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SC: घुड़सवारी टीम चयन पर सुप्रीम कोर्ट का दखल से इनकार; कल्याणी परिवार विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थ नियुक्त
Mon, 13 Jul 2026 04:00 PM IST
नितिन गौतम
आईएएनएस, अमर उजाला
आईएएनएस, अमर उजाला
Published by: नितिन गौतम
Updated Mon, 13 Jul 2026 04:00 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट अपडेट
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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पेपर लीक मामलों पर सख्त कार्रवाई की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे देश भर में पेपर लीक मामलों की समय-सीमा के भीतर जांच और तेजी से सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए एक मानक प्रश्नावली और विशेष जांच प्रक्रिया तैयार करें। अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर याचिका में भ्रष्टाचार विरोधी, मनी लॉन्ड्रिंग, बेनामी संपत्ति और काले धन कानूनों के प्रावधानों को लागू करने के अलावा, पेपर लीक के अपराधियों और अपराध में कथित रूप से शामिल उनके परिवार के सदस्यों की चल और अचल संपत्तियों की जब्ती के लिए निर्देश देने की भी मांग की गई है।
याचिका में, जिसमें केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, साथ ही भारत के विधि आयोग को प्रतिवादी बनाया गया है, यह तर्क दिया गया है कि बार-बार होने वाले पेपर लीक के देशव्यापी प्रभाव होते हैं, जिससे छात्र और उनके परिवार गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं। याचिका में कहा गया है, 'पेपर लीक का देशव्यापी असर हुआ है, जिससे छात्रों और उनके परिवारों पर बुरा असर पड़ा है और कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली है।'
याचिका के अनुसार, पेपर लीक के लिए जिम्मेदार लोगों को रोकने, जांच करने और प्रभावी ढंग से मुकदमा चलाने में अधिकारियों की लगातार विफलता के परिणामस्वरूप संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का लगातार उल्लंघन हो रहा है।
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याचिका में 3 मई, 2026 को कथित एनईईटी पेपर लीक का जिक्र करते हुए कहा गया कि इस घटना ने लाखों छात्रों को प्रभावित किया और परीक्षा संबंधी अपराधों से निपटने में प्रणालीगत कमियों को उजागर किया। जनहित याचिका में दावा किया गया है कि बार-बार पेपर लीक की घटनाओं के कारण छात्रों को वित्तीय कठिनाई, शैक्षिक और रोजगार के अवसरों की हानि, गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्याएं, बढ़ती आत्महत्याओं का बोझ झेलना पड़ रहा है।
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याचिका में, जिसमें केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, साथ ही भारत के विधि आयोग को प्रतिवादी बनाया गया है, यह तर्क दिया गया है कि बार-बार होने वाले पेपर लीक के देशव्यापी प्रभाव होते हैं, जिससे छात्र और उनके परिवार गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं। याचिका में कहा गया है, 'पेपर लीक का देशव्यापी असर हुआ है, जिससे छात्रों और उनके परिवारों पर बुरा असर पड़ा है और कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली है।'
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याचिका के अनुसार, पेपर लीक के लिए जिम्मेदार लोगों को रोकने, जांच करने और प्रभावी ढंग से मुकदमा चलाने में अधिकारियों की लगातार विफलता के परिणामस्वरूप संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का लगातार उल्लंघन हो रहा है।
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याचिका में 3 मई, 2026 को कथित एनईईटी पेपर लीक का जिक्र करते हुए कहा गया कि इस घटना ने लाखों छात्रों को प्रभावित किया और परीक्षा संबंधी अपराधों से निपटने में प्रणालीगत कमियों को उजागर किया। जनहित याचिका में दावा किया गया है कि बार-बार पेपर लीक की घटनाओं के कारण छात्रों को वित्तीय कठिनाई, शैक्षिक और रोजगार के अवसरों की हानि, गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्याएं, बढ़ती आत्महत्याओं का बोझ झेलना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने पारसनाथ डेवलपर्स और उसके निदेशकों के बैंक खाते फ्रीज किए
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पारसनाथ डेवलपर्स और उसके निदेशकों के बैंक खातों को तत्काल प्रभाव से फ्रीज करने का आदेश दिया। साथ ही कंपनी के अधिकारियों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए। अदालत ने वरिष्ठ नागरिकों द्वारा अपने घर का कब्जा पाने के लिए पिछले 20 वर्षों से किए जा रहे संघर्ष का संज्ञान लेते हुए यह सख्त रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने नियामक प्राधिकरणों की निष्क्रियता पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने हरियाणा सरकार के तंत्र और बिल्डर के बीच संभावित मिलीभगत की भी आशंका व्यक्त की।
मामला कैंसर से उबर चुकीं रीता टिक्कू और लोकेश टिक्कू की ओर से दायर याचिका से संबंधित है। दोनों ने गुरुग्राम के सेक्टर-53 स्थित पारसनाथ एक्सोटिका परियोजना में अपनी जीवनभर की जमा पूंजी निवेश की थी। याचिकाकर्ताओं को वर्ष 2006 में आवासीय इकाइयां आवंटित की गई थीं और वर्ष 2007 की शुरुआत में फ्लैट खरीदार समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। करीब 1.78 करोड़ रुपये की पूरी कीमत चुकाने के बावजूद उन्हें वर्ष 2013 तक फ्लैट का कब्जा नहीं मिला। दो दशक बीत जाने के बाद भी परियोजना अब तक अधूरी है।
याचिकाकर्ताओं को वर्ष 2021 में हरियाणा रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (एचआरईआरए) से राहत मिली थी, जिसने बिल्डर को मुआवजा देने का आदेश दिया था। हालांकि, बिल्डर ने न तो उस आदेश को चुनौती दी और न ही उसका पालन किया।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'आदेश के क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया निरर्थक होकर रह गई है।' उन्होंने कहा कि एचआरईआरए द्वारा गिरफ्तारी वारंट जारी किए जाने के बावजूद उनका कभी पालन नहीं कराया गया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जिला कलेक्टर और स्थानीय पुलिस या तो बिल्डरों के साथ मिलीभगत कर रहे हैं या फिर अपने दायित्वों का निर्वहन करने में विफल रहे हैं।' यह सुनिश्चित करने के लिए कि बिल्डर आगे भी न्यायिक प्रक्रिया से बच न सके, पीठ ने पारसनाथ हेसा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड, पारसनाथ डेवलपर्स लिमिटेड तथा उनके प्रबंध निदेशकों और निदेशकों के व्यक्तिगत बैंक खातों को तत्काल प्रभाव से फ्रीज करने का आदेश दिया।
