मानहानि मामला: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान को दी राहत, व्यक्तिगत पेशी से छूट जारी रखी
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने मामले पर सुनवाई 26 मार्च तक टाल दी और तब तक सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होने में भी छूट दे दी।
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पीठ ने दी राहत
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने मामले पर सुनवाई 26 मार्च तक टाल दी और तब तक सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होने में भी छूट दे दी। शिवराज सिंह चौहान की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने कहा कि तन्खा ने जिस पर आपत्ति की है, वह बयान सदन में दिया गया था और वह संविधान के अनुच्छेद 194(2) के तहत आता है। इससे पहले मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ दायर मानहानि के मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया था। जिसके बाद चौहान ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने शिवराज सिंह चौहान समेत तीनों भाजपा नेताओं के खिलाफ जारी वारंट के निष्पादन पर रोक लगा दी।
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सुप्रीम कोर्ट ने माथेरान में पेवर ब्लॉक बिछाने पर नीरी से तलब की रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (नीरी) से इस बारे में रिपोर्ट पेश करने को कहा कि क्या महाराष्ट्र के माथेरान में मिट्टी के कटाव से बचने के लिए सड़कों पर पेवर ब्लॉक बिछाना जरूरी है। मुंबई से करीब 83 किलोमीटर दूर स्थित माथेरान हिल स्टेशन में ऑटोमोबाइल की अनुमति नहीं है।
जस्टिस बीआर गवई व जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगते हुए नीरी से कुछ पहलुओं की जांच करने को कहा। इसमें यह भी शामिल है कि क्या मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए पेवर ब्लॉक लगाना जरूरी है। इसके अलावा कोई अन्य विकल्प भी ढूंढ़ना होगा। माथेरान की मिट्टी की सड़कों पर पेवर ब्लॉक बिछाने के मामले में दायर एक आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। आवेदक के वकील ने दावा किया कि यह प्रयास पहाड़ी शहर माथेरान को मोटरयुक्त बनाने के लिए किया गया था। राज्य के वकील ने दावा किया कि मिट्टी के क्षरण को रोकने के लिए यह काम जरूरी है। उन्होंने कहा कि कंक्रीट पेवर ब्लॉकों के स्थान पर मिट्टी के पेवर ब्लॉक बिछाने के निर्णय पर विचार किया जा रहा है। पीठ ने कहा, हमारा मानना है कि यह उचित होगा कि एनईईआरआई इस मुद्दे की जांच करे।
मुख्य चुनाव आयुक्त, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी याचिकाओं पर 16 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए 16 अप्रैल की तारीख तय की।
दरअसल, याचिकाकर्ता एनजीओ ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने समक्ष उल्लेख किया कि मामले आज सूचीबद्ध है लेकिन आज इस पर सुनवाई होने की संभावना नहीं है। भूषण ने अनुरोध किया कि यह मामला लोकतंत्र की जड़ से जुड़ा है और यह मुद्दा 2023 के संविधान पीठ के फैसले के अंतर्गत आता है।
जस्टिस कांत ने कहा कि अदालत इन सभी बातों को समझती है लेकिन हर दिन कई जरूरी मामले सूचीबद्ध होते हैं। पीठ ने कहा कि मामले को 16 अप्रैल को सूचीबद्ध किया जाएगा ताकि मामले की अंतिम सुनवाई हो सके। भूषण ने कहा कि इस मामले में एक छोटा कानूनी प्रश्न यह है कि क्या प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की भागीदारी वाले पैनल के माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी 2023 के संविधान पीठ के फैसले का पालन किया जाना चाहिए या 2023 के कानून का पालन किया जाना चाहिए, जिसमें सीजेआई को पैनल से बाहर रखा गया है। मालूम हो कि सरकार ने 17 फरवरी को चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया था। कुमार नए कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त हैं।
