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सुप्रीम कोर्ट: दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 'मेक इन इंडिया' को लेकर की टिप्पणी को हटाया, कहा- मुद्दों से परे टिप्पणी नहीं करनी चाहिए
Thu, 17 Feb 2022 08:20 PM IST
अभिषेक दीक्षित
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Thu, 17 Feb 2022 08:20 PM IST
सार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, 'इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि भारत सरकार मेक इन इंडिया पर जोर दे रही है। याचिकाकर्ता की शिकायतें सही प्रतीत होती हैं और हमारे विचार में इस मसले पर उच्चतम स्तर पर गंभीर विचार की आवश्यकता है।'
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : amar ujala
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि हाईकोर्ट को आदेश पारित करते समय व्यापक टिप्पणियों से बचना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा है कि हाईकोर्ट को उनके सामने विवाद या मुद्दों की रूपरेखा से परे जाकर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालयों को पक्षों के बीच विवाद तक ही सीमित रहना चाहिए।
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शीर्ष अदालत ने कहा कि हम हाईकोर्ट को सलाह देते हैं कि वे सामान्य टिप्पणियां न करें, जो मामले में जरूरी नहीं हैं। उसे व्यापक टिप्पणियों से बचना चाहिए जो विवाद और मुद्दों से परे हो।' शीर्ष अदालत, दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार द्वारा दायर अपील से निपट रही थी जिसमें याचिकाकर्ता को बोली (बिड) के गलत मूल्यांकन और कुछ लोगों के साथ भेदभाव से संबंधित पहलुओं को उजागर करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास एक अभ्यावेदन देने की अनुमति दी थी।
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याचिकाकर्ता ने यह कहते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था कि ठेके देने के दौरान भारतीय बोलीदाताओं के साथ भेदभाव किया जाता है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को प्रधानमंत्री के समक्ष अभ्यावेदन करने की अनुमति देते हुए सरकार की बहुप्रचारित 'मेक इन इंडिया' योजना पर भी टिप्पणी की थी।
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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, 'इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि भारत सरकार मेक इन इंडिया पर जोर दे रही है। याचिकाकर्ता की शिकायतें सही प्रतीत होती हैं और हमारे विचार में इस मसले पर उच्चतम स्तर पर गंभीर विचार की आवश्यकता है।'
केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट जनहित याचिका पर फैसला नहीं कर रहा था और उसने रिट याचिका में याचिकाकर्ता द्वारा किए गए दावे की मेरिट या प्रतिवादी के बचाव पर ध्यान नहीं दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा है कि हाईकोर्ट को इस तरह की सामान्य टिप्पणियों से बचना चाहिए था। यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी को हटा दिया।