मामला कैंसर से उबर चुकीं रीता टिक्कू और लोकेश टिक्कू की ओर से दायर याचिका से संबंधित है। दोनों ने गुरुग्राम के सेक्टर-53 स्थित पारसनाथ एक्सोटिका परियोजना में अपनी जीवनभर की जमा पूंजी निवेश की थी। याचिकाकर्ताओं को वर्ष 2006 में आवासीय इकाइयां आवंटित की गई थीं और वर्ष 2007 की शुरुआत में फ्लैट खरीदार समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। करीब 1.78 करोड़ रुपये की पूरी कीमत चुकाने के बावजूद उन्हें वर्ष 2013 तक फ्लैट का कब्जा नहीं मिला। दो दशक बीत जाने के बाद भी परियोजना अब तक अधूरी है।
याचिकाकर्ताओं को वर्ष 2021 में हरियाणा रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (एचआरईआरए) से राहत मिली थी, जिसने बिल्डर को मुआवजा देने का आदेश दिया था। हालांकि, बिल्डर ने न तो उस आदेश को चुनौती दी और न ही उसका पालन किया।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'आदेश के क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया निरर्थक होकर रह गई है।' उन्होंने कहा कि एचआरईआरए द्वारा गिरफ्तारी वारंट जारी किए जाने के बावजूद उनका कभी पालन नहीं कराया गया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जिला कलेक्टर और स्थानीय पुलिस या तो बिल्डरों के साथ मिलीभगत कर रहे हैं या फिर अपने दायित्वों का निर्वहन करने में विफल रहे हैं।' यह सुनिश्चित करने के लिए कि बिल्डर आगे भी न्यायिक प्रक्रिया से बच न सके, पीठ ने पारसनाथ हेसा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड, पारसनाथ डेवलपर्स लिमिटेड तथा उनके प्रबंध निदेशकों और निदेशकों के व्यक्तिगत बैंक खातों को तत्काल प्रभाव से फ्रीज करने का आदेश दिया।
गोवध निषेध कानूनों के सख्ती से पालन कराने की मांग, सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें राज्यों को गायों और उनके बछड़ों को वध से बचाने के लिए लागू गोवध निषेध कानूनों का प्रभावी ढंग से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पशुओं के वध से जुड़े वर्ष 2005 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संबंधित अधिकारी पालन नहीं कर रहे हैं।
इस पर पीठ ने कहा, अगर किसी न्यायिक आदेश का उल्लंघन हो रहा है तो आप अवमानना याचिका दायर करें। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध अन्य वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।
इस पर पीठ ने कहा, अगर किसी न्यायिक आदेश का उल्लंघन हो रहा है तो आप अवमानना याचिका दायर करें। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध अन्य वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।
बॉम्बे डाइंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को नहीं दी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बॉम्बे डाइंग एंड मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड और उसके प्रमोटर समूह से जुड़े मामले में सिक्योरिटीज अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने साफ किया कि SAT का यह फैसला भविष्य में किसी दूसरे मामले में मिसाल (प्रेसिडेंट) नहीं माना जाएगा। साथ ही, अदालत ने सेबी की याचिका पर नोटिस जारी कर कंपनी और वाडिया समूह से जवाब मांगा है।
यह मामला सेबी द्वारा 2022 में दिए गए उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें बॉम्बे डाइंग और उसके कुछ प्रमोटरों पर शेयर बाजार में कारोबार और सूचीबद्ध कंपनियों में अहम पद संभालने पर रोक जैसी कार्रवाई की गई थी। सेबी का आरोप था कि कंपनी और SCAL सर्विसेज लिमिटेड के बीच मुंबई के फ्लैटों की बिक्री से जुड़े 11 समझौतों के जरिए राजस्व बढ़ाकर दिखाया गया। जनवरी 2025 में SAT ने 2-1 के बहुमत से सेबी का आदेश रद्द कर दिया था। सुनवाई के दौरान सेबी ने कहा कि इन लेनदेन में गंभीर अनियमितताएं थीं, जबकि वाडिया समूह ने दावा किया कि सभी सौदे कानून और नियमों के अनुसार किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की आगे सुनवाई करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बॉम्बे डाइंग एंड मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड और उसके प्रमोटर समूह से जुड़े मामले में सिक्योरिटीज अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने साफ किया कि SAT का यह फैसला भविष्य में किसी दूसरे मामले में मिसाल (प्रेसिडेंट) नहीं माना जाएगा। साथ ही, अदालत ने सेबी की याचिका पर नोटिस जारी कर कंपनी और वाडिया समूह से जवाब मांगा है।
यह मामला सेबी द्वारा 2022 में दिए गए उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें बॉम्बे डाइंग और उसके कुछ प्रमोटरों पर शेयर बाजार में कारोबार और सूचीबद्ध कंपनियों में अहम पद संभालने पर रोक जैसी कार्रवाई की गई थी। सेबी का आरोप था कि कंपनी और SCAL सर्विसेज लिमिटेड के बीच मुंबई के फ्लैटों की बिक्री से जुड़े 11 समझौतों के जरिए राजस्व बढ़ाकर दिखाया गया। जनवरी 2025 में SAT ने 2-1 के बहुमत से सेबी का आदेश रद्द कर दिया था। सुनवाई के दौरान सेबी ने कहा कि इन लेनदेन में गंभीर अनियमितताएं थीं, जबकि वाडिया समूह ने दावा किया कि सभी सौदे कानून और नियमों के अनुसार किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की आगे सुनवाई करेगा।
सार्वजनिक जगहों पर अश्लील सामग्री देखने पर रोक की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील सामग्री देखने पर रोक लगाने और इसके लिए राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि यह मामला कानून से ज्यादा सरकार की नीतियों से जुड़ा है, इसलिए इस पर फैसला लेना केंद्र सरकार और संबंधित विशेषज्ञों का काम है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन यह ऐसा कानूनी प्रश्न नहीं है जिस पर अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए। अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह अपनी मांग केंद्र सरकार के समक्ष प्रतिनिधित्व के रूप में रखे।
यह जनहित याचिका सामाजिक कार्यकर्ता बी. एल. जैन ने दायर की थी। याचिका में केंद्र सरकार को राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश देने की मांग की गई थी, ताकि खासकर नाबालिगों में अश्लील सामग्री देखने की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके। साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी तरह की अश्लील सामग्री सामग्री देखने पर प्रतिबंध लगाने की भी मांग की गई थी। याचिका में दावा किया गया कि इंटरनेट पर अश्लील सामग्री की आसान उपलब्धता के कारण इसकी लत बढ़ रही है। इसमें यह भी कहा गया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69ए के तहत सरकार के पास आपत्तिजनक सामग्री को ब्लॉक करने का अधिकार है। याचिका में यह भी दावा किया गया कि अश्लील सामग्री की बढ़ती खपत से यौन अपराधों में वृद्धि हो रही है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय को नीति और तकनीकी विशेषज्ञता का मामला बताते हुए याचिका खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील सामग्री देखने पर रोक लगाने और इसके लिए राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि यह मामला कानून से ज्यादा सरकार की नीतियों से जुड़ा है, इसलिए इस पर फैसला लेना केंद्र सरकार और संबंधित विशेषज्ञों का काम है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन यह ऐसा कानूनी प्रश्न नहीं है जिस पर अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए। अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह अपनी मांग केंद्र सरकार के समक्ष प्रतिनिधित्व के रूप में रखे।
