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Sabarimala Verdict: 'सुधार के नाम पर धर्म की मूल भावना से छेड़छाड़ नहीं कर सकते', सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

Wed, 29 Apr 2026 01:23 PM IST
Shivam Garg न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Shivam Garg Updated Wed, 29 Apr 2026 01:23 PM IST
सार

Sabarimala Verdict Review: सबरीमाला मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के ये सवाल इस बात की ओर इशारा करते हैं कि धार्मिक आस्था, समानता और सांविधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है। आने वाला फैसला इस बहस को नई दिशा दे सकता है।

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Supreme Court Continues Sabarimala Hearing Debate on Women Entry, Equality and Religious Practices
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि उत्तर भारत में रहने वाला कोई गैर-आस्थावान व्यक्ति आखिर किस आधार पर सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का अधिकार मांग सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म की मूल संरचना को कमजोर नहीं किया जा सकता।

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सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने कहा कि भारत की सभ्यता और धार्मिक इतिहास को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 भी इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से विकसित हुए हैं। अदालत के मुताबिक, वर्तमान को समझने के लिए अतीत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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आस्था बनाम अधिकार पर कोर्ट का फोकस
नौ जजों की संविधान पीठ ने कहा कि मंदिर प्रवेश के अधिकार से जुड़े मामलों में यह देखना जरूरी है कि दावा करने वाला व्यक्ति भक्त है या नहीं। अदालत ने संकेत दिया कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में आस्था का पहलू भी अहम भूमिका निभाता है। यह टिप्पणी उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई, जिनमें सबरीमाला समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ कथित भेदभाव का मुद्दा उठाया गया है। अदालत इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन पर विचार कर रही है।
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इंदिरा जयसिंह ने रखा पक्ष
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट का पूर्व फैसला अब भी प्रभावी है और उस पर कोई रोक नहीं लगी है। इसके बावजूद महिलाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं मिल पा रहा, जिसका कारण राज्य सरकार का पर्याप्त सहयोग न होना बताया गया। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत धर्म की परिभाषा तय नहीं करती, बल्कि यह तय करना धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं का विषय है। सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा हुई कि क्या संविधान को पूरी तरह नए दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए या फिर ऐतिहासिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए इसकी व्याख्या की जानी चाहिए। इस पर दोनों पक्षों के बीच गहन बहस हुई।

उन्होंने कहा कि महिलाओं को 10 से 50 वर्ष की आयु के बीच मंदिर में प्रवेश से रोकना उनके जीवन के महत्वपूर्ण दौर में अधिकारों से वंचित करना है। जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि उस निर्णय में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया गया था। बावजूद इसके, आज भी महिलाओं को मंदिर में प्रवेश में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।


कोर्ट की प्रतिक्रिया
अदालत ने इस पर स्पष्ट किया कि महिला को उसके सामाजिक वर्ग के कारण नहीं, बल्कि आयु समूह के आधार पर रोका गया था। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि विविधता ही भारत की ताकत है और संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों को अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार भी दिया गया है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि किसी धार्मिक प्रथा को आवश्यक या गैर-आवश्यक घोषित करना न्यायालय के लिए बेहद जटिल कार्य है।

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