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SC Updates: अनुकंपा नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, मां के खिलाफ हत्या की कार्यवाही का बेटे पर असर नहीं

Thu, 11 Jun 2026 09:38 PM IST
Rahul Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: Rahul Kumar Updated Thu, 11 Jun 2026 09:38 PM IST
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Supreme court news updates compassionate appointment Haryana
सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स - फोटो : अमर उजाला ग्रापिक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मृत कर्मचारी की विधवा के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही का इस्तेमाल उनके बेटे की अनुकंपा नियुक्ति की मांग को खारिज करने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसके लिए हरियाणा सरकार के नियमों का हवाला दिया। इसके साथ ही जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अतुल चौहान की अपील को मंजूरी दे दी। अतुल की अनुकंपा नियुक्ति की मांग को तब खारिज कर दिया गया था जब उनकी मां पर हरियाणा में सरकारी बेसिक स्कूल टीचर रहे उनके पिता की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा।

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शीर्ष अदालत ने कहा, प्रतिवादी (सरकार) के लिए अपीलकर्ता की अनुकंपा नियुक्ति की मांग पर उसके गुण-दोष के आधार पर विचार करने और निर्णय लेने में कोई कानूनी बाधा नहीं है, बशर्ते यह 2019 के नियमों के तहत निर्धारित पात्रता शर्तों और आवश्यकताओं के अनुसार हो। अदालत ने कहा कि ऐसी कार्यवाही के दौरान लाभों को निलंबित करने वाला हरियाणा का नियम केवल वित्तीय सहायता पर लागू होता है, नियुक्तियों पर नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अतुल चौहान के मामले में हरियाणा सिविल सेवा (दया के आधार पर आर्थिक सहायता या नियुक्ति) नियम, 2019 के नियम 23(1) को लागू करने को सही ठहराया गया था। साथ ही, कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर मामले के गुण-दोष के आधार पर उसकी चौहान की अर्जी पर विचार करें।
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अतुल के पिता, गजेंद्र सिंह चौहान की सितंबर, 2021 में एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। बाद में गजेंद्र की पत्नी, पुष्पा देवी पर उनकी हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया गया। हालांकि, अक्तूबर, 2024 में एक ट्रायल कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए उन्हें बरी कर दिया था, लेकिन उनके बरी होने के फैसले के खिलाफ अपील अब भी लंबित है।

अधिकारियों ने नियम 23(1) का हवाला देते हुए दया के आधार पर नियुक्ति के लिए अतुल की अर्जी पर कार्रवाई करने से इन्कार कर दिया था। इस नियम के तहत, अगर परिवार का कोई सदस्य मृतक कर्मचारी की हत्या या हत्या के लिए उकसाने का आरोपी हो, तो दया के आधार पर मिलने वाली आर्थिक सहायता रोक दी जाती है।

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हादसे में लकवाग्रस्त हुए व्यक्ति को 25 लाख रुपये मुआवजे का सुप्रीम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने 19 साल पहले बंगलूरू में ऑटो-रिक्शा पर पेड़ की शाखा गिरने के हादसे में लकवाग्रस्त हुए व्यक्ति को बड़ी राहत देते हुए 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में, मोटर वाहन अधिनियम (एमवीए) की धारा 166 के तहत मुआवजे का दावा, खासकर नगर निकाय के खिलाफ दायर नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान सड़क दुर्घटना के पीड़ितों या उनके कानूनी प्रतिनिधियों को दोषी चालक या मालिक की गलती या लापरवाही साबित करके मुआवजे का दावा करने की अनुमति देता है।

जस्टिस संजय करोल व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 2007 से लकवाग्रस्त व्यक्ति के लिए मुआवजे की रकम 17.10 लाख रुपये से बढ़ाकर 25 लाख रुपये (साथ में ब्याज) कर दी। पीठ ने कहा, जिस व्यक्ति को ऐसी गंभीर चोटें आई हों जिनसे उसका जीवन ही बदल गया हो, उसे बेसहारा छोड़ देना न्याय की भावना के अनुरूप नहीं है। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट से पहले दिया गया मुआवजा अपर्याप्त था। यह मामला 23 जून, 2007 का है, जब केके उमेश कुमार बंगलूरू में ऑटोरिक्शा में जा रहे थे। भारी बारिश के कारण, गाड़ी चिन्नास्वामी स्टेडियम के पास एक पुराने पेड़ के नीचे रुक गई। एक बड़ी टहनी टूटकर गाड़ी को कुचल गई, जिससे कुमार की रीढ़ की हड्डी में ऐसी चोटें आईं जिससे उनकी जिंदगी बदल गई। उन्हें पूरी तरह लकवा मार गया।