यह जनहित याचिका सामाजिक कार्यकर्ता बी. एल. जैन ने दायर की थी। याचिका में केंद्र सरकार को राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश देने की मांग की गई थी, ताकि खासकर नाबालिगों में अश्लील सामग्री देखने की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके। साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी तरह की अश्लील सामग्री सामग्री देखने पर प्रतिबंध लगाने की भी मांग की गई थी। याचिका में दावा किया गया कि इंटरनेट पर अश्लील सामग्री की आसान उपलब्धता के कारण इसकी लत बढ़ रही है। इसमें यह भी कहा गया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69ए के तहत सरकार के पास आपत्तिजनक सामग्री को ब्लॉक करने का अधिकार है। याचिका में यह भी दावा किया गया कि अश्लील सामग्री की बढ़ती खपत से यौन अपराधों में वृद्धि हो रही है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय को नीति और तकनीकी विशेषज्ञता का मामला बताते हुए याचिका खारिज कर दी।
घुड़सवारी टीम चयन पर सुप्रीम कोर्ट का दखल से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने एशियन गेम्स के लिए भारतीय ड्रेसाज टीम में चयन को लेकर दाखिल याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में सवार अनुश अग्रवाल और सुदीप्ति हाजेला ने अपने चयन न होने को चुनौती दी थी। अदालत ने कहा कि वह व्यक्तिगत खेल मामलों में दखल देने से बचती है। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में कोर्ट तभी हस्तक्षेप करता है जब कोई संस्थागत समस्या हो। कोर्ट ने कहा कि अंतिम समय में व्यक्तिगत याचिकाएं खेल व्यवस्था को प्रभावित करती हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी पहले चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था। हालांकि उसने इक्वेस्ट्रियन फेडरेशन ऑफ इंडिया (EFI) को चयन नियमों का पालन करने का निर्देश दिया था। दोनों खिलाड़ी 2022 एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक विजेता हैं और उन्हें इस बार रिजर्व में रखा गया था। कोर्ट ने कहा कि अब इस मामले का अध्याय बंद हो चुका है। एशियन गेम्स 19 सितंबर से 4 अक्तूबर तक आयोजित होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने एशियन गेम्स के लिए भारतीय ड्रेसाज टीम में चयन को लेकर दाखिल याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में सवार अनुश अग्रवाल और सुदीप्ति हाजेला ने अपने चयन न होने को चुनौती दी थी। अदालत ने कहा कि वह व्यक्तिगत खेल मामलों में दखल देने से बचती है। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में कोर्ट तभी हस्तक्षेप करता है जब कोई संस्थागत समस्या हो। कोर्ट ने कहा कि अंतिम समय में व्यक्तिगत याचिकाएं खेल व्यवस्था को प्रभावित करती हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी पहले चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था। हालांकि उसने इक्वेस्ट्रियन फेडरेशन ऑफ इंडिया (EFI) को चयन नियमों का पालन करने का निर्देश दिया था। दोनों खिलाड़ी 2022 एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक विजेता हैं और उन्हें इस बार रिजर्व में रखा गया था। कोर्ट ने कहा कि अब इस मामले का अध्याय बंद हो चुका है। एशियन गेम्स 19 सितंबर से 4 अक्तूबर तक आयोजित होंगे।
कल्याणी परिवार विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थ नियुक्त
सुप्रीम कोर्ट ने कल्याणी परिवार की करीब 1 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए पूर्व जज एल. एन. राव को मध्यस्थ नियुक्त किया है। यह विवाद भारत फोर्ज के चेयरमैन बाबा कल्याणी और उनकी बहन सुगंधा हिरेमठ के बीच चल रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने दोनों पक्षों से आपसी सहमति से समाधान निकालने को कहा। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मध्यस्थता से बेहतर समाधान निकल सकता है।
कोर्ट ने कहा कि अहंकार कई बार संपत्ति से बड़ा हो जाता है, इसलिए दोनों पक्षों को सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए। दोनों पक्षों के वकीलों ने मध्यस्थता के लिए सहमति जताई और जल्द प्रक्रिया शुरू करने का आश्वासन दिया। अदालत ने संबंधित हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह मामला लंबे समय से कई अदालतों में चल रहा है और अब उम्मीद है कि मध्यस्थता से इसका समाधान निकल सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कल्याणी परिवार की करीब 1 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए पूर्व जज एल. एन. राव को मध्यस्थ नियुक्त किया है। यह विवाद भारत फोर्ज के चेयरमैन बाबा कल्याणी और उनकी बहन सुगंधा हिरेमठ के बीच चल रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने दोनों पक्षों से आपसी सहमति से समाधान निकालने को कहा। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मध्यस्थता से बेहतर समाधान निकल सकता है।
कोर्ट ने कहा कि अहंकार कई बार संपत्ति से बड़ा हो जाता है, इसलिए दोनों पक्षों को सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए। दोनों पक्षों के वकीलों ने मध्यस्थता के लिए सहमति जताई और जल्द प्रक्रिया शुरू करने का आश्वासन दिया। अदालत ने संबंधित हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह मामला लंबे समय से कई अदालतों में चल रहा है और अब उम्मीद है कि मध्यस्थता से इसका समाधान निकल सकेगा।
तमिलनाडु में गौहत्या पर हाईकोर्ट के आदेश पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है जिसमें तमिलनाडु सरकार को राज्य में गाय और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती दी थी और कहा था कि यह तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958 के खिलाफ है। इस कानून के अनुसार 10 साल से अधिक उम्र की और काम के लायक न रहने वाली गायों के वध की अनुमति है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया और कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में सुधार की जरूरत है। मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी। हाईकोर्ट ने पहले निर्देश दिया था कि बकरीद के मौके पर भी गाय या बछड़े का वध नहीं होना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है जिसमें तमिलनाडु सरकार को राज्य में गाय और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती दी थी और कहा था कि यह तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958 के खिलाफ है। इस कानून के अनुसार 10 साल से अधिक उम्र की और काम के लायक न रहने वाली गायों के वध की अनुमति है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया और कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में सुधार की जरूरत है। मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी। हाईकोर्ट ने पहले निर्देश दिया था कि बकरीद के मौके पर भी गाय या बछड़े का वध नहीं होना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।
