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SC: विशेष विवाह अधिनियम को खारिज किया तो देश आजादी के पहले के दौर में पहुंच जाएगा, अदालत की अहम टिप्पणी
Wed, 18 Oct 2023 06:55 AM IST
जलज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: जलज मिश्रा
Updated Wed, 18 Oct 2023 06:55 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था कि विवाह एक सामाजिक-कानूनी संस्था है। संविधान के अनुसार इसके बारे में सिर्फ विधायिका ही कानून बना सकती है। अदालत न विवाह संस्था बना सकती है, न ही विवाह की कोई कानूनी परिभाषा देकर या किसी कानून में बदलाव करके इन्हें मान्यता दे सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दिलवाने के लिए याचीगण विशेष विवाह अधिनियम को सबसे बड़ा रोड़ा मान रहे थे, इसे रद्द करवाना चाहते थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस हठ को नकारते हुए कहा कि ऐसा किया तो देश आजादी के पहले के समय में पहुंच जाएगा, जब यह कानून नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ऐसी कई अहम बातें कही हैं। पढ़िए इस मामले से जुड़े विभिन्न पहलू व तथ्य और सुप्रीम फैसले में दिए गए कुछ रोचक निष्कर्ष...
याचिकाकर्ताओं ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955, विशेष विवाह अधिनियम 1954 और विदेशी विवाह अधिनियम 1969 समेत कई कानूनों को चुनौती देते हुए कहा कि इनमें विवाह विपरीत-लिंग (पुरुष-महिला) के बीच ही माना गया है। समलैंगिक विवाह को कानूनन विवाह की परिभाषा में नहीं रखा गया। ऐसे कानून समलैंगिकों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं। विशेष विवाह अधिनियम रद्द करने की मांग की गई थी। कहना था कि इनकी वजह से समलैंगिकों को टैक्स राहत, बच्चे गोद लेने के कानून, विरासत से जुड़े कानूनों आदि में विवाह के परिणामस्वरूप मिलने वाले फायदों से महरूम होना पड़ रहा है। जबकि यही फायदे विपरीत-लिंग विवाह करने वालों को स्वत: मिल जाते हैं।
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कोर्ट कानून बनाने वाले विषय न ही सुने
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था कि विवाह एक सामाजिक-कानूनी संस्था है। संविधान के अनुसार इसके बारे में सिर्फ विधायिका ही कानून बना सकती है। अदालत न विवाह संस्था बना सकती है, न ही विवाह की कोई कानूनी परिभाषा देकर या किसी कानून में बदलाव करके इन्हें मान्यता दे सकती है। अदालतों का ऐसे मामलों में निर्णय करने का क्षेत्राधिकार ही नहीं बनता, यह पूरी तरह कानून बनाने का मामला है। वैसे भी केंद्र द्वारा कानून बनाकर समलैंगिकों को कई अधिकार दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ के पांचों जजों ने एकमत से कहा कि विवाह एक बुनियादी अधिकार नहीं है। विशेष विवाह अधिनियम में इसे परिभाषित कर
हम कानून नहीं बनाते, उसके लिए विधायिका है : याचीगण की मांग पर यह भी साफ किया कि अगर अदालत विशेष विवाह अधिनियम में नए शब्द डालने की कोशिश करती है, तो वह कानून बनाने वाली विधायिका की भूमिका में आ जाएगी, उसके लिए ऐसा करना संभव नहीं है। कानून बनाना संसद का काम है, वही निर्णय कर सकती है कि विशेष विवाह अधिनियम में किसी तरह के बदलाव की जरूरत है भी या नहीं। याचीगण जो अधिकार चाहते हैं और वे जो निवेदन कर रहे हैं, उसे एक न्यायिक आदेश से पूरा नहीं किया जा सकता। इन्हें कानून के तहत ही एक ढांचा बनाकर प्रदान किया जा सकता है।
केंद्र की समिति अधिकारों पर विचार कर रही : कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार समिति बनाकर समलैंगिक संबंधों व विवाहों से जुड़े अधिकारों पर काम कर रही है। वह समलैंगिक कपल्स के लिए परिवार राशन कार्ड बनाने, संयुक्त बैंक खाते में एक-दूसरे को नामांकित करने, पेंशन व ग्रेच्युटी से जुड़े अधिकार पाने आदि मामलों पर भी विचार कर रही है।
समलैंगिकता सिर्फ शहरी या कुलीन अवधारणा नहीं : सीजेआई चंद्रचूड़
