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Preamble: संविधान से क्यों नहीं हटेंगे 'समाजवादी' व पंथनिरपेक्ष' शब्द, कितना अहम है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
Mon, 25 Nov 2024 06:36 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Mon, 25 Nov 2024 06:36 PM IST
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'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्दों को हटाने वाली याचिकाएं खारिज
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AMAR UJALA
विस्तार
देश की सर्वोच्च अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्दों को हटाने की मांग वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं। 42वें संविधान संशोधन के अनुसार प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्दों को शामिल करने को चुनौती दी गई थी। इन याचिकाओं को प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने सोमवार को खारिज कर दिया। इससे पहले सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पंथनिरपेक्षता पर अहम टिप्पणी की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि पंथनिरपेक्षता को हमेशा संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा माना जाता रहा है।आखिर संविधान की प्रस्तावना क्या है? इसमें क्या-क्या शामिल है और उनका महत्व क्या है? प्रस्तावना से पंथनिरपेक्ष और समाजवाद शब्द हटाने की मांग क्यों की गई थी? 42वां संविधान संशोधन क्या है? याचिकर्ताओं ने इसे लेकर क्या मांग की थी? सुप्रीम कोर्ट ने पंथनिरपेक्षता और समाजवाद को लेकर क्या क्या फैसला सुनाया है? आइये इन सभी बातों को समझते हैं…
पहले जानते हैं कि संविधान की प्रस्तावना क्या है?
भारतीय संविधान की 'प्रस्तावना' एक संक्षिप्त परिचयात्मक कथन है। प्रस्तावना किसी दस्तावेज के दर्शन और उद्देश्यों को बताती है। इसे 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा अपनाया गया था। इसके बाद 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ था।
दरअसल, 1946 में जवाहरलाल नेहरू ने संवैधानिक ढांचे का वर्णन करते हुए उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया था। 1947 (22 जनवरी) में इसे अपनाया गया। इसने भारत के संविधान को आकार दिया और इसका संशोधित रूप भारतीय संविधान की प्रस्तावना में परिलक्षित होता है।
पूरी प्रस्तावना कुछ इस प्रकार है….
हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता,
प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सब में,
व्यक्ति की गरिमा
और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली, बन्धुता
बढ़ाने के लिए,
दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
भारतीय संविधान की 'प्रस्तावना' एक संक्षिप्त परिचयात्मक कथन है। प्रस्तावना किसी दस्तावेज के दर्शन और उद्देश्यों को बताती है। इसे 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा अपनाया गया था। इसके बाद 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ था।
दरअसल, 1946 में जवाहरलाल नेहरू ने संवैधानिक ढांचे का वर्णन करते हुए उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया था। 1947 (22 जनवरी) में इसे अपनाया गया। इसने भारत के संविधान को आकार दिया और इसका संशोधित रूप भारतीय संविधान की प्रस्तावना में परिलक्षित होता है।
पूरी प्रस्तावना कुछ इस प्रकार है….
हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता,
प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सब में,
व्यक्ति की गरिमा
और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली, बन्धुता
बढ़ाने के लिए,
दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
भारत का संविधान
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अमर उजाला
प्रस्तावना में क्या-क्या शामिल है और इनका महत्व क्या है?
हमारे संविधान की प्रस्तावना कई घटकों से मिलकर बनी है। इसमें यह संकेत दिया गया है कि संविधान की सत्ता का स्रोत भारत की जनता के पास है। यह भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है। प्रस्तावना में लिखे गए उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता सुनिश्चित करने और राष्ट्र की एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए भाईचारे को बढ़ावा देने की बात करते हैं।
हमारे संविधान की प्रस्तावना कई घटकों से मिलकर बनी है। इसमें यह संकेत दिया गया है कि संविधान की सत्ता का स्रोत भारत की जनता के पास है। यह भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है। प्रस्तावना में लिखे गए उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता सुनिश्चित करने और राष्ट्र की एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए भाईचारे को बढ़ावा देने की बात करते हैं।
- हम, भारत के लोग: यह भारत के लोगों की परम संप्रभुता को दर्शाता है। संप्रभुता का अर्थ है देश किसी अन्य देश या बाहरी शक्ति के नियंत्रण के अधीन नहीं है।
- संप्रभु: इसका अर्थ है कि भारत की अपनी स्वतंत्र सत्ता है और इस पर किसी अन्य बाहरी शक्ति का प्रभुत्व नहीं है। देश में, विधायिका के पास कानून बनाने की शक्ति है जो कुछ सीमाओं के अधीन है।
- समाजवादी: इस शब्द का मतलब है लोकतांत्रिक तरीकों से समाजवादी लक्ष्यों की प्राप्ति। यह एक मिश्रित अर्थव्यवस्था में विश्वास रखता है जहां निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्र एक साथ रहते हैं। इसे 42वें संशोधन, 1976 द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया।
- पंथनिरपेक्ष: इस शब्द का अर्थ है कि भारत में सभी धर्मों को राज्य से समान सम्मान, संरक्षण और समर्थन मिलता है। इसे भी 42वें संविधान संशोधन द्वारा प्रस्तावना में शामिल किया गया।
- लोकतांत्रिक: इस शब्द का मतलब है कि भारत के संविधान का एक स्थापित स्वरूप है जो चुनाव में व्यक्त लोगों की इच्छा से अपना अधिकार प्राप्त करता है।
- गणतंत्र: यह शब्द बताता है कि राज्य का मुखिया जनता द्वारा चुना जाता है। भारत में, भारत का राष्ट्रपति राज्य का निर्वाचित प्रमुख होता है।
प्रस्तावना में संशोधन कब किया गया?
