SC: अदालत ने पूछा- तारीख बदले बिना क्या संविधान की प्रस्तावना में संशोधन संभव था, पढ़िए क्या है पूरा मामला
पीठ ने संविधान की प्रस्तावना का जिक्र करते हुए कहा कि यह शायद एकमात्र प्रस्तावना है, जो तारीख के साथ है। पीठ के समक्ष दलील दी गई कि इसके मूल रूप से समाजवादी और पंथनिरपेक्ष दोनों शब्द नहीं थे। एक वकील ने तर्क दिया कि यह प्रस्तावना एक विशिष्ट तिथि के साथ आई है।
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जानना चाहा कि क्या तारीख को बदले बिना संविधान की प्रस्तावना में संशोधन किया जा सकता था? शीर्ष अदालत ने यह सवाल पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की तरफ से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान उठाया जिसमें भारतीय संविधान की प्रस्तावना से समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द हटाने की मांग की गई है।
जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि ऐसा नहीं है कि प्रस्तावना में संशोधन नहीं किया जा सकता। इस मामले पर अकादमिक दृष्टिकोण से विचार किया जा सकता है, क्योंकि प्रस्तावना को पहले संशोधित किया गया था (1976 में 42वें संशोधन अधिनियम के जरिये), जिसमें संविधान को स्वीकार करने की तारीख 29 नवंबर, 1949 को बरकरार रखते हुए समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्दों को शामिल किया गया था। कोर्ट की टिप्पणी पर स्वामी और अन्य वकीलों ने कहा कि बिल्कुल यही मुद्दा है।
पीठ ने संविधान की प्रस्तावना का जिक्र करते हुए कहा कि यह शायद एकमात्र प्रस्तावना है, जो तारीख के साथ है। पीठ के समक्ष दलील दी गई कि इसके मूल रूप से समाजवादी और पंथनिरपेक्ष दोनों शब्द नहीं थे। एक वकील ने तर्क दिया कि यह प्रस्तावना एक विशिष्ट तिथि के साथ आई है। स्वामी ने कहा कि संशोधन अधिनियम आपातकाल (1975-77) के दौरान पारित किया गया था।
29 अप्रैल को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध
पीठ ने इससे जुड़े मामले (बलराम सिंह व अन्य बनाम भारत संघ) के वकील विष्णु शंकर जैन के अनुरोध पर मामले को 29 अप्रैल से शुरू होने वाले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। याचिका में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासनकाल में 1976 के 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्दों को शामिल करने को चुनौती दी गई है। याचिका में दलील-आंबेडकर ने किया था विरोध : याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि इस तरह का सम्मिलन अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संशोधन शक्ति से परे था और संविधान निर्माताओं का कभी भी लोकतांत्रिक शासन में समाजवादी या पंथनिरपेक्ष अवधारणाओं को पेश करने का कोई इरादा नहीं था। यह भी कहा जाता है कि डॉ. बीआर आंबेडकर ने इन शब्दों के शामिल करने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।