कॉर्बेट अवैध निर्माण मामले में अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई में सुस्ती पर उत्तराखंड सरकार को ‘सुप्रीम’ फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में अवैध निर्माण के आरोपी वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ धीमी गति से कार्रवाई करने के लिए फटकार लगाई। कोर्ट ने सरकार को तीन महीने के अंदर विभागीय कार्यवाही पूरी करने का आदेश दिया।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि सरकार कनिष्ठ स्तर के अधिकारियों के खिलाफ तो तेजी से कार्रवाई करती है लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता। पीठ ने राज्य सरकार के एक हलफनामे पर गौर किया जिसमें अधिकारियों के खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्यवाही के बारे में विस्तार से बताया गया है। अपने समक्ष पेश चार्ट का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि रेंजर, डिप्टी रेंजर आदि रैंक के 17 में से 16 अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही पूरी हो चुकी है। दुर्भाग्यवश एक अधिकारी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। पीठ ने कहा कि एक अन्य चार्ट से पता चलता है कि वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही कछुए की गति से चल रही है। इसलिए, हम राज्य सरकार को निर्देश देते हैं कि वह सभी अधिकारियों के संबंध में सभी विभागीय कार्यवाही आज से तीन महीने की अवधि के अंदर पूरी करे। साथ ही पीठ ने कहा कि सुनवाई तीन महीने बाद होगी।
पीठ उत्तराखंड में राजाजी राष्ट्रीय उद्यान और जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान के लिए पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र अधिसूचना के मुद्दे पर भी विचार कर रहा था। राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 के अनुसार, ईएसजेड ऐसे क्षेत्र या जोन हैं जिनमें पहचाने गए पर्यावरणीय संसाधन हैं। इनका मूल्य अतुलनीय है तथा जिनके संरक्षण के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि उनके भूदृश्य, वन्य जीवन, जैव विविधता, ऐतिहासिक और प्राकृतिक मूल्य अद्वितीय हैं। पीठ ने 5 मार्च को कहा था कि उसने केंद्र की ओर से दिए गए सुझावों पर विचार करने के बाद ईएसजेड की पहचान के लिए संशोधित प्रस्ताव पेश करने के लिए समय दिया था। उत्तराखंड सरकार के वकील ने पीठ को बताया कि संशोधित प्रस्ताव 11 मार्च को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को भेज दिया गया था। पीठ ने मंत्रालय को राज्य से प्राप्त संशोधित प्रस्ताव पर विचार करने तथा कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के बाद अंतिम अधिसूचना के प्रकाशन के लिए कदम उठाने को कहा। मंत्रालय की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को आश्वासन दिया कि यह प्रक्रिया यहां शुरू की जाएगी और इसे जल्द से जल्द पूरा करने का प्रयास किया जाएगा। पीठ ने यह मामला 12 सप्ताह बाद सुनवाई के लिए स्थगित कर दिया।
स्टेन्स हत्याकांड में दारा सिंह की सजा माफी पर निर्णय ले ओडिशा : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार से ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टुअर्ट स्टेन्स हत्याकांड में उम्र कैद की सजा काट रहे रविंद्र पाल उर्फ दारा सिंह की सजा माफी की याचिका पर निर्णय करने को कहा है, जिसने अपने कृत्य पर पाश्चाताप किया है। 1999 में स्टेन्स और उनके दो छोटे बच्चों को ओडिशा के क्योंझर जिले में हत्या कर दी गई थी।
जस्टिस मनोज मिश्र और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने ओडिशा सरकार की ओर से पेश वकील शिबाशीष मिश्रा से छह सप्ताह के भीतर निर्णय लेने और कोर्ट को सूचित करने को कहा। शीर्ष अदालत ने सिंह की समय पूर्व रिहाई की मांग वाली याचिका पर पिछले साल 9 जुलाई को ओडिशा सरकार को नोटिस जारी किया था।
दारा सिंह ने कहा कि वह कर्म दर्शन में विश्वास रखता है और अपने बुरे कर्मों के प्रभाव को कम करने के लिए उसने अपने चरित्र में सुधार करने के लिए एक अवसर की प्रार्थना की है। वकील विष्णु शंकर जैन के माध्यम से दायर अपनी याचिका में दारा सिंह ने कहा कि उसने 24 साल से अधिक समय जेल में बिताया है और युवावस्था में क्रोध में उठाए गए अपने कदम के परिणामों के लिए उसे पश्चाताप है।
सरिस्का बाघ अभयारण्य के पास अवैध खनन पर नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि वह सरिस्का बाघ अभयारण्य के एक किलोमीटर के दायरे में अवैध खनन की शिकायतों से निपटने के लिए अलवर जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करे। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने उन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया, जिनमें दावा किया गया था कि शीर्ष अदालत के अवैध खनन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद बाघ अभयारण्य के एक किलोमीटर के दायरे में ऐसी गतिविधियां जारी हैं।
