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Supreme Court: नर्सरी में दाखिले के लिए बच्चों की स्क्रीनिंग से जुड़ा केस, शीर्ष अदालत में समीक्षा याचिका दायर
Tue, 26 Dec 2023 06:14 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Tue, 26 Dec 2023 06:14 PM IST
सार
नर्सरी में दाखिले के लिए बच्चों की स्क्रीनिंग पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव वाले विधेयक को लेकर सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर की गई है। शीर्ष अदालत ने पहले इस मामले में उपराज्यपाल को निर्देश देने से इनकार कर दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
विस्तार
स्कूलों में नर्सरी कक्षा में दाखिले के लिए बच्चों की स्क्रीनिंग पर रोक लगाने की मांग की जा रही है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर की गई है। जिस आदेश की समीक्षा की अपील की गई है, उसमें अदालत ने दिल्ली के उपराज्यपाल को निर्देश देने से इनकार कर दिया था।
नर्सरी में दाखिले से जुड़े इस मामले में 2015 के विधेयक पर दिल्ली के उपराज्यपाल को निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने अदालत से गुहार लगाते हुए कहा था कि विधेयक पर सहमति देने या उसे वापस करने का निर्देश दिया जाए। विधेयक में नर्सरी कक्षा में दाखिले के लिए बच्चों की स्क्रीनिंग पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव था।
समीक्षा याचिका गैर सरकारी संगठन (एनजीओ)- सोशल ज्यूरिस्ट की तरफ से दायर की गई है। इसमें तर्क दिया गया है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अहम आदेश पारित किए हैं। इसलिए समीक्षा याचिका बेहद महत्वपूर्ण है। याचिकाकर्ताओं ने कहा, अदालत ने पंजाब और तमिलनाडु की विधानसभाओं से पारित विधेयकों पर सहमति या उसे लौटाने का फैसला करने में राज्यपालों की तरफ से हुई देरी को लेकर नाराजगी व्यक्त की है।
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याचिका में शीर्ष अदालत की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया गया, जिसमें राज्यपालों को संविधान के अनुच्छेद 200 के प्रावधानों के अनुरूप कार्य करने की नसीहत दी गई थी। बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत विधानसभा से पारित विधेयक पर राज्यपाल के फैसलों को लेकर प्रावधान और प्रक्रिया की रूपरेखा की व्याख्या की गई है। इसमें कहा गया है कि राज्यपाल के पास विधेयक पर सहमति देने, कुछ समय तक विचार के लिए रोकने, भारत के राष्ट्रपति के साम मिलकर विचार के लिए आरक्षित करने का अधिकार है। राज्यपाल विधेयक को दोबारा विचार के लिए विधायिका के पास वापस भी भेज सकते हैं।
शीर्ष अदालत ने बीते 13 अक्तूबर को एनजीओ की याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा कि कोर्ट सरकार को कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती। अदालत ने कहा था, क्या कानून बनाने के लिए कोई आदेश दिया जा सकता है? क्या हम सरकार को विधेयक पेश करने का निर्देश दे सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट हर परेशानी के लिए रामबाण नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट से पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में भी एनजीओ की तरफ से दायर जनहित याचिका खारिज हुई थी। अदालत ने कहा था कि वह विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। अदालत ने स्कूल शिक्षा (संशोधन) विधेयक, 2015 पर सहमति देने या इसे वापस करने को लेकर दिल्ली के उपराज्यपाल को निर्देश देने से भी इनकार कर दिया था।
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नर्सरी में दाखिले से जुड़े इस मामले में 2015 के विधेयक पर दिल्ली के उपराज्यपाल को निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने अदालत से गुहार लगाते हुए कहा था कि विधेयक पर सहमति देने या उसे वापस करने का निर्देश दिया जाए। विधेयक में नर्सरी कक्षा में दाखिले के लिए बच्चों की स्क्रीनिंग पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव था।
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समीक्षा याचिका गैर सरकारी संगठन (एनजीओ)- सोशल ज्यूरिस्ट की तरफ से दायर की गई है। इसमें तर्क दिया गया है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अहम आदेश पारित किए हैं। इसलिए समीक्षा याचिका बेहद महत्वपूर्ण है। याचिकाकर्ताओं ने कहा, अदालत ने पंजाब और तमिलनाडु की विधानसभाओं से पारित विधेयकों पर सहमति या उसे लौटाने का फैसला करने में राज्यपालों की तरफ से हुई देरी को लेकर नाराजगी व्यक्त की है।
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याचिका में शीर्ष अदालत की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया गया, जिसमें राज्यपालों को संविधान के अनुच्छेद 200 के प्रावधानों के अनुरूप कार्य करने की नसीहत दी गई थी। बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत विधानसभा से पारित विधेयक पर राज्यपाल के फैसलों को लेकर प्रावधान और प्रक्रिया की रूपरेखा की व्याख्या की गई है। इसमें कहा गया है कि राज्यपाल के पास विधेयक पर सहमति देने, कुछ समय तक विचार के लिए रोकने, भारत के राष्ट्रपति के साम मिलकर विचार के लिए आरक्षित करने का अधिकार है। राज्यपाल विधेयक को दोबारा विचार के लिए विधायिका के पास वापस भी भेज सकते हैं।
शीर्ष अदालत ने बीते 13 अक्तूबर को एनजीओ की याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा कि कोर्ट सरकार को कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती। अदालत ने कहा था, क्या कानून बनाने के लिए कोई आदेश दिया जा सकता है? क्या हम सरकार को विधेयक पेश करने का निर्देश दे सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट हर परेशानी के लिए रामबाण नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट से पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में भी एनजीओ की तरफ से दायर जनहित याचिका खारिज हुई थी। अदालत ने कहा था कि वह विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। अदालत ने स्कूल शिक्षा (संशोधन) विधेयक, 2015 पर सहमति देने या इसे वापस करने को लेकर दिल्ली के उपराज्यपाल को निर्देश देने से भी इनकार कर दिया था।