर दिया था। सुनवाई के दौरान कंपनियों की ओर से पेश वकील ने कहा कि वे केंद्र सरकार को पत्र लिखकर सुलह या मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध करेंगी।
उन्होंने अदालत से कहा कि बातचीत को मौका देने के लिए अंतिम सुनवाई कुछ समय के लिए रोक दी जाए। हालांकि, केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत से कहा कि सुनवाई जारी रहनी चाहिए। इस पर पीठ ने कहा, यदि मध्यस्थता सफल रहती है तो यह अच्छी बात होगी, तब हम मामले का निपटारा कर देंगे। इसके बाद रिलायंस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने दलीलें रखनी शुरू कीं।
रिलायंस-बीपी-नीको पर अवैध तरीके से गैस उत्पादन का आरोप
विवाद बंगाल की खाड़ी स्थित केजी-डी6 गैस ब्लॉक से जुड़ा है। केंद्र ने 2016 में रिलायंस-बीपी-नीको समूह पर आरोप लगाया था कि उसने ओएनजीसी के ब्लॉकों से रिसकर आए प्राकृतिक गैस भंडार का उत्पादन किया, जबकि उन भंडारों के दोहन का अधिकार नहीं था। इसके बाद तेल मंत्रालय ने नवंबर 2016 में इन कंपनियों से 1.47 अरब डॉलर की वसूली का दावा किया। बाद में रॉयल्टी और ब्याज जुड़कर राशि बढ़कर 1.55 अरब अमेरिकी डॉलर हो गई।
रिलांयस ने अनुंबध की गलत व्याख्या को दी चुनौती
रिलायंस ने इस दावे को उत्पादन साझेदारी अनुबंध की गलत व्याख्या बताते हुए चुनौती दी और 11 नवंबर 2016 को मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू की। जुलाई 2018 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने 2-1 के बहुमत से केंद्र का दावा खारिज कर दिया और कंपनियों को 83 लाख डॉलर का मुआवजा देने का आदेश दिया था। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस फैसले को सही माना, लेकिन 14 फरवरी 2025 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उसे पलटते हुए मध्यस्थता रद्द कर दी। सरकार का दावा न्यायमूर्ति एपी शाह समिति की रिपोर्ट पर आधारित था। समिति ने कहा था कि गैस के उत्पादन से रिलायंस समूह को अनुचित लाभ हुआ। इस मामले में अंतिम फैसला अब सुप्रीम कोर्ट को करना है।