राजस्थान सरकार ने आरोपों से इन्कार करते हुए कहा कि ऐसी किसी भी अवैध गतिविधि को रोकने के लिए राजमार्गों पर रात में भी अधिकारी निरीक्षण करते हैं। न्याय मित्र एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के परमेश्वर ने कहा कि शिकायतों से निपटने के लिए राज्य द्वारा एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति किया जाना बेहतर तरीका होगा। जिसके बाद पीठ ने कहा, हम राजस्थान सरकार को अलवर के जिला खनन अधिकारी के कार्यालय में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश देते हैं। पीठ ने कहा कि शिकायत प्राप्त होने पर नोडल अधिकारी दो सप्ताह के भीतर निर्णय लेंगे। अदालत ने आवेदनों का निपटारा करते हुए कहा कि यदि ऐसी शिकायत पर विचार नहीं किया जाता है तो पीड़ित व्यक्ति संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।
वकीलों को वरिष्ठ पदनाम देने की प्रक्रिया पर पुनर्विचार की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने शीर्ष अदालत की विशेष पीठ के समक्ष कहा कि वकीलों को वरिष्ठ पदनाम देने यानी वरिष्ठ अधिवक्ता नामित करने की प्रक्रिया पर 2017 के फैसले पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट प्रशासन की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने जस्टिस एएस ओका, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एसवीएन भट्टी की विशेष पीठ के समक्ष दलीलें रखीं। पीठ वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की याचिका पर दो फैसलों में उल्लिखित वरिष्ठ पदनाम प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
मेहता ने कहा कि जिस न्यायालय में कोई अधिवक्ता प्रैक्टिस कर रहा है, उसे ही उसे वरिष्ठ घोषित करना चाहिए और ऐसी कोई भी व्यवस्था, जिसमें कोई न्यायाधीश किसी निश्चित वकील को वरिष्ठ घोषित करने की सिफारिश करता है, उसे रोका जाना चाहिए। सुनवाई 20 मार्च को जारी रहेगी।
शीर्ष अदालत ने पहले इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक पक्ष के साथ-साथ सभी हाईकोर्ट से जवाब मांगा था। वरिष्ठ पदनाम प्रदान करने की वर्तमान प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट की ओर से इंदिरा जयसिंह बनाम सर्वोच्च न्यायालय के मामले में शीर्ष न्यायालय के 2017 के निर्णय के अनुसरण में लागू की गई थी।
पहला फैसला पूर्व न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 12 अक्टूबर, 2017 को सुनाया था। इसने वकीलों को वरिष्ठ पदनाम देने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्थायी समिति गठित करने सहित कई दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके बाद दूसरा फैसला आया और अब पीठ यह तय करेगी कि पिछले निर्देशों में बदलाव की जरूरत है या नहीं।
एसआरईआई समूह की ‘धोखाधड़ी’ की जांच वाली मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से पूछा रुख
सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता स्थित एसआरईआई समूह की वित्तीय धोखाधड़ी के मामले में जांच की मांग वाली याचिका पर सीबीआई का रुख पूछा। सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना व जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने लखनऊ स्थित याचिकाकर्ता भूपेंद्र नाथ के वकील प्रशांत भूषण की दलीलों पर गौर किया। उन्होंने समूह में वित्तीय अनियमितताओं की सीबीआई और ईडी से व्यापक जांच की मांग की।
याचिकाकर्ता ने एसआरईआई समूह पर एक निजी ट्रस्ट के माध्यम से धन की राउंड-ट्रिपिंग और विभिन्न बैंकों से उधार लिए गए सार्वजनिक धन की हेराफेरी से जुड़े धोखाधड़ी का आरोप लगाया। याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 18 मार्च 2024 के आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत उसने समूह के खिलाफ जांच बंद करने संबंधी आर्थिक अपराध शाखा, वाराणसी की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था। पीठ ने ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू की दलील पर गौर किया कि वह सीबीआई का भी प्रतिनिधित्व करेंगे और वर्तमान मामले में जांच के संबंध में केंद्रीय जांच एजेंसी से निर्देश मांगेंगे। जब भूषण ने कहा कि बड़े बैंकिंग और वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े मामले की जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए, तो सीजेआई ने कहा, कानून के अनुसार निर्णय लेना उनका (सीबीआई) काम है। आरोप लगाया गया कि इसमें कई हजार करोड़ रुपये की राशि शामिल है। भूषण ने धोखाधड़ी पर आरबीआई के निर्देशों का हवाला दिया और कहा कि 500 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी के मामले सीबीआई को भेजे जाने चाहिए। याचिकाकर्ता ने भी 7,000 रुपये दिए थे और उसने इनके खिलाफ जांच की मांग की। याचिकाकर्ता ने सीबीआई, ईडी के अलावा, उत्तर प्रदेश, उसके पुलिस महानिदेशक और जौनपुर के पुलिस अधीक्षक को भी पक्ष बनाया गया।
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