अभिनेत्री जैकलीन की याचिका पर सुनवाई से अलग हुए जस्टिस प्रशांत

 सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने 200 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडिस की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है। अब इस मामले की सुनवाई 25 जून को किसी अन्य पीठ के सामने होगी। जस्टिस मिश्रा और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ के समक्ष सुनवाई शुरू होते ही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि वह प्रवर्तन निदेशालय की ओर से पेश हो रहे हैं। इसके बाद जस्टिस मिश्रा ने कहा कि एक संबंधित मामले में उनके बेटे सरकार की ओर से पेश हुए थे, इसलिए वह इस मामले की सुनवाई नहीं करेंगे। 

जैकलीन ने दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट के 30 मई के आदेश को चुनौती दी है। ट्रायल कोर्ट ने ईडी की जांच के आधार पर उनके और ठग सुकेश के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया था। अदालत ने माना था कि पहली नजर में जैकलीन ने सुकेश से महंगे उपहार लिए, जबकि उन्हें उसके आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी थी।

अदालत ने यह भी कहा था कि वह कथित अपराध से अर्जित धन को छिपाने में उसकी मदद कर रही थीं। 3 जून को जैकलीन, सुकेश और अन्य आरोपियों के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय किए गए, जिसके बाद मामले की सुनवाई शुरू हुई है। सुकेश और उसकी पत्नी को सितंबर 2021 में गिरफ्तार किया गया था और वे फिलहाल न्यायिक हिरासत में है।

बच्चों को सिर्फ सबूत जुटाने का जरिया नहीं माना जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को अपने एक अहम फैसले में कहा कि बच्चों को महज साक्ष्य की वस्तु नहीं माना जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि माता-पिता के बीच चल रहे हिरासत, मुलाकात या अभिभावकीय पहुंच संबंधी विवादों में बच्चों की मनोवैज्ञानिक या मनोरोग संबंधी जांच नियमित रूप से नहीं कराई जानी चाहिए। इस तरह के मामलों में बच्चे के कल्याण, भावनात्मक सुरक्षा, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने ऐसे मामलों से निपटने के लिए कई दिशा-निर्देश जारी किए। शीर्ष अदालत ने यह फैसला बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश में संशोधन करते हुए दिया, जिसमें एक नाबालिग लड़की के मूल्यांकन के लिए चार सदस्यीय विशेषज्ञ पैनल गठित करने की अनुमति दी गई थी। लड़की के पिता पर पॉक्सो कानून के तहत यौन शोषण के आरोप हैं।

जस्टिस सिंह ने दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला का उद्धरण देते हुए कहा, किसी समाज की आत्मा का सबसे बड़ा परिचय इस बात से मिलता है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अदालत ने कहा कि केवल इसलिए मनोवैज्ञानिक जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता, क्योंकि माता-पिता के बीच हिरासत या मुलाकात का विवाद चल रहा है। जांच से पहले कोर्ट को यह स्पष्ट करना होगा कि इसकी आवश्यकता क्यों है, इसका उद्देश्य क्या है और कम हस्तक्षेप वाले विकल्प पर्याप्त क्यों नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाल पीड़ितों के साथ मनोवैज्ञानिक संवाद के दौरान न्यूनतम हस्तक्षेप और न्यूनतम संपर्क का सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए। बार-बार या कई स्तरों पर मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन से बचना चाहिए, जब तक कि इसके लिए विशेष और ठोस कारण मौजूद न हों।


यह मामला एक दंपती के विवाद से जुड़ा है। महिला ने आरोप लगाया था कि 2018-19 के दौरान अमेरिका में रहने के समय उसके पति ने अपनी बच्ची का यौन शोषण किया था। भारत लौटने के बाद पिता के खिलाफ पॉक्सो के तहत मामला दर्ज किया गया था।
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