सीजेआई जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में केंद्र के इस तर्क से असहमति जताई कि यह पूरा मामला कुछ शहरी कुलीन वर्ग का उठाया हुआ है। सीजेआई ने कहा, समलैंगिकता सिर्फ शहरी या कुलीन अवधारणा नहीं है। गांवों, इलाकों या अर्ध-शहरी शहरों के लोग भी समलैंगिक हो सकते हैं। लोग जाति और आर्थिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना भी समलैंगिक हो सकते हैं। महानगर में सफेदपोश नौकरी करने वाला अंग्रेजीदां व्यक्ति ही समलैंगिक होने का दावा नहीं कर सकता बल्कि खेतों में काम करने वाली महिला भी ऐसी हो सकती है। सीजेआई ने अपने फैसले में उल्लेख किया है कि मामले में कुछ याचिकाकर्ता ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों से हैं। इसमें दुर्गापुर, वाराणसी, मुक्तसर (पंजाब), वडोदरा से याचिकाकर्ता हैं।
साझेदारी और प्यार देने वाले संघ के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए : जस्टिस कौल
समलैंगिक शादी पर जस्टिस संजय किशन कौल ने सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के फैसले से सहमति जताई और कहा कि समलैंगिक समूहों को साझेदारी और प्यार देने वाले संघ के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। अपने फैसले में उन्होंने कहा कि विशेष विवाह अधिनियम भेदभावपूर्ण होने के कारण, संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। हालांकि सीजेआई द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण के समान जस्टिस कौल ने भी माना कि विशेष विवाह अधिनियम में समलैंगिक संघों को शामिल करने में अदालत की सीमाएं हैं क्योंकि इस पर निर्णय संसद को लेना है। जस्टिस कौल ने यह भी कहा है कि जहां तक मान्यता और परिणामी लाभ की बात है गैर-विषमलैंगिक संबंध और विषमलैंगिक विवाह को एक ही सिक्के का दो पहलू माना जाना चाहिए।
समलैंगिक जोड़े ऐसे संबंध रखने के हकदार लेकिन कोई कानूनी दर्जा नहीं : जस्टिस भट
जस्टिस रविंद्र एस भट ने अलग से लिखे अपने फैसले में कहा कि कानून और रीति-रिवाजों द्वारा मान्यता प्राप्त विवाह को छोड़कर विवाह का कोई अनक्वालिफाइड (बिना शर्त) अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा है कि विवाह जैसे सामाजिक बंधन के अधिकार की कानूनी मान्यता या रिश्ते को दर्जा प्रदान करने का अधिकार केवल अधिनियमित कानून के माध्यम से ही मिल सकता है।
अदालत ऐसे नियामक ढांचे के निर्माण का आदेश या निर्देश नहीं दे सकती जिसके परिणामस्वरूप ऐसी कानूनी स्थिति उत्पन्न हो। जस्टिस भट ने कहा, इसका मतलब यह नहीं है कि समलैंगिक व्यक्तियों को सामाजिक दायरे में किसी भी तरह एक-दूसरे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का आनंद उठाने से प्रतिबंधित किया गया है। समलैंगिक जोड़े ऐसे संबंध रखने के हकदार हैं लेकिन उन्हें कोई कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं है। समलैंगिक जोड़ों को मिलन या रिश्ते का अधिकार है, चाहे वह मानसिक, भावनात्मक या यौन हो, जिसमें निजता का अधिकार, पसंद का अधिकार और स्वायत्तता का अधिकार शामिल है।
जोड़ों को कानूनी योजनाओं से बाहर रखने की समीक्षा की जाए : जस्टिस नरसिम्हा
समलैंगिक विवाह पर दिए फैसले में जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने जस्टिस रविंद्र भट से सहमति जताते हुए कहा, शादी का कोई अनक्वालिफाइड अधिकार मौजूद नहीं है और यह एक वैधानिक अधिकार है जो एक प्रथा से उत्पन्न होता है। उन्होंने कहा, विवाह को प्रतिबिंबित करने वाले सामाजिक गठबंधन के अधिकार को मान्यता देना सांविधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं होगा। जस्टिस नरसिम्हा ने यह भी कहा कि समलैंगिक जोड़ों को पेंशन, पीएफ, ग्रेच्युटी, बीमा आदि से बाहर रखने वाली विधायी योजनाओं की समीक्षा करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस मामले में विधायी ढांचे के प्रभाव की समीक्षा के लिए विचार-विमर्श की जरूरत है। इसके लिए, विधायिका को ऐसा करने का काम सौंपा गया है।
