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Supreme Court: समलैंगिकों के विवाह के खिलाफ सरकार का तर्क- शहरी अभिजात वर्ग की सोच पूरे समाज पर नहीं थोप सकते

Mon, 17 Apr 2023 10:57 AM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Mon, 17 Apr 2023 10:57 AM IST
सार

सरकार ने आवेदन में कहा है कि 'सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाएं पूरे देश की सोच को व्यक्त नहीं करती हैं बल्कि ये शहरी अभिजात वर्ग के विचारों को ही दर्शाती हैं। इसे देश के विभिन्न वर्गों और पूरे देश के नागरिकों के विचार नहीं माने जा सकते।' 

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supreme court on same sex marriage application said urban elitist views not reflect across country legislature
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

समलैंगिक विवाह के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में नया आवेदन दायर किया है। इस आवेदन में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने वाली याचिकाओं पर विचार करने पर सवाल उठाए हैं। केंद्र ने कहा है कि शादी एक सामाजिक संस्था है और इस पर किसी नए अधिकार के सृजन या संबंध को मान्यता देने का अधिकार सिर्फ विधायिका के पास है और यह न्यायपालिका के अधिकारक्षेत्र में नहीं है। 
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केंद्र ने समलैंगिक विवाह को लेकर दिए ये तर्क
केंद्र ने आवेदन में ये भी कहा है कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का व्यापक असर होगा और सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाएं पूरे देश की सोच को व्यक्त नहीं करती हैं बल्कि ये शहरी अभिजात वर्ग के विचारों को ही दर्शाती हैं। इसे देश के विभिन्न वर्गों और पूरे देश के नागरिकों के विचार नहीं माने जा सकते। 
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आवेदन में सरकार ने कहा कि 'सुप्रीम कोर्ट याचिकाओं की विचारणीयता पर विचार करे कि क्या इन्हें सुना जा सकता है या नहीं। कानून सिर्फ विधायिका द्वारा बनाया जा सकता है, न्यायपालिका द्वारा नहीं। याचिकाकर्ताओं ने एक नई विवाह संस्था बनाने की मांग की है, जो मौजूदा कानूनों की अवधारणा से अलग है। विवाह संस्था को सिर्फ सक्षम विधायिका द्वारा मान्यता दी जा सकती है।' 

सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई हैं कई याचिकाएं
बता दें कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 15 याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने इन याचिकाओं को पांच जजों की संविधान पीठ के समक्ष भेजने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट 18 अप्रैल को इन पर सुनवाई कर सकता है। 

समलैंगिक दंपती को गोद लेने की अनुमति बच्चों के लिए खतरा
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने सुप्रीम कोर्ट में विवाह समानता से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर एक हस्तक्षेप आवेदन दायर कर कहा है कि समलैंगिक दंपती को गोद लेने की अनुमति देना बच्चों को खतरे में डालना है। यह माता-पिता की भूमिका और उनकी पहचान को लेकर बच्चों की समझ को प्रभावित कर सकता है। आयोग ने कहा कि समलैंगिक दंपती के लिए पहले एक उचित कानूनी व्यवस्था जरूरी है। उसके बाद बच्चों को समानता के दायरे में लाना दोनों यानी बच्चों और समलैंगिक दंपती दोनों के हित में होगा। बच्चों का लालन-पालन करना और समलैंगिक दंपती की ओर से उन्हें गोद लेना असामयिक है।


आयोग ने आगे कहा कि बच्चों को समलैंगिक दंपती को पालने के लिए देना, उन्हें केवल प्रयोग के लिए देने जैसा होगा जिसमें बच्चों को संघर्ष करना होगा। यह बच्चों के हित में नहीं है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के समान मानवाधिकार हैं और यह बच्चों पर भी लागू होता है जिन्हें सुरक्षित पालन-पोषण का अधिकार है।

संत समिति खिलाफ  
अखिल भारतीय संत समिति ने सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप आवेदन दायर कर कहा है कि हमारे समाज के लिए समलैंगिक विवाह की अवधारणा बाहरी है और इसे पूरी तरह से खारिज किया जाना चाहिए। समिति ने कहा, कुछ पश्चिमी देशों में समलैंगिक संबंधों का पालन किया जा रहा है, लेकिन हम भारतीय समाज में इसका पालन नहीं कर सकते हैं। समलैंगिक विवाह की वकालत करने वाले याचिकाकर्ता विवाह की भारतीय अवधारणा को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं जो अपने आप में एक संस्थान है। इससे देश में परिवार की व्यवस्था बिगड़ जाएगी। हिंदुओं में विवाह का उद्देश्य केवल शारीरिक सुख या संतान पैदा करना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति है और यह सोलह संस्कारों में से एक है।
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