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सुप्रीम कोर्ट: दूसरी बार अटार्नी जनरल ने हाईकोर्ट के अपराध पक्ष के आदेश को चुनौती दी, जानिए क्या है मामला
Thu, 18 Nov 2021 09:38 PM IST
अभिषेक दीक्षित
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Thu, 18 Nov 2021 09:38 PM IST
सार
जस्टिस एस रविंद्र भट ने स्पष्ट किया कि 1985 में तब के अटार्नी जनरल ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। उस फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को सार्वजनिक रूप से देने का आदेश दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पॉस्को कानून के तहत स्किन टु स्किन टच के बॉम्बे हाईकोर्ट के बहुचर्चित फैसले को देश के अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। अटार्नी जनरल ने अपनी अपील याचिका में कहा था कि विवादास्पद फैसला खतरनाक और क्रूर उदाहरण पेश करेगा और इसे पलटने की जरूरत है। बृहस्पतिवार को इस फैसले को पलटने के बाद जस्टिस यूयू ललित ने कहा, शायद यह पहला मौका है, जब किसी हाईकोर्ट के अपराध पक्ष के फैसले को देश के अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
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इस पर जस्टिस एस रविंद्र भट ने स्पष्ट किया कि 1985 में तब के अटार्नी जनरल ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। उस फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को सार्वजनिक रूप से देने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि फांसी जयपुर के स्टेडियम में या रामलीला मैदान में सार्वजनिक रूप से दी जाए और फांसी के दिन, समय और जगह का मीडिया के जरिये व्यापक प्रचार किया जाए।
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इस फैसले को अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक रूप से फांसी की सजा देना बर्बर कृत्य है और संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, बिना शक, आरोपी को जिस अपराध में दोषी पाया गया है वो बर्बर है और किसी भी सभ्य समाज पर धब्बा है जिसे कोई समाज सहन नहीं कर सकता लेकिन बर्बर अपराध की सजा सार्वजनिक फांसी जैसी बर्बर नहीं हो सकती।
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