केशवानंद भारती मामले के फैसले के बाद यह स्वीकार किया गया कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है। संविधान के एक भाग के रूप में, प्रस्तावना को संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधित किया जा सकता है, लेकिन प्रस्तावना के मूल ढांचे में संशोधन नहीं किया जा सकता है।
अभी तक प्रस्तावना में केवल एक बार 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 के जरिए संशोधन किया गया है। 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 के जरिए प्रस्तावना में जोड़े गए। 'संप्रभु' और 'लोकतांत्रिक' के बीच 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द जोड़ दिए गए। 'राष्ट्र की एकता' को बदलकर 'राष्ट्र की एकता और अखंडता' कर दिया गया।
केशवानंद भारती मामले के फैसले के बाद यह स्वीकार किया गया कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है। संविधान के एक भाग के रूप में, प्रस्तावना को संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधित किया जा सकता है, लेकिन प्रस्तावना के मूल ढांचे में संशोधन नहीं किया जा सकता है।
अभी तक प्रस्तावना में केवल एक बार 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 के जरिए संशोधन किया गया है। 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 के जरिए प्रस्तावना में जोड़े गए। 'संप्रभु' और 'लोकतांत्रिक' के बीच 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द जोड़ दिए गए। 'राष्ट्र की एकता' को बदलकर 'राष्ट्र की एकता और अखंडता' कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट
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सोशल मीडिया
तो कोर्ट में प्रस्तावना को लेकर क्या याचिका दाखिल की गई?
शीर्ष अदालत में भाजपा नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय और बलराम सिंह ने इसे लेकर याचिकाएं दाखिल की थीं। याचिकाओं में 1976 में 42वें संशोधन के जरिये संविधान की प्रस्तावना में शामिल किए गए दो शब्दों पंथनिरपेक्ष और सामाजवाद को हटाने की मांग की गई। याचिकाओं में कहा गया कि ये दोनों शब्द 1949 में तैयार किए गए संविधान के मूल प्रस्तावना में नहीं हैं। सीजेआई संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने इन याचिकाओं पर सुनवाई की और 22 नवंबर को आदेश सुरक्षित रखा था।
शीर्ष अदालत में भाजपा नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय और बलराम सिंह ने इसे लेकर याचिकाएं दाखिल की थीं। याचिकाओं में 1976 में 42वें संशोधन के जरिये संविधान की प्रस्तावना में शामिल किए गए दो शब्दों पंथनिरपेक्ष और सामाजवाद को हटाने की मांग की गई। याचिकाओं में कहा गया कि ये दोनों शब्द 1949 में तैयार किए गए संविधान के मूल प्रस्तावना में नहीं हैं। सीजेआई संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने इन याचिकाओं पर सुनवाई की और 22 नवंबर को आदेश सुरक्षित रखा था।
याचिकर्ताओं की मांग क्या थी?