मध्य प्रदेश हत्या मामले की जांच SIT को सौंपने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के 2023 के हत्या मामले की जांच के लिए विशेष जांच टीम (SIT) बनाने का आदेश दिया है। यह मामला सलमान खान नाम के व्यक्ति की हत्या से जुड़ा है, जिसे कथित रूप से कार से कुचल दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष जांच के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की टीम जरूरी है। SIT में तीन SSP रैंक के अधिकारी और दो DSP स्तर के अधिकारी शामिल होंगे। सभी सदस्य छतरपुर जिले के बाहर के होंगे। याचिकाकर्ता रजिया अली ने आरोप लगाया कि जांच राजनीतिक दबाव में प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि कई चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज नहीं किए गए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दो महीने में जांच पूरी की जाए और गवाहों के बयान दर्ज किए जाएं। साथ ही, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह आरोपों पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के 2023 के हत्या मामले की जांच के लिए विशेष जांच टीम (SIT) बनाने का आदेश दिया है। यह मामला सलमान खान नाम के व्यक्ति की हत्या से जुड़ा है, जिसे कथित रूप से कार से कुचल दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष जांच के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की टीम जरूरी है। SIT में तीन SSP रैंक के अधिकारी और दो DSP स्तर के अधिकारी शामिल होंगे। सभी सदस्य छतरपुर जिले के बाहर के होंगे। याचिकाकर्ता रजिया अली ने आरोप लगाया कि जांच राजनीतिक दबाव में प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि कई चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज नहीं किए गए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दो महीने में जांच पूरी की जाए और गवाहों के बयान दर्ज किए जाएं। साथ ही, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह आरोपों पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रहा है।
छात्र आत्महत्या मामले में प्रोफेसर को अग्रिम जमानत से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने केरल के एक छात्र आत्महत्या मामले में आरोपी प्रोफेसर को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शिक्षक इस तरह के व्यवहार से बच नहीं सकते। मामला बीडीएस के छात्र नितिन राज की मौत से जुड़ा है, जिसकी मौत अप्रैल में कॉलेज परिसर में हुई थी। आरोप है कि प्रोफेसर ने उसे कक्षा में अपमानित किया था।
कोर्ट ने कहा कि शिक्षक का व्यवहार छात्रों पर गहरा असर डालता है और ऐसे मामलों में जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि एक संदेश जाना जरूरी है कि छात्रों के साथ गलत व्यवहार बर्दाश्त नहीं होगा। प्रोफेसर ने आरोपों से इनकार किया है, लेकिन कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने केरल के एक छात्र आत्महत्या मामले में आरोपी प्रोफेसर को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शिक्षक इस तरह के व्यवहार से बच नहीं सकते। मामला बीडीएस के छात्र नितिन राज की मौत से जुड़ा है, जिसकी मौत अप्रैल में कॉलेज परिसर में हुई थी। आरोप है कि प्रोफेसर ने उसे कक्षा में अपमानित किया था।
कोर्ट ने कहा कि शिक्षक का व्यवहार छात्रों पर गहरा असर डालता है और ऐसे मामलों में जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि एक संदेश जाना जरूरी है कि छात्रों के साथ गलत व्यवहार बर्दाश्त नहीं होगा। प्रोफेसर ने आरोपों से इनकार किया है, लेकिन कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।
होमबायर्स के मामले में बिल्डर के खातों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने पारसनाथ डेवलपर्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कंपनी और उसके निदेशकों के बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है। साथ ही अधिकारियों के खिलाफ वारंट जारी किए गए हैं। यह मामला गुरुग्राम के एक प्रोजेक्ट से जुड़ा है, जहां खरीदारों को 20 साल बाद भी घर नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि बिल्डर ने नियमों और आदेशों की खुलकर अनदेखी की है।
अदालत ने हरियाणा सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए और अधिकारियों पर लापरवाही के आरोप लगाए। कोर्ट ने कहा कि यह मामला रेरा कानून की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है। याचिकाकर्ताओं ने 2006 में फ्लैट खरीदा था, लेकिन अब तक कब्जा नहीं मिला। कोर्ट ने सभी संबंधित अधिकारियों को आदेशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने पारसनाथ डेवलपर्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कंपनी और उसके निदेशकों के बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है। साथ ही अधिकारियों के खिलाफ वारंट जारी किए गए हैं। यह मामला गुरुग्राम के एक प्रोजेक्ट से जुड़ा है, जहां खरीदारों को 20 साल बाद भी घर नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि बिल्डर ने नियमों और आदेशों की खुलकर अनदेखी की है।
अदालत ने हरियाणा सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए और अधिकारियों पर लापरवाही के आरोप लगाए। कोर्ट ने कहा कि यह मामला रेरा कानून की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है। याचिकाकर्ताओं ने 2006 में फ्लैट खरीदा था, लेकिन अब तक कब्जा नहीं मिला। कोर्ट ने सभी संबंधित अधिकारियों को आदेशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने 360 मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों की याचिकाएं खारिज कीं
