फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Supreme Court removes condition of magistrate's approval in living will process

'Living Will': सुप्रीम कोर्ट ने 'लिविंग विल' के लिए जरूरी इस शर्त को हटाया, 2018 में दिया था ऐतिहासिक फैसला

Tue, 24 Jan 2023 07:19 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Tue, 24 Jan 2023 07:19 PM IST
सार

निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर अपने ऐतिहासिक आदेश के चार साल से अधिक समय बाद शीर्ष अदालत ने "लिविंग विल" पर अपने 2018 के दिशानिर्देशों को संशोधित करने पर सहमति जताई थी। अदालत ने 9 मार्च, 2018 के अपने फैसले में माना था कि गरिमा के साथ मौत एक मौलिक अधिकार है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल को कानूनन वैध ठहराया था।

विज्ञापन
Supreme Court removes condition of magistrate's approval in living will process
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि गरिमा के साथ मौत एक मौलिक अधिकार है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल को कानूनन वैध ठहराया था। अब न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने  लिविंग के दिशा-निर्देशों को अधिक व्यावहारिक और कम बोझिल बनाने के प्रयास में अपने पूर्व के दिशा-निर्देशों को संशोधित किया है। दरअसल, पीठ ने मंगलवार को लिविंग विल के लिए उस शर्त को हटा दिया जिसमें गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को लिविंग विल / एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव के लिए मजिस्ट्रेट की मंजूरी अनिवार्य थी। 

विज्ञापन


लिविंग विल से संबंधित इस शर्त को शीर्ष अदालत ने हटाया
न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि लिविंग विल पर अब द्वारा दो अनुप्रमाणित गवाहों की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए जाएंगे। इनमें एक स्वतंत्र गवाह और एक नोटरी या राजपत्रित अधिकारी होगा। उन्होंने आगे कहा कि गवाह और राजपत्रित अधिकारी अपनी सहमति देंगे कि लिविंग विल को स्वेच्छा से और बिना किसी दबाव या प्रलोभन या मजबूरी के और सभी प्रासंगिक सूचनाओं और परिणामों की पूरी समझ के साथ निष्पादित किया गया है। इस बेंच में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, ऋषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति सी टी रविकुमार भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट 2018 में जारी लिविंग विल/एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव के दिशानिर्देशों में संशोधन की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
विज्ञापन


इन सुझावों को दी सहमति
शीर्ष अदालत ने इस सुझाव पर भी सहमति जताई कि लिविंग विल बनवाने वाले परिवार का चिकित्सक अगर कोई है तो उसे भी लिविंग विल के बारे में सूचित किया जाएगा और वसीयत की एक प्रति सौंपी जाएगी। साथ ही अदालत ने इस सुझाव को भी मंजूरी दी कि लिविंग विल बनवाने वाले के गंभीर रूप से बीमार होने और ठीक होने की कोई उम्मीद न होने पर उपचार करने वाले चिकित्सक को लिविंग विल के बारे में पता चलने पर उसकी वास्तविकता और प्रामाणिकता का पता लगाना होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन


केंद्र को लगाई थी फटकार
शीर्ष अदालत ने इससे पहले सुनवाई के दौरान निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर अब तक कानून नहीं बनाने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी। पीठ ने कहा था कि विधायिका ने अपनी विधायी जिम्मेदारी को त्याग दिया है और न्यायपालिका पर दोषारोपण कर रही है। अदालत ने पिछली सुनवाई के दौरान कहा था कि यह एक ऐसा मामला है जिस पर देश के चुने हुए प्रतिनिधियों को बहस करनी चाहिए। साथ ही इसने कहा था कि अदालत में अपेक्षित विशेषज्ञता की कमी है और यह पार्टियों द्वारा प्रदान की गई जानकारी पर निर्भर है।

2018 में दिया था ऐतिहासिक फैसला
निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर अपने ऐतिहासिक आदेश के चार साल से अधिक समय बाद शीर्ष अदालत ने "लिविंग विल" पर अपने 2018 के दिशानिर्देशों को संशोधित करने पर सहमति जताई थी। अदालत ने 9 मार्च, 2018 के अपने फैसले में माना था कि गरिमा के साथ मौत एक मौलिक अधिकार है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल को कानूनन वैध ठहराया था। अदालत ने अग्रिम निर्देशों के निष्पादन की प्रक्रिया से संबंधित सिद्धांतों को निर्धारित किया था। शीर्ष अदालत के 2018 के फैसले के अनुसार, दो गवाहों और प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) की उपस्थिति में वसीयत बनाने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाने की आवश्यकता है। 


पीठ  ने कहा था कि निर्देश और दिशानिर्देश तब तक लागू रहेंगे जब तक कि संसद इसके लिए कोई कानून नहीं लाती है। अदालत ने एनजीओ कॉमन कॉज द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया था।  
 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed