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Hindi News ›   India News ›   Supreme Court refuses to entertain plea challenging Bodh Gaya Temple Act; asks petitioner to move High Court

SC: बोधगया मंदिर एक्ट को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से 'सुप्रीम' इनकार, हाईकोर्ट जाने के लिए कहा

Mon, 30 Jun 2025 01:39 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Mon, 30 Jun 2025 01:39 PM IST
सार

पीठ ने पूछा, 'आप हाईकोर्ट के सामने यही मांग क्यों नहीं रखते? हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं। हालांकि, याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय जाने की स्वतंत्रता दी गई है।' 

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Supreme Court refuses to entertain plea challenging Bodh Gaya Temple Act; asks petitioner to move High Court
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 के अधिकारों को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता से संबंधित हाईकोर्ट जाने के लिए कहा। दरअसल, बिहार के बोधगया में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल महाबोधि मंदिर परिसर भगवान गौतम बुद्ध के जीवन से संबंधित चार पवित्र क्षेत्रों में से एक है। माना जाता है कि बोधगया वह स्थान है, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

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1949 के अधिनियम के अधिकारों को चुनौती देने वाली याचिका न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई। पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से याचिका में की गई मांग के बारे में पूछा। वकील ने कहा, 'याचिकाकर्ता की मांग है कि बोधगया मंदिर अधिनियम को अधिकारों के दायरे से बाहर मानते हुए रद्द किया जाना चाहिए।' पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को संबंधित हाईकोर्ट जाना चाहिए।
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1949 का अधिनियम मंदिर के बेहतर प्रबंधन से संबंधित है। महाबोधि मंदिर परिसर में 50 मीटर ऊंचा भव्य मंदिर, वज्रासन, पवित्र बोधि वृक्ष और बुद्ध के ज्ञानोदय के छह अन्य पवित्र स्थल शामिल हैं, जो कई प्राचीन स्तूपों से घिरे हैं, जिन्हें संरक्षित किया गया है। सातवां पवित्र स्थान लोटस पॉन्ड दक्षिण में बाड़े के बाहर स्थित है। इस वर्ष अप्रैल में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के सुप्रीमो और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 के प्रावधानों में संशोधन की मांग की थी, ताकि महाबोधि महाविहार मंदिर का प्रबंधन बौद्धों को सौंपा जा सके।

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