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समलैंगिक विवाह: सुप्रीम कोर्ट का खुली अदालत में समीक्षा करने से इनकार, वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने सीजेआई से किय

Wed, 10 Jul 2024 05:48 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 10 Jul 2024 05:48 AM IST
सार

पुरुष समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ताओं को झटका देते हुए मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने पिछले साल 17 अक्तूबर को समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इन्कार कर दिया था। पीठ ने कहा था कि कानूनन मान्यता प्राप्त विवाह के अलावा अन्य को कोई मंजूरी नहीं है। 

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Supreme Court refuses to review gay marriage in open court
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार किए जाने संबंधी उसके पिछले साल के निर्णय की समीक्षा खुली अदालत में करने से इनकार कर दिया। पुरुष समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ताओं को झटका देते हुए मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने पिछले साल 17 अक्तूबर को समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इन्कार कर दिया था। पीठ ने कहा था कि कानूनन मान्यता प्राप्त विवाह के अलावा अन्य को कोई मंजूरी नहीं है।

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हालांकि, शीर्ष अदालत ने समलैंगिक लोगों के अधिकारों की जोरदार पैरोकारी की थी, ताकि अन्य लोगों को उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं को पाने में उन्हें भेदभाव का सामना न करना पड़े। शीर्ष अदालत ने उत्पीड़न एवं हिंसा का सामना करने वाले (ट्रांसजेंडर) समुदाय के लोगों को आश्रय देने के लिए सभी जिलों में गरिमा गृह और संकट की घड़ी में इस्तेमाल करने के लिए समर्पित हॉटलाइन नंबर की व्यवस्था करने को कहा था। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस पीएस नरसिम्हा निर्णय की समीक्षा का अनुरोध करने वाली याचिकाओं पर 10 जुलाई को अपने कक्ष में विचार करने वाले हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी और एनके कौल ने मामले का उल्लेख किया तथा मुख्य न्यायाधीश से खुली अदालत में पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई करने का आग्रह किया। जिसपर पीठ ने इनकार कर दिया।
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बंगाल सरकार का ठेका रद्द करने वाला फैसला खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल सरकार के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें एक निजी कंपनी को कोलकाता में दो अंडरपास के रखरखाव के संबंध में मिला ठेका बिना कोई कारण बताए रद्द कर दिया गया था। न्यायालय ने इसे मनमानी का अनूठा मामला करार दिया। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला तथा जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को भी खारिज कर दिया, जिसमें अनुबंध रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा गया था। जस्टिस पारदीवाला ने फैसला सुनाते हुए कहा, हमारा मानना है कि यह मनमानी का अनूठा मामला है। पीठ ने इस तथ्य का उल्लेख किया कि अनुबंध रद्द करने का निर्णय एक मंत्री के आदेश पर लिया गया था। शीर्ष अदालत ने आठ मई को फैसला सुरक्षित रखा था। तब पीठ ने कहा था कि निजी पक्षों को काम देने वाले ठेकों को बिना कारण बताए रद्द नहीं किया जाना चाहिए।

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