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भीड़ की बढ़ती अराजकता पर लगाम के लिए सुप्रीम कोर्ट ने चलाया कायदे का चाबुक

Tue, 17 Jul 2018 07:47 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 17 Jul 2018 07:47 PM IST
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Supreme Court on cow Vigilantism, Mobocracy Can not Become New trend
देश में गोरक्षा के नाम पर हो रही भीड़ की हिंसा (मॉब लिंचिंग) रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने दिशानिर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को इसे लागू करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'कोई भी नागरिक कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता। लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाजत नहीं दी जा सकती।' कोर्ट ने कहा कि यह राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वह कानून व्यवस्था बनाये रखें। कोर्ट ने संसद से मॉब लिंचिंग के खिलाफ नया और सख्त कानून बनाने को कहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 28 अगस्त को होगी। मामले में तीन जुलाई को कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। 
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गोरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'मॉबोक्रेसी' को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और इसे एक नया नियम नहीं बनने दिया जा सकता है।' सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को सख्त आदेश दिया कि वो संविधान के मुताबिक काम करें। कोर्ट ने कहा कि राज्य इन बढ़ती घटनाओं के खिलाफ बहरे नहीं हो सकते। कोर्ट ने कहा कि इससे कड़ाई से निपटना होगा। 
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सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश

सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि राज्यों को शांति बनाए रखने की जरूरत है। कोर्ट ने गोरक्षा के नाम पर हुई हत्याओं के सिलसिले में प्रिवेंटिव (निवारक), रेमिडियल (उपचारात्मक) और प्यूनिटिव (दंडनीय) दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि संसद को इसके लिए कानून बनाना चाहिए। जिसमें भीड़ द्वारा हत्या के लिए सजा का प्रावधान हो। मामले की अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट अगस्त में करेगा।  
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सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि मॉब लिंचिंग को एक अलग अपराध की श्रेणी में रखा जाए। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इसको लेकर नया कानून बनाने के संबंध में भी जानकारी मांगी है। 

भीड़ ने डेढ़ साल में 32 लोगों को मार डाला

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश ऐसे समय पर आया है, जब शनिवार को कर्नाटक के बीदर में बच्चा चोरी के शक में भीड़ ने एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की पीट-पीटकर हत्या कर दी। 

बच्चा चोरी की अफवाह के चलते साल 2017 से अब तक पीट-पीट कर मार देने से हुई ये 32वीं हत्या है। सिर्फ साल 2018 की बात करें तो वाट्सऐप के जरिए अफवाह फैलने के बाद हुई ये 21वीं हत्या है। इस आंकड़ें में गोरक्षा के नाम पर हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं को जोड़ दें तो साल 2015 से अब तक 100 से ज्यादा मौतें हो चुकीं हैं। 

बढ़ रहा है हेट क्राइम

मानव अधिकारों की रक्षा करने वाले समूह एमनेस्टी इंटरनेशल की जुलाई के महीने में प्रकाशित रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि साल 2018 के शुरुआत के छह महीनों के भीतर 100 हेट क्राइम (नफरत की आग) की वारदातें हुई हैं। इसका शिकार आदिवासी, दलित, जातीय और धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के लोग और ट्रांसजेंडर हुए हैं।

इस मामले में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है, जहां हेट क्राइम की 18 घटनाएं हुई हैं। दूसरे स्थान पर गुजरात है, जहां ऐसे 13 मामले सामने आ चुके हैं। इसके बाद तीसरे स्थान पर है राजस्थान, जहां अभी तक ऐसी 8 घटनाएं हुई हैं। वहीं तमिलनाडु और बिहार चौथे और पांचवें स्थान पर हैं, जहां से कुल 7 मामले सामने आए हैं। 

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने देश में हुए हेट क्राइम की घटनाओं के आंकड़े दादरी में मोहम्मद अखलाख की हत्या के बाद एकत्रित करने शुरू किए थे। साल 2015 में अखलाख की हत्या भीड़ ने घर में बीफ रखने के आरोप में कर दी थी। इसके अलावा एमनेस्टी की वेबसाइट हाल्ट द हेट पर भी ऐसे 603 मामले सामने आ चुके हैं।