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा है कि सामाजिक गठबंधन का अधिकार या कानूनी रूप से इसे लागू करने योग्य स्थिति प्रदान करने वाले स्थायी सहवास संबंधी संबंध को भारत के संविधान के भाग तीन (मौलिक अधिकारों) के भीतर नहीं रखा जा सकता है।
आदिश अग्रवाल, अध्यक्ष, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बार एसोसिएशन स्वागत करती है। कानून बनाना संसद का काम है। मुझे खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस दलील को स्वीकार किया कि अदालत के पास समलैंगिक विवाह को मंजूरी देने की कोई शक्ति नहीं है। यह भारतीय संसद का एकमात्र अधिकार है।
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याचिकाकर्ताओं ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955, विशेष विवाह अधिनियम 1954 और विदेशी विवाह अधिनियम 1969 समेत कई कानूनों को चुनौती देते हुए कहा कि इनमें विवाह विपरीत-लिंग (पुरुष-महिला) के बीच ही माना गया है। समलैंगिक विवाह को कानूनन विवाह की परिभाषा में नहीं रखा गया। ऐसे कानून समलैंगिकों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं। विशेष विवाह अधिनियम रद्द करने की मांग की गई थी। कहना था कि इनकी वजह से समलैंगिकों को टैक्स राहत, बच्चे गोद लेने के कानून, विरासत से जुड़े कानूनों आदि में विवाह के परिणामस्वरूप मिलने वाले फायदों से महरूम होना पड़ रहा है। जबकि यही फायदे विपरीत-लिंग विवाह करने वालों को स्वत: मिल जाते हैं।
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कोर्ट कानून बनाने वाले विषय न ही सुने
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था कि विवाह एक सामाजिक-कानूनी संस्था है। संविधान के अनुसार इसके बारे में सिर्फ विधायिका ही कानून बना सकती है। अदालत न विवाह संस्था बना सकती है, न ही विवाह की कोई कानूनी परिभाषा देकर या किसी कानून में बदलाव करके इन्हें मान्यता दे सकती है। अदालतों का ऐसे मामलों में निर्णय करने का क्षेत्राधिकार ही नहीं बनता, यह पूरी तरह कानून बनाने का मामला है। वैसे भी केंद्र द्वारा कानून बनाकर समलैंगिकों को कई अधिकार दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ के पांचों जजों ने एकमत से कहा कि विवाह एक बुनियादी अधिकार नहीं है। विशेष विवाह अधिनियम में इसे परिभाषित कर
हम कानून नहीं बनाते, उसके लिए विधायिका है : याचीगण की मांग पर यह भी साफ किया कि अगर अदालत विशेष विवाह अधिनियम में नए शब्द डालने की कोशिश करती है, तो वह कानून बनाने वाली विधायिका की भूमिका में आ जाएगी, उसके लिए ऐसा करना संभव नहीं है। कानून बनाना संसद का काम है, वही निर्णय कर सकती है कि विशेष विवाह अधिनियम में किसी तरह के बदलाव की जरूरत है भी या नहीं। याचीगण जो अधिकार चाहते हैं और वे जो निवेदन कर रहे हैं, उसे एक न्यायिक आदेश से पूरा नहीं किया जा सकता। इन्हें कानून के तहत ही एक ढांचा बनाकर प्रदान किया जा सकता है।
केंद्र की समिति अधिकारों पर विचार कर रही : कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार समिति बनाकर समलैंगिक संबंधों व विवाहों से जुड़े अधिकारों पर काम कर रही है। वह समलैंगिक कपल्स के लिए परिवार राशन कार्ड बनाने, संयुक्त बैंक खाते में एक-दूसरे को नामांकित करने, पेंशन व ग्रेच्युटी से जुड़े अधिकार पाने आदि मामलों पर भी विचार कर रही है।
समलैंगिकता सिर्फ शहरी या कुलीन अवधारणा नहीं : सीजेआई चंद्रचूड़
सीजेआई जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में केंद्र के इस तर्क से असहमति जताई कि यह पूरा मामला कुछ शहरी कुलीन वर्ग का उठाया हुआ है। सीजेआई ने कहा, समलैंगिकता सिर्फ शहरी या कुलीन अवधारणा नहीं है। गांवों, इलाकों या अर्ध-शहरी शहरों के लोग भी समलैंगिक हो सकते हैं। लोग जाति और आर्थिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना भी समलैंगिक हो सकते हैं। महानगर में सफेदपोश नौकरी करने वाला अंग्रेजीदां व्यक्ति ही समलैंगिक होने का दावा नहीं कर सकता बल्कि खेतों में काम करने वाली महिला भी ऐसी हो सकती है। सीजेआई ने अपने फैसले में उल्लेख किया है कि मामले में कुछ याचिकाकर्ता ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों से हैं। इसमें दुर्गापुर, वाराणसी, मुक्तसर (पंजाब), वडोदरा से याचिकाकर्ता हैं।
