{"_id":"68a52fafc2c5a8022d04dbee","slug":"supreme-court-order-uphesc-daily-wage-workers-regularization-from-2002-govt-financial-reasons-not-talisman-2025-08-20","type":"story","status":"publish","title_hn":"सुप्रीम आदेश: UPHESC के दैनिक कर्मी 2002 से नियमित हों, सरकार वित्तीय कारण का इस्तेमाल ताबीज जैसा नहीं कर सकती","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
सुप्रीम आदेश: UPHESC के दैनिक कर्मी 2002 से नियमित हों, सरकार वित्तीय कारण का इस्तेमाल ताबीज जैसा नहीं कर सकती
Wed, 20 Aug 2025 07:45 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
राजीव सिन्हा
राजीव सिन्हा
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Wed, 20 Aug 2025 07:45 AM IST
सार
शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग में लंबे समय से कार्यरत अपीलकर्ता दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को 24 अप्रैल, 2002 से नियमित करने का आदेश दिया। इसी दिन हाईकोर्ट ने पहली बार उनके मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि वित्तीय बाधाओं को दशकों से कार्य कर रहे कर्मचारियों को वैध नियमितीकरण से वंचित करने के लिए ताबीज की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अस्थायी श्रेणी के तहत कामगारों का दीर्घकालिक शोषण लोक प्रशासन में विश्वास को कम करता है।
विज्ञापन
शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग में लंबे समय से कार्यरत अपीलकर्ता दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को 24 अप्रैल, 2002 से नियमित करने का आदेश दिया। इसी दिन हाईकोर्ट ने पहली बार उनके मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था। सेवा एवं नियमितीकरण कानून में नया मानक स्थापित करते हुए शीर्ष अदालत ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी संवर्गों में अतिरिक्त पदों के सृजन का निर्देश दिया।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें: JP Nadda: राहुल गांधी के वोट चोरी आरोप पर जेपी नड्डा का पलटवार, कहा- जनता में फैला रहे झूठ, खुद ही बनवाया मजाक
विज्ञापन
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मंगलवार को फैसले में इस पर जोर दिया कि राज्य (केंद्र व राज्य सरकारें) सांविधानिक नियोक्ता हैं। वह उन लोगों के भरोसे बजट का संतुलन नहीं बना सकता, जो सबसे बुनियादी व आवर्ती सार्वजनिक कार्य करते हैं। अदालत ने कहा, जहां काम दिन-ब-दिन और साल-दर-साल दोहराया जाता है, वहां प्रतिष्ठान को स्वीकृत शक्ति में उस वास्तविकता को प्रतिबिंबित करना चाहिए। नियमित श्रमिकों का दीर्घकालिक शोषण समान सुरक्षा के वादे का उल्लंघन है।
तीन महीने में बकाया वेतन व पेंशन दें
कोर्ट ने कहा, अन्य समान पदस्थ कर्मचारियों को पहले ही नियमित कर दिया था, जबकि अपीलकर्ता दैनिक वेतनभोगी के रूप में कार्यरत रहे। यह रवैया मनमानी उजागर करता है। लिहाजा सभी अपीलकर्ताओं को नियमित करना जरूरी है। कोर्ट ने आदेश दिया, अपीलकर्ताओं को वेतन वृद्धि व भत्तों के साथ नियमित वेतनमान में रखा जाए। बकाया वेतन की गणना व भुगतान तीन माह में करें। रिटायर्ड अपीलकर्ताओं के लिए पेंशन व सेवांत देय राशि की गणना नियमितीकरण के आधार पर हो।
ये भी पढ़ें: Supreme Court: 'प्रशासन में निष्पक्षता अनुग्रह नहीं दायित्व', अदालत ने कई फैसलों का हवाला देकर की अहम टिप्पणी
30 साल बाद भी स्थायी नहीं
धरम सिंह और अन्य की ओर से दायर याचिका छह अपीलकर्ताओं से संबंधित थी, जिन्होंने 1989 से 1992 के बीच चपरासी और ड्राइवर के पद पर कार्य शुरू किया था। 30 वर्षों से अधिक की सेवा के बावजूद, उन्हें केवल 1,500 से 2,000 रुपये प्रति माह मिलते रहे।
- इन्हें राहत देते हुए कोर्ट ने अतिरिक्त पदों के सृजन, पूर्ण नियमितीकरण, तत्पश्चात वित्तीय लाभ और अनुपालन का शपथपत्र देने की योजना तय की।