तीन राज्यों के खिलाफ अवमानना नोटिस

महात्मा गांधी के पोते तुषार गांधी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर 2017 को राज्यों को मॉब लिंचिंग रोकने का आदेश दिया था। हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया। जिसकी वजह से उनके खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी किया गया। राज्यों के चीफ सेकेट्री से पूछा था कि क्यों ना उनके खिलाफ कोर्ट की अवमानना का मामला चलाया जाए। मामले पर अगले महीने सुनवाई होगी। 

क्या है मासुका कानून

याचिकाकर्ता के वकील संजय हेगड़े के मुताबिक मौजूदा कानून मॉब लिंचिंग से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं और इस तरह के अपराध के दोषियों को आजीवन कारावास होना चाहिए। संजय हेगड़े ने इन घटनाओं से निपटने और घटना होने के बाद अपनाए जाने वाले कदमों पर विस्तृत सुझाव कोर्ट के सामने रखे थे। यह सुझाव मानव सुरक्षा कानून (मासुका) पर आधारित हैं। सुझावों में नोडल अधिकारी, हाइवे पेट्रोल, एफआईआर, चार्जशीट और जांच अधिकारियों की नियुक्ति जैसे कदम शामिल हैं। 

हेगड़े के आलावा भीड़ द्वारा हत्याएं से जुड़ी याचिकाएं तुषार गांधी, तहसीन पुनावाला और इंदिरा जयसिंह ने भी दायर की हैं। इस प्रस्तावित कानून के बारे में हेगड़े का कहना है कि यह मसौदा विधेयक गालीगलौज के साथ भीड़ की अप्रत्यक्ष उत्तेजना को अपराध मानता है। मुकदमा चलाए जाने पर इस अपराध के लिए अधिकतम आजीवन कारावास का प्रावधान है। 

इस तरह की वारदातों को रोकने में जानबूझकर नाकाम रहने वाले पुलिस अधिकारियों और जिलाधिकारियों के लिए एक साल तक की कैद अथवा जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान है। मसौदा विधेयक में एक ऐसा प्रावधान भी है जिसके तहत स्थानीय थानेदारों को उनके क्षेत्र में होने वाली लिंचिंग की घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। हालांकि एक समयबद्ध न्यायिक जांच के जरिये यह साबित किया जा सकता है कि वास्तव में घटना उनके नियंत्रण से बाहर थी। 

मौजूदा कानून के तहत क्या कार्रवाई होती है?

मॉब लिंचिंग की प्रकृति और प्रेरणा हत्या के सामान्य मामलों से अलग होने के बावजूद भारत में इसके लिए कोई अलग से कानून मौजूद नहीं है। आईपीसी में लिंचिंग जैसी घटनाओं के खिलाफ कार्रवाई के बारे में कोई जिक्र नहीं है। इन्हें अनुच्छेद 302 (हत्या), 307 (हत्या को कोशिश), 323 (जानबूझकर घायल करना), 147-148 (दंगा-फसाद), 149 (आज्ञा के विरूद्ध इकट्ठा होना) के तहत ही सुलझाया जाता है। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के अनुच्छेद 223A में भी इस तरह के अपराध के लिए उपयुक्त कानून के इस्तेमाल की बात कही गई है। इस अपराध के बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं लिखा है। 

कानून के जानकारों के मुताबिक मॉब लिंचिंग की घटनाएं को प्रदेश सरकारों का समर्थन हासिल होता है। या यूं कहा जाए कि लिंचिंग के आरोपियों को एक तरह से संरक्षण मिला होता है। इसलिए इनसे मौजूदा कानूनों के तहत निपटना संभव नहीं। जानकारों का कहना है कि मॉब लिंचिंग को लेकर भारत में कोई कानून नहीं है। ऐसे में मॉब लिंचिंग को आम हत्या के कानून से जोड़कर देखा जाता है। 

वकालत के पेशे से जुड़े लोगों का मानना है कि आम हत्या की घटना और लिंचिंग की घटना को अलग-अलग करना होगा। दहेज रोकथाम अधिनियम और बाल यौन अपराधियों के लिए बनाए गए पॉक्सो कानून की तरह ही लिंचिंग की घटनाओं के लिए भी अलग कानून की जरूरत है। 

