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सुप्रीम कोर्ट: हाईकोर्ट के आदेश को पलटा, कहा- यौन उत्पीड़न के मामलों में प्रक्रिया सजा नहीं बन सकती

Fri, 03 Dec 2021 08:59 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Fri, 03 Dec 2021 08:59 PM IST
सार

शीर्ष अदालत ने यौन दुराचार की जांच की कार्यवाही के अमान्य होने की बढ़ती प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला। शीर्ष अदालत ने कहा, ‘यौन उत्पीड़न से पीड़ित एक अधीनस्थ को अपने वरिष्ठ के यौन दुराचार की रिपोर्ट करने से पहले कई तरह के विचारों और बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

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Supreme Court overturns order of Calcutta High Court says process cannot become punishment in cases of sexual harassment Latest News Update
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : Social Media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए परिवर्तनकारी कानून तब पीड़ित के लिए मददगार नहीं होता जब अपील की व्यवस्था की प्रक्रिया ही ‘सजा’ बन जाए। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा है, ‘यह महत्वपूर्ण है कि अदालतें यौन उत्पीड़न के खिलाफ अधिकार की भावना को बनाए रखें, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सभी व्यक्तियों को जीवन जीने और सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ‘शक्ति की गतिशीलता’ भी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से घिरी होती है।’

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शीर्ष अदालत ने यौन दुराचार की जांच की कार्यवाही के अमान्य होने की बढ़ती प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला। शीर्ष अदालत ने कहा, ‘यौन उत्पीड़न से पीड़ित एक अधीनस्थ को अपने वरिष्ठ के यौन दुराचार की रिपोर्ट करने से पहले कई तरह के विचारों और बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए केंद्र सरकार द्वारा कलकत्ता हाईकोर्ट के खंडपीठ व एकलपीठ के उस फैसले के खिलाफ दाखिल याचिका को स्वीकार कर लिया जिसमें बीएसएफ के महानिदेशक द्वारा एक कांस्टेबल को यौन दुराचार का दोषी ठहराने के फैसले को गलत ठहराया गया था। महानिदेशक द्वारा हेड कांस्टेबल को कड़ी फटकार के साथ पदोन्नति के लिए पांच साल की सेवा जब्ती और पेंशन के लिए सात साल की सेवा जब्ती की सजा सुनाई गई थी। जबकि हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी किए बिना कहा, ‘यह स्पष्ट है कि घटना की तारीख के बारे में विसंगति मामूली प्रकृति की थी क्योंकि घटना आधी रात के तुरंत बाद और अगले दिन हुई थी। हालांकि इस तरह के एक तुच्छ पहलू को बड़ी प्रासंगिकता मानते हुए आरोपी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की संपूर्णता को अमान्य करते हुए और उसे उसके पद पर बहाल करने से शिकायतकर्ता का उपाय शून्य हो गया।’


शीर्ष अदालत ने आगे कहा, इस मामले में हाईकोर्ट द्वारा न केवल कमांडेंट के अधिकार क्षेत्र की व्याख्या  दोषपूर्ण है बल्कि कार्यवाही की गंभीरता के प्रति एक कठोर रवैया भी प्रदर्शित किया।

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