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के करीब 360 मदरसा शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने उनकी उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें उन्होंने अपनी नौकरी नियमित करने और राज्य सरकार की अनुदान (ग्रांट-इन-एड) योजना के तहत वेतन व अन्य लाभ देने की मांग की थी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और ए.जी. मसीह की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पहले 13 याचिकाकर्ताओं के मामलों की विस्तार से जांच की गई थी। अदालत ने यह तय किया था कि यदि इनमें से किसी एक का दावा सही पाया जाता है तो बाकी मामलों पर भी विचार किया जाएगा। लेकिन किसी भी याचिकाकर्ता का दावा अदालत को संतोषजनक नहीं लगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन नियुक्तियों का कानूनी प्रक्रिया के अनुसार चयन नहीं हुआ, उनके लिए राज्य सरकार को वेतन या अन्य भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने पहले दिए गए अंतरिम आदेश भी तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिए, जिनकी वजह से कुछ कर्मचारी सेवा में बने हुए थे या उन्हें वेतन मिल रहा था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 14 मार्च 2016 के बाद, सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना मदरसों में की गई नियुक्तियां पहली नजर में ही अवैध हैं और उन्हें वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड की पूरी जांच से यह साबित नहीं हुआ कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियां नियमों के अनुसार हुई थीं। कोर्ट ने इन दावों को "निराधार" बताते हुए कहा कि ऐसी नियुक्तियां व्यवस्था पर धब्बा हैं और इन्हें संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के करीब 360 मदरसा शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने उनकी उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें उन्होंने अपनी नौकरी नियमित करने और राज्य सरकार की अनुदान (ग्रांट-इन-एड) योजना के तहत वेतन व अन्य लाभ देने की मांग की थी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और ए.जी. मसीह की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पहले 13 याचिकाकर्ताओं के मामलों की विस्तार से जांच की गई थी। अदालत ने यह तय किया था कि यदि इनमें से किसी एक का दावा सही पाया जाता है तो बाकी मामलों पर भी विचार किया जाएगा। लेकिन किसी भी याचिकाकर्ता का दावा अदालत को संतोषजनक नहीं लगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन नियुक्तियों का कानूनी प्रक्रिया के अनुसार चयन नहीं हुआ, उनके लिए राज्य सरकार को वेतन या अन्य भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने पहले दिए गए अंतरिम आदेश भी तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिए, जिनकी वजह से कुछ कर्मचारी सेवा में बने हुए थे या उन्हें वेतन मिल रहा था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 14 मार्च 2016 के बाद, सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना मदरसों में की गई नियुक्तियां पहली नजर में ही अवैध हैं और उन्हें वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड की पूरी जांच से यह साबित नहीं हुआ कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियां नियमों के अनुसार हुई थीं। कोर्ट ने इन दावों को "निराधार" बताते हुए कहा कि ऐसी नियुक्तियां व्यवस्था पर धब्बा हैं और इन्हें संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
नागरिकता का फैसला निष्पक्ष और कानूनी प्रक्रिया से हो: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति की नागरिकता या विदेशी होने का फैसला केवल निष्पक्ष, कानूनी और तर्कसंगत प्रक्रिया के आधार पर ही किया जाना चाहिए। अदालत ने इस टिप्पणी के साथ गुवाहाटी हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें कुछ लोगों को विदेशी घोषित करने वाले विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) के आदेशों को बरकरार रखा गया था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि सरकार को यह अधिकार है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कोई भी व्यक्ति गलत तरीके से भारतीय नागरिकता का दावा न करे। लेकिन नागरिकता तय करने की पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और कानून के मुताबिक होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसने किसी भी अपीलकर्ता की नागरिकता पर कोई फैसला नहीं दिया है। अदालत ने सभी मामलों को संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों के पास दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया और कहा कि वे बिना किसी पुराने आदेश से प्रभावित हुए स्वतंत्र रूप से फैसला करें।
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भारत में रहने वाले हर व्यक्ति को मिलता है, चाहे वह भारतीय नागरिक हो या नहीं। इसलिए किसी को विदेशी घोषित करने की प्रक्रिया भी निष्पक्ष, उचित और मनमानी से मुक्त होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मामले की सुनवाई एकतरफा हुई है या संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका नहीं मिला है, तो ऐसी प्रक्रिया स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि किसी को विदेशी घोषित करने का फैसला बहुत गंभीर परिणाम वाला होता है, इसलिए हर मामले में कानून का पूरी तरह पालन होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को चार सप्ताह के भीतर संबंधित न्यायाधिकरण के सामने पेश होने का निर्देश दिया है। साथ ही कहा कि नई सुनवाई पूरी होने तक उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी, बशर्ते वे जांच में पूरा सहयोग करें। अदालत ने न्यायाधिकरणों से छह महीने के भीतर मामलों का निपटारा करने का प्रयास करने को भी कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति की नागरिकता या विदेशी होने का फैसला केवल निष्पक्ष, कानूनी और तर्कसंगत प्रक्रिया के आधार पर ही किया जाना चाहिए। अदालत ने इस टिप्पणी के साथ गुवाहाटी हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें कुछ लोगों को विदेशी घोषित करने वाले विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) के आदेशों को बरकरार रखा गया था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि सरकार को यह अधिकार है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कोई भी व्यक्ति गलत तरीके से भारतीय नागरिकता का दावा न करे। लेकिन नागरिकता तय करने की पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और कानून के मुताबिक होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसने किसी भी अपीलकर्ता की नागरिकता पर कोई फैसला नहीं दिया है। अदालत ने सभी मामलों को संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों के पास दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया और कहा कि वे बिना किसी पुराने आदेश से प्रभावित हुए स्वतंत्र रूप से फैसला करें।