कैसे अफवाह ले लेती है जान

कर्नाटक के बीदर जिले में बच्चा चोरी के शक में भीड़ के हाथों पीट-पीट कर मारे गए इंजीनियर की मौत की वजह एक व्हाट्सऐप संदेश था, जो हमले से ठीक आधे घंटे पहले ही भेजा गया था। स्थानीय पुलिस के अनुसार एक स्थानीय व्यक्ति ने व्हाट्सऐप पर एक मनगढ़ंत संदेश भेजा था कि लाल कार में जा रहे इन लोगों को बचके न जाने दिया जाए। ये बच्चा चोर हैं। इस संदेश के साथ बच्चों को चाकलेट बांट रहे चार लोगों का वीडियो भी था। ये संदेश कर्नाटक के बीदर जिले के मुरकी और आसपास के गांवों में व्हाट्सएप समूहों में भेजा गया था। पुलिस का कहना है कि व्हाट्सएप पर संदेश वायरल होने के बाद लोगों ने कार का पीछा किया और फिर उसमें सवार चार लोगों पर हमला कर दिया जिनमें से एक की मौत हो गई। मारे गए 32 वर्षीय मोहम्मद आज़म हैदराबाद के मलकपेट के रहने वाले थे और वो गूगल के एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। 

लोग बिना जांचे संदेश आगे बढ़ा देते हैं

सोशल मीडिया और इंटरनेट के प्रसार से भारत में समस्या और भी गंभीर हो गई है। यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक में हुई रिसर्च की मानें तो 40 फीसदी पढ़े-लिखे युवा खबर की सत्यता जांच किए बिना ही संदेश दूसरे लोगों को भेज देते हैं। आंकड़ो की माने तो कुछ युवाओं को अगर सोशल मीडिया के जरिये मिले संदेशों भी कुछ गलत भी लगता है तो इनमें से सिर्फ 45 फीसदी युवा ही खबर की सत्यता जांचते हैं। 

भीड़ ने इतने लोगों की ली जान

14 जुलाई कर्नाटक के बीदर जिले में 'बच्चा चोरी' के शक में 32 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर और हैदराबाद के मलकपेट निवासी मोहम्मद आजम अहमद की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। इस घटना में उनके तीन साथी बुरी तरह जख्मी हो गए। 

एक जुलाई को चेन्नई में बिहारी मजदूर बी गोपाल साहू और के विनोद बिहारी को लोगों ने बच्चे का अपहरण करने के शक में बुरी तरह पीटा।

एक जुलाई को ही महाराष्ट्र के धुले में बच्चा चोर होने के शक में 5 लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। 

29 जून को त्रिपुरा में यूपी निवासी सब्जी बेचने वाले एक व्यक्ति को बच्चा चुराने के शक में भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया।

27 जून को मध्य प्रदेश में भीड़ ने बच्चा चोर होने के शक में एक शख्स की पीट-पीट कर जान ले ली।

आठ जून की रात असम के कार्बी आंगलांग में गोवा के निवासी नीलोत्पल दास (29) और उनके दोस्त अभिजीत नाथ (30) को बच्चा चोर गिरोह का समझकर भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। 

झारखंड के सिंहभूम जिले में अलग-अलग घटनाओं में कम से कम नौ लोग ऐसी ही अफवाहों की बलि चढ़ गए। 

पिछले दो महीनों में देश में भीड़ ने पीट-पीट कर 15 लोगों की हत्या कर डाली। असम, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, बंगाल, तेलंगाना में ऐसी दो-दो घटनाएं और गुजरात और कर्नाटक में एक-एक घटना सामने आ चुकी है। 

2018 में अब तक 21 लोगों को बच्चा चुराने के शक में भीड़ ने मार डाला। 

ओडिशा में पिछले 30 दिनों में भीड़ के हमले की ऐसी 15 वारदातें हो चुकी हैं। जिनमें कुल 28 लोगों के साथ मारपीट की गई।

महाराष्ट्र में बीते 25 दिनों में 14 मॉब लिंचिंग की घटनाओं में नौ लोगों की जान चली गई।

गौमांस और बच्चा चुराने के शक में साल 2015 से अब तक भीड़ द्वारा हिंसा में 100 से ज्यादा लोगों की मौत का केस दर्ज किया गया है। 
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