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Supreme Court: 'चार्जशीट के दस्तावेजों तक आरोपी की पहुंच रोकी नहीं जा सकती', सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
Sat, 06 Jun 2026 12:47 PM IST
Devesh Tripathi
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 06 Jun 2026 12:47 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि किसी आरोपी को चार्जशीट में शामिल दस्तावेजों तक पहुंच से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे उसके निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। अदालत ने सेवानिवृत्त मेजर जनरल वीके सिंह को आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम से जुड़े मामले में कुछ गोपनीय दस्तावेजों की टाइप की हुई प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी भी आरोपी को चार्जशीट का हिस्सा बनने वाले दस्तावेजों तक पहुंच से वंचित नहीं किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे दस्तावेजों को छिपाना आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
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यह फैसला जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने सुनाया। पीठ ने सेवानिवृत्त मेजर जनरल वीके सिंह को कुछ अत्यधिक गोपनीय दस्तावेजों की टाइप की हुई प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। मेजर जनरल वीके सिंह 1923 के आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत 2007 में दर्ज एक मामले में अभियोजन का सामना कर रहे हैं।
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राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क पर क्या रहा अदालत का रुख?
पीठ ने गौर किया कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने यह नहीं कहा है कि सिंह द्वारा मांगे गए दस्तावेज मुकदमे के लिए प्रासंगिक नहीं हैं। अभियोजन पक्ष की एकमात्र आपत्ति यह थी कि ये दस्तावेज राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्य से अत्यधिक गोपनीय हैं। इसके साथ ही अगर इनकी प्रतियां दी गईं, तो उनके सार्वजनिक डोमेन में आने की संभावना है।
अदालत ने कहा, "यह एक सुस्थापित कानून है कि किसी भी आरोपी को चार्जशीट का हिस्सा बनने वाले दस्तावेजों, जिनमें सामान्य डायरी के रिकॉर्ड भी शामिल हैं, तक पहुंच से नहीं रोका जा सकता है। अगर ऐसे दस्तावेज सद्भावना से प्राप्त किए गए हों, अभियोजन के मामले के लिए प्रासंगिक हों, और लोक अभियोजक द्वारा न्याय और निष्पक्ष सुनवाई के हित में उनका खुलासा आवश्यक माना गया हो।"
पीठ ने आगे कहा, "ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे दस्तावेजों को छिपाने से आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।"
निचली अदालतों के आदेशों को पलटा
शीर्ष अदालत ने यह आदेश सिंह की उस याचिका पर सुनाया, जिसमें उन्होंने पिछले साल सितंबर के दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने एक ट्रायल कोर्ट के दिसंबर 2009 के आदेश को संशोधित किया था, जिसमें अभियोजन पक्ष को सिंह द्वारा मांगे गए दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
सिंह ने ट्रायल कोर्ट में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 207 के तहत एक आवेदन दायर कर अभियोजन पक्ष को कुछ ऐसे दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की थी, जो चार्जशीट का हिस्सा थे, लेकिन उन्हें नहीं दिए गए थे। सीआरपीसी की धारा 207 आरोपी को पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की प्रति उपलब्ध कराने से संबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट ने बताया फैसला क्यों जरूरी?
याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, "हमारी राय में, चार्जशीट का हिस्सा होने और उनके खिलाफ इस्तेमाल किए जाने के कारण, उक्त दस्तावेजों को वादी (सिंह) को उपलब्ध कराया जाना चाहिए।"
पीठ ने यह भी कहा कि आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के हितों को संतुलित करने के लिए, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का एक महत्वपूर्ण पहलू है। राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के साथ, उन्होंने सीबीआई का प्रतिनिधित्व करने वाले विधि अधिकारी से एक न्यायसंगत प्रस्ताव के साथ आने को कहा था।
शर्तों के साथ दस्तावेजों की आपूर्ति
सुनवाई के दौरान विधि अधिकारी ने प्रस्तुत किया कि वे उन दस्तावेजों की एक टाइप की हुई प्रति देंगे, लेकिन इस शर्त के साथ कि सिंह उनका इस्तेमाल केवल अदालत की कार्यवाही के उद्देश्य से कर सकते हैं। दस्तावेजों को किसी भी तरह से प्रसारित नहीं किया जाएगा, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से।
अदालत ने कहा, "मामले को देखते हुए, हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश रद्द किया जाता है, और ट्रायल कोर्ट का आदेश संशोधित किया जाता है। हम निर्देश देते हैं कि सीआरपीसी की धारा 207 के तहत वादी द्वारा दायर आवेदन में बताए गए दस्तावेजों की टाइप की हुई प्रति दो महीने के भीतर बचाव के उद्देश्य से आरोपी को प्रदान की जाए।"
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इन दस्तावेजों को इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया, या किसी भी सोशल प्लेटफॉर्म या अन्यथा किसी भी रूप में सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि इस संबंध में एक राजीनामा एक महीने के भीतर वादी द्वारा ट्रायल कोर्ट में दायर किया जाना चाहिए।
क्या था मामला?