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भारत में रहने वाले हर व्यक्ति को मिलता है, चाहे वह भारतीय नागरिक हो या नहीं। इसलिए किसी को विदेशी घोषित करने की प्रक्रिया भी निष्पक्ष, उचित और मनमानी से मुक्त होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मामले की सुनवाई एकतरफा हुई है या संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका नहीं मिला है, तो ऐसी प्रक्रिया स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि किसी को विदेशी घोषित करने का फैसला बहुत गंभीर परिणाम वाला होता है, इसलिए हर मामले में कानून का पूरी तरह पालन होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को चार सप्ताह के भीतर संबंधित न्यायाधिकरण के सामने पेश होने का निर्देश दिया है। साथ ही कहा कि नई सुनवाई पूरी होने तक उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी, बशर्ते वे जांच में पूरा सहयोग करें। अदालत ने न्यायाधिकरणों से छह महीने के भीतर मामलों का निपटारा करने का प्रयास करने को भी कहा है।
लौह अयस्क पर रॉयल्टी नियमों को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया
सुप्रीम कोर्ट ने लौह अयस्क समेत प्रमुख खनिजों पर रॉयल्टी की गणना से जुड़े केंद्र सरकार के नियमों को संवैधानिक और वैध करार दिया है। अदालत ने किरलोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें इन नियमों को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि खनिजों के बिक्री मूल्य (सेल वैल्यू) की गणना करते समय रॉयल्टी, जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (NMET) में दिए गए भुगतान को शामिल करना पूरी तरह वैध है।
कंपनी का तर्क था कि इन भुगतानों को बिक्री मूल्य में शामिल करने से रॉयल्टी का बोझ बढ़ जाता है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 तथा अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि सरकार को कर चोरी रोकने और राजस्व की सुरक्षा के लिए ऐसे नियम बनाने का अधिकार है। अदालत ने यह भी माना कि कोयला और लौह अयस्क की तुलना नहीं की जा सकती। कोयला क्षेत्र में मुख्य रूप से सरकारी कंपनियों का दबदबा है, जबकि लौह अयस्क के क्षेत्र में बड़ी संख्या में निजी कंपनियां काम करती हैं। इसलिए दोनों के लिए अलग-अलग नियम बनाना उचित है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि यदि इन नियमों को रद्द किया जाता है तो अगले 50 वर्षों में राज्यों को लगभग 7 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्थिक और कर संबंधी नीतियों में अदालतों को कानून बनाने वाली संस्थाओं के फैसलों का सम्मान करना चाहिए। केवल किसी एक कंपनी को होने वाली परेशानी के आधार पर जनहित से जुड़े वित्तीय नियमों को रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जनता का हित सर्वोपरि है और ऐसे मामलों में निजी हितों की तुलना में सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने लौह अयस्क समेत प्रमुख खनिजों पर रॉयल्टी की गणना से जुड़े केंद्र सरकार के नियमों को संवैधानिक और वैध करार दिया है। अदालत ने किरलोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें इन नियमों को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि खनिजों के बिक्री मूल्य (सेल वैल्यू) की गणना करते समय रॉयल्टी, जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (NMET) में दिए गए भुगतान को शामिल करना पूरी तरह वैध है।
कंपनी का तर्क था कि इन भुगतानों को बिक्री मूल्य में शामिल करने से रॉयल्टी का बोझ बढ़ जाता है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 तथा अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि सरकार को कर चोरी रोकने और राजस्व की सुरक्षा के लिए ऐसे नियम बनाने का अधिकार है। अदालत ने यह भी माना कि कोयला और लौह अयस्क की तुलना नहीं की जा सकती। कोयला क्षेत्र में मुख्य रूप से सरकारी कंपनियों का दबदबा है, जबकि लौह अयस्क के क्षेत्र में बड़ी संख्या में निजी कंपनियां काम करती हैं। इसलिए दोनों के लिए अलग-अलग नियम बनाना उचित है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि यदि इन नियमों को रद्द किया जाता है तो अगले 50 वर्षों में राज्यों को लगभग 7 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्थिक और कर संबंधी नीतियों में अदालतों को कानून बनाने वाली संस्थाओं के फैसलों का सम्मान करना चाहिए। केवल किसी एक कंपनी को होने वाली परेशानी के आधार पर जनहित से जुड़े वित्तीय नियमों को रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जनता का हित सर्वोपरि है और ऐसे मामलों में निजी हितों की तुलना में सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र बोला, तीन भाषा नीति किसी पर थोपने का प्रयास नहीं
केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने जवाबी हलफनामे में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 का उद्देश्य बहुभाषिकता को बढ़ावा देना है। इसके तहत किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपने का कोई प्रावधान नहीं है।
यह हलफनामा शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के अवर सचिव सुभाष चंद की ओर से दाखिल किया गया है। सरकार ने यह जवाब सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के आदेश के अनुपालन में सेहर जैन की तरफ से दायर रिट याचिका पर दिया है। यह पूरा मामला सीबीएसई के 15 मई 2026 के उस परिपत्र (सर्कुलर) को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है, जिसमें कक्षा 9वीं और 10वीं के भाषा अध्ययन को एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम के अनुरूप करने की बात कही गई है। सरकार का पक्ष है कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है। एनईपी-2020 को डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट और व्यापक जन-परामर्श के बाद तैयार किया गया है। हलफनामे में स्पष्ट किया गया है कि तीन भाषा सूत्र में पूरा लचीलापन रहेगा। भाषाओं का चयन राज्यों, क्षेत्रों और विद्यार्थियों की पसंद पर निर्भर होगा, बशर्ते तीन में से कम से कम दो भाषाएं भारतीय हों। छात्र चाहें तो कक्षा 6 या 7 में अपनी भाषा बदल भी सकते हैं।
केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने जवाबी हलफनामे में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 का उद्देश्य बहुभाषिकता को बढ़ावा देना है। इसके तहत किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपने का कोई प्रावधान नहीं है।
यह हलफनामा शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के अवर सचिव सुभाष चंद की ओर से दाखिल किया गया है। सरकार ने यह जवाब सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के आदेश के अनुपालन में सेहर जैन की तरफ से दायर रिट याचिका पर दिया है। यह पूरा मामला सीबीएसई के 15 मई 2026 के उस परिपत्र (सर्कुलर) को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है, जिसमें कक्षा 9वीं और 10वीं के भाषा अध्ययन को एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम के अनुरूप करने की बात कही गई है। सरकार का पक्ष है कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है। एनईपी-2020 को डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट और व्यापक जन-परामर्श के बाद तैयार किया गया है। हलफनामे में स्पष्ट किया गया है कि तीन भाषा सूत्र में पूरा लचीलापन रहेगा। भाषाओं का चयन राज्यों, क्षेत्रों और विद्यार्थियों की पसंद पर निर्भर होगा, बशर्ते तीन में से कम से कम दो भाषाएं भारतीय हों। छात्र चाहें तो कक्षा 6 या 7 में अपनी भाषा बदल भी सकते हैं।
हवाई किरायों में मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से दो हफ्ते में मांगी नियमावली
त्योहारों और आपातकालीन स्थितियों में आसमान छूते हवाई किरायों और निजी एयरलाइंस की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत बनाए गए नए नियमों को दो हफ्ते के भीतर अदालत के सामने पेश करे। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने साफ किया कि सरकार इन नियमों को एक सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष रखे, चाहे इन्हें अभी संसद के दोनों सदनों में पेश किया गया हो या नहीं। अदालत इस मामले पर अगली सुनवाई 3 अगस्त को करेगी। पीठ ने यह निर्देश सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मीनारायणन की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर दिया। याचिका में देश के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में पारदर्शिता लाने, यात्रियों के अधिकारों की रक्षा करने और निजी एयरलाइनों की तरफ से हवाई किरायों में होने वाले अत्याधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र नियामक बनाने की मांग की गई है।
केंद्र सरकार के वकील ने पीठ को बताया कि नए नियमों का मसौदा पूरी तरह तैयार है और फिलहाल इनका अनुवाद किया जा रहा है, जिसके बाद इन्हें संसद के सामने रखा जाना है। इस पर अदालत ने दो हफ्ते का समय देते हुए नियमों की कॉपी सीधे कोर्ट में जमा करने को कहा। वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील रवींद्र श्रीवास्तव ने दलील दी कि जब तक नए नियम लागू नहीं होते, तब तक पुराने नियम ही चल रहे हैं। 15 मई की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि हवाई किराए तर्कसंगत होने चाहिए और केंद्र से हवाई यात्रियों को राहत देने के लिए कहा था। तब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया था कि 2024 का नया कानून जनवरी 2025 में लागू हो गया था और इसके नियम तैयार किए जा रहे हैं।
त्योहारों और आपातकालीन स्थितियों में आसमान छूते हवाई किरायों और निजी एयरलाइंस की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत बनाए गए नए नियमों को दो हफ्ते के भीतर अदालत के सामने पेश करे। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने साफ किया कि सरकार इन नियमों को एक सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष रखे, चाहे इन्हें अभी संसद के दोनों सदनों में पेश किया गया हो या नहीं। अदालत इस मामले पर अगली सुनवाई 3 अगस्त को करेगी। पीठ ने यह निर्देश सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मीनारायणन की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर दिया। याचिका में देश के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में पारदर्शिता लाने, यात्रियों के अधिकारों की रक्षा करने और निजी एयरलाइनों की तरफ से हवाई किरायों में होने वाले अत्याधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र नियामक बनाने की मांग की गई है।
केंद्र सरकार के वकील ने पीठ को बताया कि नए नियमों का मसौदा पूरी तरह तैयार है और फिलहाल इनका अनुवाद किया जा रहा है, जिसके बाद इन्हें संसद के सामने रखा जाना है। इस पर अदालत ने दो हफ्ते का समय देते हुए नियमों की कॉपी सीधे कोर्ट में जमा करने को कहा। वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील रवींद्र श्रीवास्तव ने दलील दी कि जब तक नए नियम लागू नहीं होते, तब तक पुराने नियम ही चल रहे हैं। 15 मई की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि हवाई किराए तर्कसंगत होने चाहिए और केंद्र से हवाई यात्रियों को राहत देने के लिए कहा था। तब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया था कि 2024 का नया कानून जनवरी 2025 में लागू हो गया था और इसके नियम तैयार किए जा रहे हैं।
नागरिकता की स्थिति निष्पक्ष और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से तय करें : शीर्ष कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि नागरिकता की स्थिति का निर्धारण एक निष्पक्ष, कानूनी और तर्कसंगत प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। नागरिकता जैसे संवेदनशील मामले में केवल औपचारिक प्रक्रिया पर्याप्त नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने गौहाटी हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें कुछ लोगों को विदेशी घोषित करने के आदेशों की पुष्टि की गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि राज्य का वैध और गंभीर हित इसमें निहित है कि जो लोग कानूनी रूप से भारतीय नागरिकता का दावा करने के हकदार नहीं हैं, वो प्रक्रिया के दुरुपयोग, झूठे दावों या प्रक्रियात्मक देरी का फायदा उठाकर ऐसी स्थिति हासिल न कर सकें। लेकिन साथ ही, स्पष्ट किया कि इस मामले में प्रत्येक व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए।
अदालत ने इस पर जोर दिया कि कानून के समक्ष समानता, कानूनों का समान संरक्षण, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भारत के क्षेत्र के भीतर हर व्यक्ति को प्राप्त है। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि उसने अपीलकर्ताओं द्वारा नागरिकता के दावे के गुण-दोष की जांच नहीं की है। कोर्ट ने संबंधित अधिकरणों से कहा कि हाईकोर्ट या ट्रिब्यूनल की किसी भी पिछली टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना, इन मामलों पर नए सिरे से निर्णय लें। हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए, पीठ ने मामलों में नए सिरे से निर्णय के लिए संबंधित फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया।
नागरिकता व विदेशी होने में गहरा कानूनी महत्व
शीर्ष कोर्ट ने असम में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के समक्ष चली कार्यवाही से उपजी अपीलों के एक समूह पर अपना फैसला सुनाया। कुछ मामलों में यह कार्यवाही तत्कालीन अवैध प्रवासी ट्रिब्यूनल के समक्ष हुई थी। पीठ ने नोट किया कि इन सभी मामलों में अपीलकर्ताओं को विदेशी घोषित किया गया था और हाईकोर्ट ने इन विचारों की पुष्टि की थी। पीठ ने कहा कि नागरिकता और विदेशी होने की स्थिति का गहरा सांविधानिक और कानूनी महत्व है।
अनुच्छेद 11 के तहत यह शक्ति संसद के पास सुरक्षित
