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सुप्रीम कोर्ट: खारिज कर दी बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार की याचिका
Tue, 20 Jul 2021 04:13 AM IST
देव कश्यप
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: देव कश्यप
Updated Tue, 20 Jul 2021 04:13 AM IST
सार
- राज्य सरकारी अस्पतालों में गैर-कोविड रोगियों के इलाज के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा नहीं
- सरकार के पास बुनियादी ढांचा नहीं तो गैर-कोविड रोगी निजी अस्पतालों में जाने के लिए बाध्य
- शुल्क सीमा नियमन पर कानून बनाने या अधिसूचना जारी करने का सरकार के पास अधिकार नहीं
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Supreme Court
- फोटो : ANI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें गैर-कोविड रोगियों के लिए निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम द्वारा देय शुल्कों को विनियमित करने वाली महाराष्ट्र सरकार की अधिसूचना को रद्द कर दिया गया था। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने कहा कि वह उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करेगी क्योंकि राज्य सरकार ऐसी अधिसूचनाएं जारी नहीं कर सकती।
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महाराष्ट्र सरकार की पैरवी कर रहे वकील राहुल चिटनिस ने सुनवाई की शुरुआत में कहा कि राज्य ने उच्च न्यायालय के पिछले साल 23 अक्टूबर के उस आदेश के खिलाफ याचिका दायर की है, जिसमें गैर कोविड-19 मरीजों के उपचार के लिए शुल्क की सीमा तय करने संबंधी अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया गया था। पीठ ने कहा कि वह ऐसे समय में ऐसी अधिसूचनाएं जारी नहीं कर सकती, जब राज्य सरकार के पास सरकारी अस्पतालों में गैर-कोविड रोगियों के इलाज के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा नहीं है। पीठ ने कहा, ‘जब राज्य सरकार के पास बुनियादी ढांचा नहीं होगा तो गैर-कोविड रोगी निजी अस्पतालों में जाने के लिए बाध्य हैं। क्षमा करें, हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे।’
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पिछले साल 23 अक्तूबर को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने कहा था कि महाराष्ट्र सरकार के पास गैर कोविड-19 मरीजों के लिए निजी अस्पतालों एवं नर्सिंग होम की शुल्क सीमा के नियमन संबंधी कोई अधिसूचना जारी करने या कोई कानून बनाने का अधिकार नहीं है। अदालत ने गैर कोविड-19 मरीजों के उपचार के लिए निजी अस्पतालों एवं नर्सिंग होम पर लागू होने वाली राज्य सरकार की पिछले साल अप्रैल एवं मई में जारी दो अधिसूचनाएं खारिज कर दी थीं। अधिसूचनाओं के माध्यम से राज्य सरकार ने गैर-कोविड रोगियों का इलाज करते हुए निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के लिए एक शुल्क कार्ड निर्धारित किया था।
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अधिसूचनाओं में कहा गया था कि निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम को अपने 80 प्रतिशत बिस्तरों को कोविड-19 रोगियों के इलाज के लिए आरक्षित रखना होगा और शेष 20 प्रतिशत का उपयोग गैर कोविड-19 रोगियों के इलाज के लिए किया जा सकता है। अदालत ने आगे कहा था कि महामारी रोग अधिनियम, आपदा प्रबंधन अधिनियम और कोविड विनियम राज्य सरकार को निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में इलाज किए जा रहे गैर-कोविड रोगियों के संबंध में निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं देते हैं।
अधिसूचना के खिलाफ डॉ. अरोड़ा ने दायर की थी याचिका
बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह आदेश हॉस्पिटल्स एसोसिएशन ऑफ नागपुर और डॉ. प्रदीप अरोड़ा द्वारा अधिसूचना के खिलाफ दायर याचिकाओं पर पारित किया। याचिका में कहा गया था कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) के तहत किसी भी पेशे का अभ्यास करने के मौलिक अधिकार में गैर-कोविड रोगियों को प्रदान की जाने वाली चिकित्सा उपचार और संबद्ध सेवाओं की प्रकृति और गुणवत्ता के अनुसार उचित और आनुपातिक शुल्क लेने का अधिकार शामिल है।
याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क अनुचित रूप से कम हैं और गैर-कोविड रोगियों को ऐसी शुल्कों पर उपचार और सेवाएं प्रदान करने पर जोर देना उचित नहीं है। राज्य सरकार ने याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा था कि देश में कोविड-19 महामारी के कारण चिकित्सा आपात स्थिति बनी हुई है। उच्च न्यायालय ने सरकार की अधिसूचनाओं को किसी भी पेशे का अभ्यास करने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) के तहत याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों पर स्पष्ट रूप से अतिक्रमण करार दिया था।