सीबीआई ने सितंबर 2007 में सिंह के खिलाफ एक शिकायत पर मामला दर्ज किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अपनी पुस्तक 'इंडियाज एक्सटर्नल इंटेलिजेंस - सीक्रेट्स ऑफ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग' के प्रकाशन के माध्यम से गुप्त जानकारी का खुलासा किया था।
अप्रैल 2008 में आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत कथित अपराधों के लिए चार्जशीट दायर की गई थी। इसमें ट्रायल कोर्ट से चार्जशीट का हिस्सा बनने वाले वर्गीकृत दस्तावेजों को सील कवर में रखने का अनुरोध किया गया था। बाद में सिंह ने ट्रायल कोर्ट में सीआरपीसी की धारा 207 के तहत आवेदन दायर किया था।
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दिसंबर 2009 में, ट्रायल कोर्ट ने उन दस्तावेजों को डी-सील करने के लिए एक उचित आवेदन दायर करने के बाद सीबीआई को सिंह द्वारा मांगे गए दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। ट्रायल कोर्ट ने यह निर्देश इस शर्त पर दिया था कि आपूर्ति किए गए दस्तावेज सिंह का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील की व्यक्तिगत हिरासत में रहेंगे और उन्हें किसी भी तरह से प्रसारित नहीं किया जाएगा।
अभियोजन पक्ष ने ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने आदेश को यह निर्देश देकर संशोधित किया था कि सिंह को ट्रायल कोर्ट में रखे दस्तावेजों का निरीक्षण करने की अनुमति दी जाएगी ताकि वे मुकदमे में प्रभावी ढंग से अपना बचाव कर सकें।
कानूनी नोटिस भेजने में देरी खरीदार को संपत्ति की रजिस्ट्री से नहीं रोक सकती
सुप्रीम कोर्ट ने जमीन और मकान खरीदने वालों के हक में एक बेहद ही महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष न्यायालय ने साफ किया है कि यदि कोई खरीदार संपत्ति के सौदे के बाद विक्रेता को कानूनी नोटिस भेजने में कुछ देरी कर देता है, तो केवल इस आधार पर अदालत उसे जमीन या मकान के करार के मुताबिक रजिस्ट्री कराने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि जब कोई मुकदमा कानूनी समय सीमा के भीतर दायर किया गया हो, तो कानूनी नोटिस भेजने में हुई देरी बेअसर हो जाती है। पीठ उस मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें प्रतिवादी (विक्रेता) को विक्रय राशि का 93 फीसदी भुगतान करने और प्रतिवादी से सौदा पूरा करने और विक्रय की शेष राशि प्राप्त करने के लिए बार-बार अनुरोध करने के बावजूद, अपीलकर्ता वादी (खरीदार) को सिर्फ इसलिए अनुबंध का पालन करने में अनिच्छुक माना गया क्योंकि उसने प्रतिवादी को कानूनी नोटिस भेजने में देरी की थी।
क्या था मामला
यह मामला मार्च 2010 में हुए एक संपत्ति के खरीद-बिक्री समझौते से जुड़ा है। खरीदार (अपीलकर्ता) और विक्रेता (प्रतिवादी) के बीच संपत्ति का कुल सौदा 9,30,000 रुपये में तय हुआ था। खरीदार ने सौदे की कुल रकम का 93 फीसदी से अधिक हिस्सा यानी 9,00,000 रुपये बयाने के तौर पर एडवांस दे दिया था। समझौते के तहत बाकी बचे महज 30,000 रुपये देकर 4 महीने के भीतर (जुलाई 2010 तक) रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी की जानी थी।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि जब कोई मुकदमा कानूनी समय सीमा के भीतर दायर किया गया हो, तो कानूनी नोटिस भेजने में हुई देरी बेअसर हो जाती है। पीठ उस मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें प्रतिवादी (विक्रेता) को विक्रय राशि का 93 फीसदी भुगतान करने और प्रतिवादी से सौदा पूरा करने और विक्रय की शेष राशि प्राप्त करने के लिए बार-बार अनुरोध करने के बावजूद, अपीलकर्ता वादी (खरीदार) को सिर्फ इसलिए अनुबंध का पालन करने में अनिच्छुक माना गया क्योंकि उसने प्रतिवादी को कानूनी नोटिस भेजने में देरी की थी।
