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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: चुनावी हलफनामे में झूठ पर अब जनता करेगी केस, क्या नेताओं की बढ़ेगी मुश्किलें?
Fri, 16 Oct 2026 09:18 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Fri, 16 Oct 2026 09:18 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने या जरूरी तथ्य छिपाने पर आम नागरिक भी उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सीआरपीसी की धारा 195 की पाबंदी लागू नहीं होगी और शिकायत केवल चुनाव आयोग ही दर्ज करा सकता है, ऐसा जरूरी नहीं है। यह फैसला कर्नाटक के विधायक शैलेंद्र बेल्दाले के खिलाफ राजकुमार मदकी की शिकायत से जुड़े मामले में आया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने विधायक के खिलाफ रद्द की गई कार्यवाही बहाल नहीं की।
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने या अहम तथ्य छिपाने पर आम नागरिक भी उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी शिकायतों के लिए चुनाव आयोग की मंजूरी की जरूरत नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी हलफनामे को लेकर क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 16 अक्तूबर को कहा कि कोई भी नागरिक चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है, अगर उसने नामांकन के साथ दाखिल हलफनामे में गलत जानकारी दी हो या जरूरी तथ्यों को छिपाया हो। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में शिकायत दर्ज कराने के लिए भारतीय नागरिकों को केवल चुनाव आयोग पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।
यह मामला जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125ए से जुड़ा है। यह प्रावधान चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की ओर से गलत जानकारी देने, जरूरी तथ्यों को छिपाने या अनिवार्य जानकारी का खुलासा नहीं करने पर दंड का प्रावधान करता है।
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चुनाव आयोग की अनुमति जरूरी है या नहीं?
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125ए के तहत निजी नागरिक की ओर से दायर शिकायत पर दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 195 की पाबंदी लागू नहीं होगी।
यह मामला किस उम्मीदवार और किस आरोप से जुड़ा था?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राजकुमार मदकी की अपील पर आया। उन्होंने कर्नाटक के बीदर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित विधायक शैलेंद्र बेल्दाले के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। मदकी का आरोप था कि बेल्दाले ने 2023 के विधानसभा चुनाव में नामांकन के साथ दाखिल हलफनामे में अपने आवासीय पते के बारे में गलत जानकारी दी थी। मदकी ने बंगलूरू के अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी के समक्ष सीआरपीसी की धारा 200 के तहत निजी आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि विधायक का कृत्य जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125ए के तहत दंडनीय है।
यह भी पढ़ें: उत्तराखंड: मंत्री रेखा आर्या प्रकरण की जांच के लिए एसआईटी गठित, दस सदस्यीय टीम करेगी जांच
कर्नाटक हाईकोर्ट ने शिकायत क्यों रद्द की थी?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने 7 मार्च 2025 को मदकी की शिकायत रद्द कर दी थी। हाईकोर्ट का कहना था कि कथित अपराध के मामले में कार्रवाई शुरू करने के लिए चुनाव आयोग की ओर से शिकायत दर्ज कराई जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा था कि मतदाता ऐसे मामले में चुनाव याचिका का रास्ता अपना सकता है, लेकिन निजी आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं करा सकता।
इस फैसले को चुनौती देते हुए मदकी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। शीर्ष अदालत ने कानूनी सवाल पर निजी शिकायत के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि धारा 125ए को सीआरपीसी की धारा 195 में शामिल नहीं किया गया है। अदालत के मुताबिक, कानून बनाने वालों ने यह फैसला जानबूझकर लिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने विधायक बेल्दाले के खिलाफ पहले रद्द की गई कार्यवाही को दोबारा शुरू करने का आदेश नहीं दिया।
इस फैसले का मतदाताओं और उम्मीदवारों पर क्या असर पड़ेगा?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने के आरोप पर निजी नागरिक भी आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए शिकायत केवल चुनाव आयोग की ओर से ही दर्ज कराए जाने की शर्त नहीं है। हालांकि, शिकायत दर्ज होने का मतलब यह नहीं है कि उम्मीदवार दोषी साबित हो गया। शिकायत के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर सक्षम मजिस्ट्रेट उचित आदेश दे सकते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी हलफनामे को लेकर क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 16 अक्तूबर को कहा कि कोई भी नागरिक चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है, अगर उसने नामांकन के साथ दाखिल हलफनामे में गलत जानकारी दी हो या जरूरी तथ्यों को छिपाया हो। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में शिकायत दर्ज कराने के लिए भारतीय नागरिकों को केवल चुनाव आयोग पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।
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यह मामला जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125ए से जुड़ा है। यह प्रावधान चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की ओर से गलत जानकारी देने, जरूरी तथ्यों को छिपाने या अनिवार्य जानकारी का खुलासा नहीं करने पर दंड का प्रावधान करता है।
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चुनाव आयोग की अनुमति जरूरी है या नहीं?
