{"_id":"67a3ffa10e381a7f0903e0b5","slug":"supreme-court-employer-has-to-prove-only-preponderance-of-possibilities-calcutta-hc-2012-decision-set-aside-2025-02-06","type":"story","status":"publish","title_hn":"Supreme Court: सार्वजनिक नियोक्ता को केवल संभावनाओं की अधिकता साबित करनी होगी, 13 साल पुराना HC का फैसला पलटा","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Supreme Court: सार्वजनिक नियोक्ता को केवल संभावनाओं की अधिकता साबित करनी होगी, 13 साल पुराना HC का फैसला पलटा
Thu, 06 Feb 2025 05:47 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Thu, 06 Feb 2025 05:47 AM IST
सार
शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ के 2012 के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के पूर्व सहायक अभियंता (सिविल) प्रदीप कुमार बनर्जी की बर्खास्तगी को खारिज कर दिया गया था।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक नियोक्ताओं को अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान कदाचार सिद्ध करने और दोषी कर्मचारी को बर्खास्त करने के लिए सिर्फ संभावनाओं की अधिकता साबित करनी होगी। यह आपराधिक मुकदमों में आवश्यक ‘उचित संदेह से परे’ साबित करने की तुलना में कम कठोर मानक है।
विज्ञापन
शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ के 2012 के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के पूर्व सहायक अभियंता (सिविल) प्रदीप कुमार बनर्जी की बर्खास्तगी को खारिज कर दिया गया था। जस्टिस जेके माहेश्वरी व जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संबंधित आपराधिक मामले में बरी होने के बावजूद एएआई के एक पूर्व इंजीनियर की बर्खास्तगी को बरकरार रखा। पीठ ने एएआई के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि बनर्जी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई उचित थी। यह महत्वपूर्ण फैसला सार्वजनिक नियोक्ताओं के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है, जो अनुशासनात्मक कार्यवाही के तहत कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त कर सकते हैं, भले ही कर्मचारी परिणामी आपराधिक मामलों में बरी हो गए हों।
विज्ञापन
कानून के स्थापित सिद्धांत की जांच में हाईकोर्ट ने की गलती
जस्टिस मेहता ने 28 पन्ने के आदेश में कहा कि यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष पर मामले को उचित संदेह से परे साबित करना अधिक मुश्किल है। हालांकि, अनुशासनात्मक जांच में, विभाग पर भार सीमित है और उसे संभावनाओं की प्रबलता के सिद्धांत पर अपना मामला साबित करना जरूरी है। मौजूदा मामले में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने आपराधिक मुकदमे में आवश्यक सबूत के मानक को नियोक्ता की अनुशासनात्मक जांच की जगह रखने में गंभीर गलती की है।
विज्ञापन