क्या था मामला
यह मामला मार्च 2010 में हुए एक संपत्ति के खरीद-बिक्री समझौते से जुड़ा है। खरीदार (अपीलकर्ता) और विक्रेता (प्रतिवादी) के बीच संपत्ति का कुल सौदा 9,30,000 रुपये में तय हुआ था। खरीदार ने सौदे की कुल रकम का 93 फीसदी से अधिक हिस्सा यानी 9,00,000 रुपये बयाने के तौर पर एडवांस दे दिया था। समझौते के तहत बाकी बचे महज 30,000 रुपये देकर 4 महीने के भीतर (जुलाई 2010 तक) रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी की जानी थी।
बिहार के पंचायती राज मंत्री की पुनर्नियुक्ति को चुनौती
बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि दीपक प्रकाश राज्य विधानसभा या विधान परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं, इसलिए उन्हें मंत्री पद पर बनाए नहीं रखा जा सकता। याचिकाकर्ता का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार कोई व्यक्ति विधायक या विधान पार्षद न होने पर अधिकतम छह महीने तक मंत्री रह सकता है। इस अवधि के भीतर उसे राज्य विधानमंडल का सदस्य बनना जरूरी होता है।
याचिका में दावा किया गया है कि यह छूट केवल एक बार के लिए होती है और सरकार बदलने के बाद इसे दोबारा लागू नहीं किया जा सकता। याचिका के अनुसार, तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 20 नवंबर 2025 को दीपक प्रकाश को मंत्री बनाया था, जबकि वह उस समय भी विधानमंडल के सदस्य नहीं थे। 15 अप्रैल 2026 को नीतीश सरकार गिर गई और मंत्रिपरिषद भंग हो गई। इसके 22 दिन बाद, 7 मई 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली नई सरकार में दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री नियुक्त कर दिया गया। याचिका में कहा गया है कि पहली नियुक्ति के आधार पर विधानमंडल का सदस्य बनने की छह महीने की अवधि 20 मई 2026 को समाप्त हो गई थी। ऐसे में दोबारा मंत्री बनाना संविधान में दी गई 6 महीने की सीमा को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने का प्रयास है।
याचिका में दावा किया गया है कि यह छूट केवल एक बार के लिए होती है और सरकार बदलने के बाद इसे दोबारा लागू नहीं किया जा सकता। याचिका के अनुसार, तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 20 नवंबर 2025 को दीपक प्रकाश को मंत्री बनाया था, जबकि वह उस समय भी विधानमंडल के सदस्य नहीं थे। 15 अप्रैल 2026 को नीतीश सरकार गिर गई और मंत्रिपरिषद भंग हो गई। इसके 22 दिन बाद, 7 मई 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली नई सरकार में दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री नियुक्त कर दिया गया। याचिका में कहा गया है कि पहली नियुक्ति के आधार पर विधानमंडल का सदस्य बनने की छह महीने की अवधि 20 मई 2026 को समाप्त हो गई थी। ऐसे में दोबारा मंत्री बनाना संविधान में दी गई 6 महीने की सीमा को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने का प्रयास है।