साझेदारी और प्यार देने वाले संघ के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए : जस्टिस कौल
समलैंगिक शादी पर जस्टिस संजय किशन कौल ने सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के फैसले से सहमति जताई और कहा कि समलैंगिक समूहों को साझेदारी और प्यार देने वाले संघ के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। अपने फैसले में उन्होंने कहा कि विशेष विवाह अधिनियम भेदभावपूर्ण होने के कारण, संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। हालांकि सीजेआई द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण के समान जस्टिस कौल ने भी माना कि विशेष विवाह अधिनियम में समलैंगिक संघों को शामिल करने में अदालत की सीमाएं हैं क्योंकि इस पर निर्णय संसद को लेना है। जस्टिस कौल ने यह भी कहा है कि जहां तक मान्यता और परिणामी लाभ की बात है गैर-विषमलैंगिक संबंध और विषमलैंगिक विवाह को एक ही सिक्के का दो पहलू माना जाना चाहिए।
समलैंगिक जोड़े ऐसे संबंध रखने के हकदार लेकिन कोई कानूनी दर्जा नहीं : जस्टिस भट
जस्टिस रविंद्र एस भट ने अलग से लिखे अपने फैसले में कहा कि कानून और रीति-रिवाजों द्वारा मान्यता प्राप्त विवाह को छोड़कर विवाह का कोई अनक्वालिफाइड (बिना शर्त) अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा है कि विवाह जैसे सामाजिक बंधन के अधिकार की कानूनी मान्यता या रिश्ते को दर्जा प्रदान करने का अधिकार केवल अधिनियमित कानून के माध्यम से ही मिल सकता है।
अदालत ऐसे नियामक ढांचे के निर्माण का आदेश या निर्देश नहीं दे सकती जिसके परिणामस्वरूप ऐसी कानूनी स्थिति उत्पन्न हो। जस्टिस भट ने कहा, इसका मतलब यह नहीं है कि समलैंगिक व्यक्तियों को सामाजिक दायरे में किसी भी तरह एक-दूसरे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का आनंद उठाने से प्रतिबंधित किया गया है। समलैंगिक जोड़े ऐसे संबंध रखने के हकदार हैं लेकिन उन्हें कोई कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं है। समलैंगिक जोड़ों को मिलन या रिश्ते का अधिकार है, चाहे वह मानसिक, भावनात्मक या यौन हो, जिसमें निजता का अधिकार, पसंद का अधिकार और स्वायत्तता का अधिकार शामिल है।
जोड़ों को कानूनी योजनाओं से बाहर रखने की समीक्षा की जाए : जस्टिस नरसिम्हा
समलैंगिक विवाह पर दिए फैसले में जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने जस्टिस रविंद्र भट से सहमति जताते हुए कहा, शादी का कोई अनक्वालिफाइड अधिकार मौजूद नहीं है और यह एक वैधानिक अधिकार है जो एक प्रथा से उत्पन्न होता है। उन्होंने कहा, विवाह को प्रतिबिंबित करने वाले सामाजिक गठबंधन के अधिकार को मान्यता देना सांविधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं होगा। जस्टिस नरसिम्हा ने यह भी कहा कि समलैंगिक जोड़ों को पेंशन, पीएफ, ग्रेच्युटी, बीमा आदि से बाहर रखने वाली विधायी योजनाओं की समीक्षा करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस मामले में विधायी ढांचे के प्रभाव की समीक्षा के लिए विचार-विमर्श की जरूरत है। इसके लिए, विधायिका को ऐसा करने का काम सौंपा गया है।
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा है कि सामाजिक गठबंधन का अधिकार या कानूनी रूप से इसे लागू करने योग्य स्थिति प्रदान करने वाले स्थायी सहवास संबंधी संबंध को भारत के संविधान के भाग तीन (मौलिक अधिकारों) के भीतर नहीं रखा जा सकता है।
आदिश अग्रवाल, अध्यक्ष, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बार एसोसिएशन स्वागत करती है। कानून बनाना संसद का काम है। मुझे खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस दलील को स्वीकार किया कि अदालत के पास समलैंगिक विवाह को मंजूरी देने की कोई शक्ति नहीं है। यह भारतीय संसद का एकमात्र अधिकार है।