याचिकाकर्ताओं में एक अश्विनी उपाध्याय ने शीर्ष अदालत में अपनी याचिका के जरिए कई बिंदु उठाए। याचिकाकर्ता न कहा कि वह न तो 'समाजवादी, 'पंथनिरपेक्ष' और अखंडता' शब्दों के खिलाफ हैं और न ही संविधान में उनके समावेश के खिलाफ है, बल्कि वह इन शब्दों को 1976 में प्रस्तावना में शामिल किए जाने के खिलाफ हैं।
याचिकाकर्ता उपाध्याय ने कहा कि भारत, एक देश के रूप में, संविधान के मौलिक अधिकारों और अन्य प्रावधानों के होने के कारण स्वाभाविक रूप से पंथनिरपेक्ष है। प्रस्तावना में केवल एक शब्द जोड़ने से देश में कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ा। तर्क दिया गया कि अगर पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ा जा सकता है तो संप्रभु, लोकतांत्रिक, न्याय, समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और अखंडता जैसे शब्दों को हटाया जा सकता है। साम्यवाद जैसे शब्दों को भी प्रस्तावना में जोड़ा जा सकता है।
समाजवादी शब्द को लेकर याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह देश के लिए एक व्यक्तिपरक विषय है। आज लोग समाजवाद को पसंद कर सकते हैं लेकिन कल उन्हें साम्यवाद पसंद आ सकता है जो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। यहां तक कि डॉ. बीआर अंबेडकर ने भी संविधान सभा में यह तर्क दिया था।
आगे तर्क दिया गया है कि प्रस्तावना 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा संविधान को अपनाने का एक कथन है और इसलिए कथन नहीं बदला जा सकता। हालांकि, आपातकाल के काले दिनों के दौरान सरकार ने 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत संविधान सभा की ओर से, जो 1976 में अस्तित्व में नहीं थी, और यहां तक कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना, संविधान को अपनाने की तारीख यानी 26 नवंबर 1949 को बदले बिना प्रस्तावना में 'समाजवादी 'पंथनिरपेक्ष' 'अखंडता' को शामिल किया। याचिकाकर्ता ने कहा है कि संसद के पास संविधान में संशोधन करने की शक्ति है, लेकिन वह प्रस्तावना के तथ्यों को नहीं बदल सकती।
तीन जोड़े गए शब्दों को हटाकर और मूल प्रस्तावना को पुनः स्थापित करने से देश, लोगों या कानूनों में कोई बदलाव नहीं होगा। ऐसा करने से संविधान के मूल्यों में बदलाव की आशंका उचित नहीं है।
याचिकाकर्ताओं में एक अश्विनी उपाध्याय ने शीर्ष अदालत में अपनी याचिका के जरिए कई बिंदु उठाए। याचिकाकर्ता न कहा कि वह न तो 'समाजवादी, 'पंथनिरपेक्ष' और अखंडता' शब्दों के खिलाफ हैं और न ही संविधान में उनके समावेश के खिलाफ है, बल्कि वह इन शब्दों को 1976 में प्रस्तावना में शामिल किए जाने के खिलाफ हैं।
याचिकाकर्ता उपाध्याय ने कहा कि भारत, एक देश के रूप में, संविधान के मौलिक अधिकारों और अन्य प्रावधानों के होने के कारण स्वाभाविक रूप से पंथनिरपेक्ष है। प्रस्तावना में केवल एक शब्द जोड़ने से देश में कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ा। तर्क दिया गया कि अगर पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ा जा सकता है तो संप्रभु, लोकतांत्रिक, न्याय, समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और अखंडता जैसे शब्दों को हटाया जा सकता है। साम्यवाद जैसे शब्दों को भी प्रस्तावना में जोड़ा जा सकता है।
समाजवादी शब्द को लेकर याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह देश के लिए एक व्यक्तिपरक विषय है। आज लोग समाजवाद को पसंद कर सकते हैं लेकिन कल उन्हें साम्यवाद पसंद आ सकता है जो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। यहां तक कि डॉ. बीआर अंबेडकर ने भी संविधान सभा में यह तर्क दिया था।
आगे तर्क दिया गया है कि प्रस्तावना 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा संविधान को अपनाने का एक कथन है और इसलिए कथन नहीं बदला जा सकता। हालांकि, आपातकाल के काले दिनों के दौरान सरकार ने 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत संविधान सभा की ओर से, जो 1976 में अस्तित्व में नहीं थी, और यहां तक कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना, संविधान को अपनाने की तारीख यानी 26 नवंबर 1949 को बदले बिना प्रस्तावना में 'समाजवादी 'पंथनिरपेक्ष' 'अखंडता' को शामिल किया। याचिकाकर्ता ने कहा है कि संसद के पास संविधान में संशोधन करने की शक्ति है, लेकिन वह प्रस्तावना के तथ्यों को नहीं बदल सकती।
तीन जोड़े गए शब्दों को हटाकर और मूल प्रस्तावना को पुनः स्थापित करने से देश, लोगों या कानूनों में कोई बदलाव नहीं होगा। ऐसा करने से संविधान के मूल्यों में बदलाव की आशंका उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट
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सोशल मीडिया
प्रस्तावना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष शब्दों को हटाने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि संसद की संशोधन शक्ति प्रस्तावना तक भी फैली हुई है। सीजेआई खन्ना ने फैसले के बाद कहा कि इतने साल हो गए हैं, अब इस मुद्दे को क्यों उठाया जा रहा है। हमने स्पष्ट किया है कि इतने वर्षों के बाद इस प्रक्रिया को इस तरह से निरस्त नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं पर आगे विचार-विमर्श और निर्णय की जरूरत नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि संसद की संशोधन शक्ति प्रस्तावना तक भी फैली हुई है। प्रस्तावना को अपनाने की तारीख संसद की प्रस्तावना में संशोधन करने की शक्ति को सीमित नहीं करती है।
