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Supreme Court: जेलों में 'जाति आधारित भेदभाव' मामले को लेकर खफा सुप्रीम कोर्ट, कल आ सकता है ऐतिहासिक फैसला
Wed, 02 Oct 2024 02:28 PM IST
राहुल कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: राहुल कुमार
Updated Wed, 02 Oct 2024 02:28 PM IST
सार
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड की गई 3 अक्टूबर की वाद सूची के अनुसार मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला तथा न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ इस याचिका पर फैसला सुनाएगी।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को एक 'जाति आधारित भेदभाव' से जुड़ी याचिका पर अपना एतिहासिक फैसला सुनाने वाली है। सुप्रीम कोर्ट में दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि देश के कुछ राज्यों के जेल मैनुअल जाति आधारित भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। बता दें कि, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश बल्कि मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत 17 राज्यों से जेल के अंदर जातिगत भेदभाव और जेलों में कैदियों को जाति के आधार पर काम दिए जाने पर जवाब मांगा था।
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड की गई 3 अक्टूबर की वाद सूची के अनुसार मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला तथा न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ इस याचिका पर फैसला सुनाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस साल जनवरी में इस याचिका पर केंद्र और उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों से जवाब मांगा था। हालांकि छह महीने बीतने के बाद भी केवल उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने ही अपना जवाब कोर्ट में दाखिल किया है।
यूपी सरकार को लगी थी कड़ी फटकार
बता दें कि पिछली सुनवाई में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने उत्तर प्रदेश सरकार के वकीलों की कड़ी फटकार लगाई थी। उत्तर प्रदेश सरकार के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया था कि यूपी की जेलों में कैदियों के साथ कोई जातिगत भेदभाव नहीं होता है। डीवाई चंद्रचूड़ ने उत्तर प्रदेश की जेल नियमावली के कुछ प्रावधान पढ़कर खफा हो गए थे। इस पर उन्होंने कहा था कि, नियम 158 में मैला ढोने के कर्तव्य का जिक्र है। यह मैला ढोने का कर्तव्य क्या है? इसमें मैला ढोने वालों की जाति का उल्लेख है। इसका क्या मतलब है।
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जेलों में हो रहा है भेदभाव
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा था कि, इन राज्यों की जेल संहिता जेलों के अंदर काम के आवंटन में भेदभाव करती हैं और कैदियों की जाति के आधार पर उन्हें रखने की जगह तय होती है। याचिका में केरल जेल नियमों का हवाला देते हुए कहा गया कि वे आदतन और फिर से दोषी ठहराए गए दोषियों के बीच अंतर करते हैं। जिसमें कहा गया है कि जो लोग आदतन लुटेरे, घर तोड़ने वाले, डकैत या चोर हैं, उन्हें वर्गीकृत किया जाना चाहिए और अन्य दोषियों से अलग किया जाना चाहिए।
याचिका में दावा किया गया कि पश्चिम बंगाल जेल संहिता में कहा गया है कि जेल में काम जाति के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए। जैसे खाना पकाने का काम प्रमुख जातियों द्वारा किया जाएगा और झाड़ू लगाने का काम विशेष जातियों के लोगों द्वारा किया जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय और अन्य को नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से महाराष्ट्र के कल्याण की मूल निवासी सुकन्या शांता द्वारा दायर याचिका में उठाए गए मुद्दों से निपटने में सहायता करने को कहा था।
पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील की इन दलीलों पर गौर किया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से तैयार किए गए मॉडल जेल मैनुअल के अनुसार राज्य जेल मैनुअल में किए गए संशोधनों के बावजूद राज्यों की जेलों में जातिगत भेदभाव किया जा रहा है। याचिका में कहा गया है कि, यह याचिका भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत जनहित में दायर की गई है, ताकि इसे अदालत के ध्यान में लाया जा सके कि विभिन्न राज्य जेल मैनुअल के तहत नियमों और प्रथाओं का प्रवर्तन जारी है। जो स्पष्ट रूप से जाति-आधारित भेदभाव पर आधारित हैं। सुकन्या शांता ने दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी।
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सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड की गई 3 अक्टूबर की वाद सूची के अनुसार मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला तथा न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ इस याचिका पर फैसला सुनाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस साल जनवरी में इस याचिका पर केंद्र और उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों से जवाब मांगा था। हालांकि छह महीने बीतने के बाद भी केवल उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने ही अपना जवाब कोर्ट में दाखिल किया है।
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यूपी सरकार को लगी थी कड़ी फटकार
बता दें कि पिछली सुनवाई में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने उत्तर प्रदेश सरकार के वकीलों की कड़ी फटकार लगाई थी। उत्तर प्रदेश सरकार के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया था कि यूपी की जेलों में कैदियों के साथ कोई जातिगत भेदभाव नहीं होता है। डीवाई चंद्रचूड़ ने उत्तर प्रदेश की जेल नियमावली के कुछ प्रावधान पढ़कर खफा हो गए थे। इस पर उन्होंने कहा था कि, नियम 158 में मैला ढोने के कर्तव्य का जिक्र है। यह मैला ढोने का कर्तव्य क्या है? इसमें मैला ढोने वालों की जाति का उल्लेख है। इसका क्या मतलब है।
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जेलों में हो रहा है भेदभाव
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा था कि, इन राज्यों की जेल संहिता जेलों के अंदर काम के आवंटन में भेदभाव करती हैं और कैदियों की जाति के आधार पर उन्हें रखने की जगह तय होती है। याचिका में केरल जेल नियमों का हवाला देते हुए कहा गया कि वे आदतन और फिर से दोषी ठहराए गए दोषियों के बीच अंतर करते हैं। जिसमें कहा गया है कि जो लोग आदतन लुटेरे, घर तोड़ने वाले, डकैत या चोर हैं, उन्हें वर्गीकृत किया जाना चाहिए और अन्य दोषियों से अलग किया जाना चाहिए।
याचिका में दावा किया गया कि पश्चिम बंगाल जेल संहिता में कहा गया है कि जेल में काम जाति के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए। जैसे खाना पकाने का काम प्रमुख जातियों द्वारा किया जाएगा और झाड़ू लगाने का काम विशेष जातियों के लोगों द्वारा किया जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय और अन्य को नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से महाराष्ट्र के कल्याण की मूल निवासी सुकन्या शांता द्वारा दायर याचिका में उठाए गए मुद्दों से निपटने में सहायता करने को कहा था।
पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील की इन दलीलों पर गौर किया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से तैयार किए गए मॉडल जेल मैनुअल के अनुसार राज्य जेल मैनुअल में किए गए संशोधनों के बावजूद राज्यों की जेलों में जातिगत भेदभाव किया जा रहा है। याचिका में कहा गया है कि, यह याचिका भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत जनहित में दायर की गई है, ताकि इसे अदालत के ध्यान में लाया जा सके कि विभिन्न राज्य जेल मैनुअल के तहत नियमों और प्रथाओं का प्रवर्तन जारी है। जो स्पष्ट रूप से जाति-आधारित भेदभाव पर आधारित हैं। सुकन्या शांता ने दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी।