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Raghav Chadha: 'अनिश्चितकालीन निलंबन से लोगों के अधिकार पर गंभीर असर', आप सांसद चड्ढा मामले में सुप्रीम कोर्ट

Mon, 30 Oct 2023 09:34 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 30 Oct 2023 09:34 PM IST
सार

आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सांसद के अनिश्चितकालीन निलंबन का लोगों के अधिकारों पर बहुत गंभीर असर होगा। बता दें कि राघव चड्ढा को अनिश्चित अवधि के लिए राज्यसभा से निलंबित कर दिया गया।

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Supreme Court Raghav Chadha aap mp rajya sabha suspension
सुप्रीम कोर्ट राघव चड्ढा - फोटो : ANI

विस्तार

उच्चतम न्यायालय ने आप सांसद राघव चड्ढा के निलंबन मामले में बड़ी टिप्पणी की। सोमवार को उन्होंने कहा कि किसी सांसद के अनिश्चितकालीन निलंबन से लोगों के अपनी पसंद के व्यक्ति द्वारा प्रतिनिधित्व करने के अधिकार पर बहुत गंभीर असर पड़ सकता है। अदालत ने पूछा कि क्या संसद की विशेषाधिकार समिति आप विधायक को आदेश दे सकती है। शीर्ष अदालत ने सुनवाई शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दी और पक्षों को गुरुवार तक अपनी दलीलों का संकलन दाखिल करने का निर्देश दिया।
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अनिश्चितकालीन निलंबन की जरूरत पर सवाल
शीर्ष अदालत ने कहा कि विपक्ष के एक सदस्य को सिर्फ एक ऐसे दृष्टिकोण के कारण सदन से बाहर करना, जो सरकार के दृष्टिकोण के अनुरूप नहीं हो सकता है, एक गंभीर मुद्दा है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि चड्ढा के खिलाफ एकमात्र आरोप यह था कि उन्होंने प्रस्तावित चयन समिति में शामिल करने का निर्णय लेने से पहले कुछ सांसदों की अनुमति नहीं ली थी। सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से जानना चाहा कि उल्लंघन के कारण अनिश्चितकालीन निलंबन की आवश्यकता है क्या इस पर विचार किया जा सकता है?
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अधिकांश सांसद सत्तारूढ़ भाजपा के
चड्ढा 11 अगस्त से निलंबित हैं। इस समय कुछ सांसदों ने उन पर उनकी सहमति के बिना एक प्रस्ताव में अपना नाम जोड़ने का आरोप लगाया था। केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने भी इस मामले में गंभीर आपत्ति दर्ज कराई थी। आपत्ति करने वाले अधिकांश सांसद सत्तारूढ़ भाजपा के थे। प्रस्ताव में विवादास्पद दिल्ली सेवा विधेयक की जांच के लिए एक चयन समिति के गठन की मांग की गई।
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सावधानी बरतने की नसीहत
सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ में चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के अलावा न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं। पीठ ने कहा, एक संवैधानिक अदालत के रूप में, यह चिंता का एक गंभीर कारण है। संसद को सभी वर्गों की आवाज उठानी चाहिए। अनिश्चितकालीन निलंबन चिंता का कारण है। निलंबन के कारण चड्ढा शीतकालीन सत्र के लिए भी बाहर रहेंगे। विपक्ष के सदस्य का बहिष्कार बहुत ही गंभीर मामला है। वह अपने निर्वाचन क्षेत्र और उस दृष्टिकोण का प्रतिनिधि है जो सरकार के दृष्टिकोण के अनुरूप नहीं हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हमें संसद से उन आवाज़ों को बाहर न करने के बारे में बहुत सावधान रहना चाहिए।

करीब 75 दिन पहले निलंबित हुए राघव चड्ढा मामले में अदालत की सहायता कर रहे अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने कहा कि संसदीय पैनल में शामिल किए जाने के लिए प्रस्तावित सदस्यों की सहमति प्राप्त करना बहुत महत्वपूर्ण है। इससे सदन की कार्यवाही की गरिमा बढ़ती है। उन्होंने कहा कि मीडिया में चड्ढा की टिप्पणी से सदन की गरिमा कम हुई है। 

वेंकटरमणी के अनुसार, राघव ने कहा, प्रस्तावित चयन समिति के लिए सांसदों के नाम शामिल करने का उनका प्रस्ताव "जन्मदिन के निमंत्रण कार्ड" जैसा था। इस पर अदालत ने सवाल किया, "हमने अपना सेंस ऑफ ह्यूमर खो दिया है, यह बिल्कुल अलग बात है। मिस्टर एजी, क्या इससे वाकई सदन की गरिमा कम होती है?"

पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, "एक सदस्य को अपनी समिति में सदस्यों को शामिल करने के लिए सहमति का सत्यापन करना चाहिए था...वह ऐसा नहीं करता है। प्रेस द्वारा पूछे जाने पर, वह कहता है कि यह जन्मदिन के निमंत्रण कार्ड की तरह है। उसका स्पष्ट रूप से मतलब यह था कि मैंने अनुरोध किया है सदस्य समिति का हिस्सा बनें...यदि आप आना चाहते हैं, तो आएं। सवाल यह है कि क्या इससे विशेषाधिकार का उल्लंघन होता है?''

अदालत ने कहा, वह चड्ढा से पूछेगी कि क्या वह अपने कृत्य के लिए माफी मांगने को तैयार हैं? साथ ही क्या राज्यसभा अध्यक्ष उनकी माफी स्वीकार करने को तैयार हैं? पीठ ने कहा, "हम उनसे यह कहने को तैयार हैं कि अगर वह सदन से माफी मांगने को तैयार हैं, तो क्या सभापति माफी स्वीकार कर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानून को सही तरीके से स्थापित करने की जरूरत को खत्म कर देंगे।" अदालत ने कहा, हम कानून को सही तरीके से स्थापित करेंगे।

चड्ढा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने अदालत को बताया, राज्यसभा में अतीत में कम से कम 11 ऐसी घटनाएं हुई हैं जब सदस्यों ने अन्य सदस्यों द्वारा प्रस्तावित चयन समितियों में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि जब भी किसी सदस्य ने सहमति देने से इनकार कर दिया तो उन्हें सूची से हटा दिया गया और नाम प्रस्तावित करने वाले सांसद के खिलाफ कभी कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई। वकील ने कहा कि चड्ढा संसद का सम्मान करते हैं और उन्होंने पहले भी माफी मांगी थी और फिर से ऐसा करने के लिए तैयार हैं।

पीठ ने कहा, "हम विशेषाधिकारों के व्यापक सवाल पर नहीं जा सकते।" अदालत विशेषाधिकार समिति के अधिकार क्षेत्र में भी नहीं जा रही है... एकमात्र सवाल अनिश्चितकालीन निलंबन का है।" पीठ ने एक अन्य मुद्दे पर गौर किया कि क्या नियम 256 और नियम 266 (राज्यसभा अध्यक्ष की विवेकाधीन शक्तियां) राज्यसभा के सभापति को जांच लंबित रहने तक निलंबन का आदेश पारित करने का अधिकार देते हैं? 

बता दें कि राघव चड्ढा पर यह आरोप लगाया गया था कि पंजाब से राज्यसभा सांसद ने दिल्ली सेवा विधेयक को चयन समिति को सौंपने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था। उन्होंने कथित तौर पर कुछ सांसदों को प्रस्तावित समिति के सदस्यों के रूप में नामित किया था। इसके बाद राघव के खिलाफ दावा किया गया था कि कुछ सांसदों ने इसके लिए अपनी सहमति नहीं दी थी। शिकायत पर ध्यान देते हुए चेयरमैन ने विशेषाधिकार समिति की जांच लंबित रहने तक चड्ढा को निलंबित कर दिया।

आप नेता ने अपनी याचिका में कहा है कि अनिश्चितकाल के लिए निलंबित करने की शक्ति का खतरनाक रूप से ज्यादतियों के लिए दुरुपयोग हो रहा है। याचिका में कहा गया है, ''निलंबित करने की शक्ति का उपयोग केवल ढाल के रूप में किया जाना है, तलवार के रूप में नहीं, यानी यह दंडात्मक नहीं हो सकता है।'' 


बता दें कि राज्यसभा में बीते 11 अगस्त को सदन के नेता पीयूष गोयल ने एक प्रस्ताव पेश किया था। प्रस्तावित चयन समिति में कुछ सदस्यों के नाम उनकी सहमति के बिना शामिल करने के लिए आप नेता राघव के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी। राज्यसभा से प्रस्ताव पारित होने के बाद चड्ढा को विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट लंबित रहने तक "नियमों के घोर उल्लंघन, कदाचार, उद्दंड रवैया और अवमाननापूर्ण आचरण" के लिए मानसून सत्र के आखिरी दिन निलंबित कर दिया गया था।
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