अदालत ने कहा कि प्रस्तावना के मूल सिद्धांत पंथनिरपेक्ष लोकाचार को दर्शाते हैं। केशवानंद भारती और एसआर बोम्मई केस में संविधान पीठ के निर्णयों सहित कई फैसलों में कहा गया है कि पंथनिरपेक्षता संविधान की एक बुनियादी विशेषता है। यद्यपि 42वें संविधान संशोधन से पहले संविधान में 'पंथनिरपेक्ष' शब्द मौजूद नहीं था, फिर भी पंथनिरपेक्षता अनिवार्य रूप से सभी धर्मों के लोगों के साथ समान और बिना किसी भेदभाव के व्यवहार करने की राष्ट्र की प्रतिबद्धता का प्रतिनिधित्व करती है।
समाजवाद के संबंध में न्यायालय ने कहा कि भारतीय ढांचे में समाजवाद आर्थिक और सामाजिक न्याय के सिद्धांत को मूर्त रूप देता है। इसमें राज्य यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी नागरिक आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों के कारण वंचित न रहे। 'समाजवाद' शब्द आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लक्ष्य को दर्शाता है।
इससे पहले सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा था कई संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्ष और समाजवाद शब्दों को पश्चिमी नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। जस्टिस खन्ना ने कहा था कि समाजवाद का अर्थ यह भी हो सकता है कि अवसरों की समानता हो और देश की संपत्ति का समान वितरण हो। पंथनिरपेक्ष शब्द के साथ भी यही बात है।
जस्टिस खन्ना ने याचिकाकर्ता बलराम सिंह की ओर से अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन से सवाल किया था कि, क्या आप नहीं चाहते हैं कि भारत पंथनिरपेक्ष हो? इस पर अधिवक्ता जैन ने कहा था, हम यह नहीं कह रहे हैं कि भारत पंथनिरपेक्ष नहीं है। हम इस संशोधन को चुनौती दे रहे हैं। उन्होंने कहा था कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि समाजवाद शब्द को शामिल करने से व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश लगेगा। कोर्ट ने अब सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष शब्दों को हटाने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि संसद की संशोधन शक्ति प्रस्तावना तक भी फैली हुई है। सीजेआई खन्ना ने फैसले के बाद कहा कि इतने साल हो गए हैं, अब इस मुद्दे को क्यों उठाया जा रहा है। हमने स्पष्ट किया है कि इतने वर्षों के बाद इस प्रक्रिया को इस तरह से निरस्त नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं पर आगे विचार-विमर्श और निर्णय की जरूरत नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि संसद की संशोधन शक्ति प्रस्तावना तक भी फैली हुई है। प्रस्तावना को अपनाने की तारीख संसद की प्रस्तावना में संशोधन करने की शक्ति को सीमित नहीं करती है।
अदालत ने कहा कि प्रस्तावना के मूल सिद्धांत पंथनिरपेक्ष लोकाचार को दर्शाते हैं। केशवानंद भारती और एसआर बोम्मई केस में संविधान पीठ के निर्णयों सहित कई फैसलों में कहा गया है कि पंथनिरपेक्षता संविधान की एक बुनियादी विशेषता है। यद्यपि 42वें संविधान संशोधन से पहले संविधान में 'पंथनिरपेक्ष' शब्द मौजूद नहीं था, फिर भी पंथनिरपेक्षता अनिवार्य रूप से सभी धर्मों के लोगों के साथ समान और बिना किसी भेदभाव के व्यवहार करने की राष्ट्र की प्रतिबद्धता का प्रतिनिधित्व करती है।
समाजवाद के संबंध में न्यायालय ने कहा कि भारतीय ढांचे में समाजवाद आर्थिक और सामाजिक न्याय के सिद्धांत को मूर्त रूप देता है। इसमें राज्य यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी नागरिक आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों के कारण वंचित न रहे। 'समाजवाद' शब्द आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लक्ष्य को दर्शाता है।
इससे पहले सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा था कई संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्ष और समाजवाद शब्दों को पश्चिमी नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। जस्टिस खन्ना ने कहा था कि समाजवाद का अर्थ यह भी हो सकता है कि अवसरों की समानता हो और देश की संपत्ति का समान वितरण हो। पंथनिरपेक्ष शब्द के साथ भी यही बात है।
जस्टिस खन्ना ने याचिकाकर्ता बलराम सिंह की ओर से अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन से सवाल किया था कि, क्या आप नहीं चाहते हैं कि भारत पंथनिरपेक्ष हो? इस पर अधिवक्ता जैन ने कहा था, हम यह नहीं कह रहे हैं कि भारत पंथनिरपेक्ष नहीं है। हम इस संशोधन को चुनौती दे रहे हैं। उन्होंने कहा था कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि समाजवाद शब्द को शामिल करने से व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश लगेगा। कोर्ट ने अब सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है।