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SC: पॉक्सो अधिनियम लिंग-निरपेक्ष या नहीं, शीर्ष कोर्ट करेगा परीक्षण; आरोपी के खिलाफ मुकदमे पर रोक
Sun, 26 Oct 2025 06:41 AM IST
लव गौर
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: लव गौर
Updated Sun, 26 Oct 2025 06:41 AM IST
सार
यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम लिंग-निरपेक्ष है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर परीक्षण करने का निर्णय लिया है। एक नाबालिग लड़के के यौन उत्पीड़न की आरोपी महिला की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
विस्तार
यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम लिंग-निरपेक्ष है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर परीक्षण करने का निर्णय लिया है। एक नाबालिग लड़के के यौन उत्पीड़न की आरोपी महिला की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। याचिका में महिला ने पॉक्सो अधिनियम, 2012 के प्रावधानों को महिला आरोपियों पर लागू होने को चुनौती दी है।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हशमत पाशा ने दलील दी कि पॉक्सो अधिनियम की धाराएं 3(1)(ए) से 3(1)(सी) लिंग-विशिष्ट हैं और याचिकाकर्ता के मामले पर लागू नहीं होतीं। इस दलील को दर्ज करते हुए पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करने का निर्णय लिया और ट्रायल कोर्ट में आगे की कार्यवाही को स्थगित कर दिया। धाराएं 3(1)(ए) से 3(1)(सी) बच्चों के विरुद्ध पेनिट्रेटिव यौन हमले को परिभाषित करती हैं और अपराधी को 'वह 'और 'उसका' सर्वनामों का उपयोग करके संदर्भित करती हैं।
याचिका में कर्नाटक हाईकोर्ट के 18 अगस्त, 2025 के फैसले को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने महिला के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इन्कार कर दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि पॉक्सो अधिनियम लिंग-तटस्थ है और धारा 4 और 6 के तहत अपराध एक महिला के खिलाफ आरोपित किए जा सकते हैं।
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13 साल के किशोर का पड़ोसी महिला ने किया था उत्पीड़न
यह मामला लड़के के माता-पिता की शिकायत से उत्पन्न हुआ है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 48 वर्षीय पड़ोसी महिला ने फरवरी और जून 2020 के बीच उनके 13 वर्षीय बेटे का यौन उत्पीड़न किया था, जब वह आर्ट की पढ़ाई के लिए उसके घर गया था। जांच के बाद पॉक्सो अधिनियम की धारा 4 (पेनिट्रेटिव यौन हमला) और धारा 6 (पेनिट्रेटिव यौन हमले के लिए सजा) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए एक आरोप पत्र दायर किया गया, जिसके कारण अतिरिक्त सिटी सिविल और सत्र न्यायाधीश (बंगलूरू) के समक्ष एक आपराधिक मामला दर्ज किया गया।
हाईकोर्ट में अपनी याचिका में महिला ने तर्क दिया था कि उनके खिलाफ लगाए गए पॉक्सो अधिनियम के प्रावधान लिंग-विशिष्ट हैं और एक महिला आरोपी पर लागू नहीं हो सकते। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि अधिनियम लिंग के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी बच्चों की रक्षा करता है और इसके प्रावधान पुरुष और महिला अपराधियों पर समान रूप से लागू होते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा था-पॉक्सो लिंग तटस्थता पर आधारित
हाईकोर्ट ने कहा था, यह अधिनियम एक प्रगतिशील अधिनियम होने के नाते बचपन की पवित्रता की रक्षा के लिए है। यह लिंग तटस्थता पर आधारित है और इसका लाभकारी उद्देश्य लिंग के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी बच्चों की सुरक्षा करना है।
धारा 3 और 5, जो अधिनियम की धारा 4 और 6 के तहत अपराधों का आधार बनती हैं, हमले के विभिन्न रूपों को रेखांकित करती हैं। हालांकि कुछ प्रावधानों में लिंग-भेदक सर्वनाम का प्रयोग हो सकता है, अधिनियम की प्रस्तावना और उद्देश्य ऐसे प्रयोग को समावेशी बनाते हैं। इसलिए यह पुरुष और महिला दोनों को शामिल करता है।
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जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हशमत पाशा ने दलील दी कि पॉक्सो अधिनियम की धाराएं 3(1)(ए) से 3(1)(सी) लिंग-विशिष्ट हैं और याचिकाकर्ता के मामले पर लागू नहीं होतीं। इस दलील को दर्ज करते हुए पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करने का निर्णय लिया और ट्रायल कोर्ट में आगे की कार्यवाही को स्थगित कर दिया। धाराएं 3(1)(ए) से 3(1)(सी) बच्चों के विरुद्ध पेनिट्रेटिव यौन हमले को परिभाषित करती हैं और अपराधी को 'वह 'और 'उसका' सर्वनामों का उपयोग करके संदर्भित करती हैं।
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याचिका में कर्नाटक हाईकोर्ट के 18 अगस्त, 2025 के फैसले को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने महिला के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इन्कार कर दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि पॉक्सो अधिनियम लिंग-तटस्थ है और धारा 4 और 6 के तहत अपराध एक महिला के खिलाफ आरोपित किए जा सकते हैं।
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13 साल के किशोर का पड़ोसी महिला ने किया था उत्पीड़न
यह मामला लड़के के माता-पिता की शिकायत से उत्पन्न हुआ है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 48 वर्षीय पड़ोसी महिला ने फरवरी और जून 2020 के बीच उनके 13 वर्षीय बेटे का यौन उत्पीड़न किया था, जब वह आर्ट की पढ़ाई के लिए उसके घर गया था। जांच के बाद पॉक्सो अधिनियम की धारा 4 (पेनिट्रेटिव यौन हमला) और धारा 6 (पेनिट्रेटिव यौन हमले के लिए सजा) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए एक आरोप पत्र दायर किया गया, जिसके कारण अतिरिक्त सिटी सिविल और सत्र न्यायाधीश (बंगलूरू) के समक्ष एक आपराधिक मामला दर्ज किया गया।
हाईकोर्ट में अपनी याचिका में महिला ने तर्क दिया था कि उनके खिलाफ लगाए गए पॉक्सो अधिनियम के प्रावधान लिंग-विशिष्ट हैं और एक महिला आरोपी पर लागू नहीं हो सकते। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि अधिनियम लिंग के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी बच्चों की रक्षा करता है और इसके प्रावधान पुरुष और महिला अपराधियों पर समान रूप से लागू होते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा था-पॉक्सो लिंग तटस्थता पर आधारित
हाईकोर्ट ने कहा था, यह अधिनियम एक प्रगतिशील अधिनियम होने के नाते बचपन की पवित्रता की रक्षा के लिए है। यह लिंग तटस्थता पर आधारित है और इसका लाभकारी उद्देश्य लिंग के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी बच्चों की सुरक्षा करना है।
धारा 3 और 5, जो अधिनियम की धारा 4 और 6 के तहत अपराधों का आधार बनती हैं, हमले के विभिन्न रूपों को रेखांकित करती हैं। हालांकि कुछ प्रावधानों में लिंग-भेदक सर्वनाम का प्रयोग हो सकता है, अधिनियम की प्रस्तावना और उद्देश्य ऐसे प्रयोग को समावेशी बनाते हैं। इसलिए यह पुरुष और महिला दोनों को शामिल करता है।