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सुप्रीम कोर्ट: अनुदान पाना शिक्षा संस्थानों का मौलिक अधिकार नहीं, अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक में न करें भेद
Mon, 27 Sep 2021 09:12 PM IST
सुरेंद्र जोशी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Mon, 27 Sep 2021 09:12 PM IST
सार
यदि सरकार किसी संस्थान का अनुदान बंद करती है तो वह उसे अपना अधिकार मानकर चुनौती नहीं दे सकता।
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supreme court, सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ani
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा संस्थानों को दिए जाने वाले सरकारी अनुदान को लेकर सोमवार को अहम बातें कहीं। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि इन संस्थाओं का अनुदान पाने का मौलिक अधिकार नहीं है। सरकार इन संस्थाओं की सहायता का निर्णय करते वक्त वित्तीय बाधाओं और खामियों जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखे।
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शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि जब अनुदान प्राप्त संस्थाओं का मामला हो तो उसमें अल्पसंख्यक या गैर अल्पसंख्यक संस्थान का भेद नहीं किया जा सकता। जस्टिस एस. के. कौल और जस्टिस एमएम सुंद्रेश की पीठ ने कहा कि अनुदान पाना कोई मूलभूत अधिकार नहीं है। इस बारे में किसी निर्णय को चुनौती सीमित आधारों पर ही दी जा सकती है। इसलिए यदि किसी मामले में अनुदान वापस लेने का निर्णय किया जाता है तो भी कोई संस्थान इसे अपना अधिकार मानकर फैसले पर सवाल नहीं उठा सकता।
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सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि कोई संस्थान अनुदान नहीं लेना चाहता और इसके लिए जरूरी शर्तों का पालन नहीं करना चाहता है तो यह उस पर निर्भर करता है और वह अपने स्तर पर काम कर सकता है। इसके विपरीत एक संस्थान कभी यह नहीं कह सकता कि उसे उसकी शर्तों पर अनुदान दिया जाना चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उत्तर प्रदेश सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए की, जिसमें कहा गया है कि इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम, 1921 के तहत बनाया गया नियम 101 असंवैधानिक है। पीठ ने कहा कि एक नीतिगत निर्णय को जनहित में माना जाता है और एक बार किया गया ऐसा निर्णय चुनौती देने योग्य नहीं है, जब तक कि बहुत ज्यादा मनमानी न हो।