शीर्ष कोर्ट ने कहा, संविधान का अनुच्छेद 11 नागरिकता की प्राप्ति और समाप्ति तथा नागरिकता से जुड़े अन्य सभी मामलों के संबंध में प्रावधान बनाने की संसद की शक्ति को सुरक्षित रखता है। इसके अलावा, विदेशी अधिनियम, 1946 और विदेशी (ट्रिब्यूनल) आदेश, 1964 वह वैधानिक तंत्र प्रदान करते हैं जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं, इस सवाल को ट्रिब्यूनल के पास भेजा जाता है और ट्रिब्यूनल इसका निर्धारण करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि नागरिकता की स्थिति का निर्धारण एक निष्पक्ष, कानूनी और तर्कसंगत प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। नागरिकता जैसे संवेदनशील मामले में केवल औपचारिक प्रक्रिया पर्याप्त नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने गौहाटी हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें कुछ लोगों को विदेशी घोषित करने के आदेशों की पुष्टि की गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि राज्य का वैध और गंभीर हित इसमें निहित है कि जो लोग कानूनी रूप से भारतीय नागरिकता का दावा करने के हकदार नहीं हैं, वो प्रक्रिया के दुरुपयोग, झूठे दावों या प्रक्रियात्मक देरी का फायदा उठाकर ऐसी स्थिति हासिल न कर सकें। लेकिन साथ ही, स्पष्ट किया कि इस मामले में प्रत्येक व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए।
अदालत ने इस पर जोर दिया कि कानून के समक्ष समानता, कानूनों का समान संरक्षण, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भारत के क्षेत्र के भीतर हर व्यक्ति को प्राप्त है। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि उसने अपीलकर्ताओं द्वारा नागरिकता के दावे के गुण-दोष की जांच नहीं की है। कोर्ट ने संबंधित अधिकरणों से कहा कि हाईकोर्ट या ट्रिब्यूनल की किसी भी पिछली टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना, इन मामलों पर नए सिरे से निर्णय लें। हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए, पीठ ने मामलों में नए सिरे से निर्णय के लिए संबंधित फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया।
नागरिकता व विदेशी होने में गहरा कानूनी महत्व
शीर्ष कोर्ट ने असम में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के समक्ष चली कार्यवाही से उपजी अपीलों के एक समूह पर अपना फैसला सुनाया। कुछ मामलों में यह कार्यवाही तत्कालीन अवैध प्रवासी ट्रिब्यूनल के समक्ष हुई थी। पीठ ने नोट किया कि इन सभी मामलों में अपीलकर्ताओं को विदेशी घोषित किया गया था और हाईकोर्ट ने इन विचारों की पुष्टि की थी। पीठ ने कहा कि नागरिकता और विदेशी होने की स्थिति का गहरा सांविधानिक और कानूनी महत्व है।
अनुच्छेद 11 के तहत यह शक्ति संसद के पास सुरक्षित
शीर्ष कोर्ट ने कहा, संविधान का अनुच्छेद 11 नागरिकता की प्राप्ति और समाप्ति तथा नागरिकता से जुड़े अन्य सभी मामलों के संबंध में प्रावधान बनाने की संसद की शक्ति को सुरक्षित रखता है। इसके अलावा, विदेशी अधिनियम, 1946 और विदेशी (ट्रिब्यूनल) आदेश, 1964 वह वैधानिक तंत्र प्रदान करते हैं जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं, इस सवाल को ट्रिब्यूनल के पास भेजा जाता है और ट्रिब्यूनल इसका निर्धारण करता है।
ऋण धोखाधड़ी मामले में अनिल अंबानी को गिरफ्तारी से राहत
सुप्रीम कोर्ट ने करीब 40,000 करोड़ रुपये के ऋण धोखाधड़ी से जुड़े अनिल धीरूभाई अंबानी समूह मामले की सुनवाई के दौरान साफ किया कि वह किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी का निर्देश नहीं दे सकता। अदालत ने कहा कि यह जांच एजेंसियों को तय करना है कि किसके खिलाफ क्या कार्रवाई करनी है और अदालत का काम फिलहाल जांच की निगरानी करना है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें अनिल धीरूभाई अंबानी समूह की कंपनियों से जुड़े कथित 40,000 करोड़ रुपये के ऋण धोखाधड़ी की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने पीठ से कहा कि जांच एजेंसियों ने अब तक केवल छोटे अधिकारियों को गिरफ्तार किया है, जबकि सेबी की एक रिपोर्ट में अनिल अंबानी को पूरे मामले का किंगपिन बताया गया है। इस पर पीठ ने कहा कि किसी की गिरफ्तारी का निर्देश देना अदालत के लिए उचित नहीं होगा। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि जांच एजेंसियों ने मामले में महत्वपूर्ण प्रगति की है। सीबीआई तीन आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है। इसके अलावा ईडी चार अभियोजन शिकायतें दाखिल कर चुका है। बाकी मामलों में जांच अभी जारी है। उन्होंने यह भी बताया कि केवल निचले स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई है, बल्कि समूह के प्रबंध निदेशक को भी गिरफ्तार किया जा चुका है।
आरोपपत्र देखने की मांग
वकील भूषण ने अदालत से अनुरोध किया कि सीबीआई का आरोपपत्र रिकॉर्ड पर लाया जाए, ताकि यह देखा जा सके कि उसमें अनिल अंबानी की क्या भूमिका बताई गई है। उन्होंने कहा कि यदि सेबी की रिपोर्ट में उन्हें मुख्य भूमिका वाला व्यक्ति बताया गया है, तो यह जानना जरूरी है कि जांच एजेंसियों ने उनकी भूमिका की जांच किस प्रकार की है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत इस संबंध में अपने आदेश में कोई टिप्पणी दर्ज नहीं करेगी, ताकि किसी भी पक्ष के अधिकार प्रभावित न हों।
सुप्रीम कोर्ट ने करीब 40,000 करोड़ रुपये के ऋण धोखाधड़ी से जुड़े अनिल धीरूभाई अंबानी समूह मामले की सुनवाई के दौरान साफ किया कि वह किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी का निर्देश नहीं दे सकता। अदालत ने कहा कि यह जांच एजेंसियों को तय करना है कि किसके खिलाफ क्या कार्रवाई करनी है और अदालत का काम फिलहाल जांच की निगरानी करना है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें अनिल धीरूभाई अंबानी समूह की कंपनियों से जुड़े कथित 40,000 करोड़ रुपये के ऋण धोखाधड़ी की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने पीठ से कहा कि जांच एजेंसियों ने अब तक केवल छोटे अधिकारियों को गिरफ्तार किया है, जबकि सेबी की एक रिपोर्ट में अनिल अंबानी को पूरे मामले का किंगपिन बताया गया है। इस पर पीठ ने कहा कि किसी की गिरफ्तारी का निर्देश देना अदालत के लिए उचित नहीं होगा। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि जांच एजेंसियों ने मामले में महत्वपूर्ण प्रगति की है। सीबीआई तीन आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है। इसके अलावा ईडी चार अभियोजन शिकायतें दाखिल कर चुका है। बाकी मामलों में जांच अभी जारी है। उन्होंने यह भी बताया कि केवल निचले स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई है, बल्कि समूह के प्रबंध निदेशक को भी गिरफ्तार किया जा चुका है।
आरोपपत्र देखने की मांग
वकील भूषण ने अदालत से अनुरोध किया कि सीबीआई का आरोपपत्र रिकॉर्ड पर लाया जाए, ताकि यह देखा जा सके कि उसमें अनिल अंबानी की क्या भूमिका बताई गई है। उन्होंने कहा कि यदि सेबी की रिपोर्ट में उन्हें मुख्य भूमिका वाला व्यक्ति बताया गया है, तो यह जानना जरूरी है कि जांच एजेंसियों ने उनकी भूमिका की जांच किस प्रकार की है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत इस संबंध में अपने आदेश में कोई टिप्पणी दर्ज नहीं करेगी, ताकि किसी भी पक्ष के अधिकार प्रभावित न हों।