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125ए के तहत निजी नागरिक की ओर से दायर शिकायत पर दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 195 की पाबंदी लागू नहीं होगी।
- सीआरपीसी की धारा 195 कुछ खास अपराधों में अदालत को सीधे संज्ञान लेने से रोकती है, जब तक अधिकृत सरकारी अधिकारी या संबंधित अदालत लिखित शिकायत न करे।
- सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 125ए के तहत चुनावी हलफनामे से जुड़े मामले में निजी शिकायत को इस पाबंदी से गुजरना जरूरी नहीं है।
- अदालत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी निर्वाचित उम्मीदवार को परेशान करने के लिए झूठी या बेबुनियाद शिकायत करता है, तो सक्षम मजिस्ट्रेट मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार उचित आदेश दे सकते हैं।
यह मामला किस उम्मीदवार और किस आरोप से जुड़ा था?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राजकुमार मदकी की अपील पर आया। उन्होंने कर्नाटक के बीदर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित विधायक शैलेंद्र बेल्दाले के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। मदकी का आरोप था कि बेल्दाले ने 2023 के विधानसभा चुनाव में नामांकन के साथ दाखिल हलफनामे में अपने आवासीय पते के बारे में गलत जानकारी दी थी। मदकी ने बंगलूरू के अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी के समक्ष सीआरपीसी की धारा 200 के तहत निजी आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि विधायक का कृत्य जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125ए के तहत दंडनीय है।
यह भी पढ़ें: उत्तराखंड: मंत्री रेखा आर्या प्रकरण की जांच के लिए एसआईटी गठित, दस सदस्यीय टीम करेगी जांच
कर्नाटक हाईकोर्ट ने शिकायत क्यों रद्द की थी?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने 7 मार्च 2025 को मदकी की शिकायत रद्द कर दी थी। हाईकोर्ट का कहना था कि कथित अपराध के मामले में कार्रवाई शुरू करने के लिए चुनाव आयोग की ओर से शिकायत दर्ज कराई जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा था कि मतदाता ऐसे मामले में चुनाव याचिका का रास्ता अपना सकता है, लेकिन निजी आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं करा सकता।
इस फैसले को चुनौती देते हुए मदकी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। शीर्ष अदालत ने कानूनी सवाल पर निजी शिकायत के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि धारा 125ए को सीआरपीसी की धारा 195 में शामिल नहीं किया गया है। अदालत के मुताबिक, कानून बनाने वालों ने यह फैसला जानबूझकर लिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने विधायक बेल्दाले के खिलाफ पहले रद्द की गई कार्यवाही को दोबारा शुरू करने का आदेश नहीं दिया।
इस फैसले का मतदाताओं और उम्मीदवारों पर क्या असर पड़ेगा?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने के आरोप पर निजी नागरिक भी आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए शिकायत केवल चुनाव आयोग की ओर से ही दर्ज कराए जाने की शर्त नहीं है। हालांकि, शिकायत दर्ज होने का मतलब यह नहीं है कि उम्मीदवार दोषी साबित हो गया। शिकायत के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर सक्षम मजिस्ट्रेट उचित आदेश दे सकते हैं।